असम में अवैध घुसपैठ का इतिहास : जानिए नेहरु और Congress की वोट बैंक की नीति और उसके Side Effect
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असम में अवैध घुसपैठ का इतिहास : जानिए नेहरु और Congress की वोट बैंक की नीति और उसके Side Effect

असम में अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और विभाजनकालीन राजनीति को लेकर Gopinath Bordoloi, Jawaharlal Nehru, Muhammad Ali Jinnah और अन्य नेताओं की भूमिका पर आधारित विश्लेषण

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by Shivam Dixit
Feb 25, 2026, 05:22 pm IST
in भारत, असम, विश्लेषण

विदेशी घुसपैठ किसी ख़ास प्रदेश या इलाके के लिए नहीं वरन पूरे भारत के लिए बहुत बड़ा अभिशाप है. असम उन प्रदेशों में हैं जिसने इसकी कीमत सबसे ज्यादा कीमत चुकाई है. असम में घुसपैठ और उसकी वजह से हुए मुस्लिम जनसंख्या के विस्फोट के पीछे एक बहुत बड़ी साजिश थी जो आजादी के तत्काल बाद ही शुरू हो गई थी. इसका लक्ष्य पूरे असम को पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में मिलाने का था. मुस्लिम लीग की इस साज़िश को विफल करने में गोपीनाथ बोरदोलोई की भूमिका अहम थी. वही जवाहरलाल नेहरू की इस समस्या को नज़रअंदाज करना भी परेशान करनेवाला हैं.

गोपीनाथ बोरदोलोई का संघर्ष और दूरदृष्टि

असम में घुसपैठियों के खिलाफ पहली जंग लड़ने वाले भारत रत्न गोपीनाथ बोरदोलोई थे. बोरदोलोई कांग्रेस के नेता थे.भारत माता के इस महान सपूत को भारत रत्न भी कांग्रेस की सरकार ने नहीं बल्कि 1998 में एनडीए की वाजपेयी सरकार ने दिया था. स्वतंत्रता सेनानी गोपीनाथ बोरदोलोई ने 1930 के दशक में ही असम की संस्कृति को बचाने का अभियान चलाया था. बोरदोलोई पहले ऐसे नेता थे जो असम में होने वाले जनसांख्यिकी परिवर्तन की साज़िश को पहचान गए थे. दरअसल उस दौर में जिन्ना की मुस्लिम लीग अंग्रेज सरकार की मदद से बाहरी मुसलमानों को असम में बसा रही थी जिसका बोरदोलोई ने जमकर विरोध किया था. 1938 में जब बोरदोलोई पहली बार असम के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने मुस्लिम लीग द्वारा बसाए गए लोगों को बाहर निकालने की मुहिम चलाई.बोरदोलोई जानते थे कि असम में मुसलमानों की आबादी को बढ़ाकर जिन्ना की मुस्लिम लीग एक दिन असम को पूर्वी पाकिस्तान में मिलाने की योजना पर काम कर रही है.

कैबिनेट मिशन योजना और असम का संकट

बोरदोलोई का डर सही निकला. दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद मार्च 1946 में ब्रिटिश सरकार ने अपने तीन मंत्रियों को कैबिनेट मिशन पर भारत भेजा. कैबिनेट मिशन का मकसद भारत की आजादी और नई सरकार बनाने का रास्ता निकालना था.भारतीय नेताओं के साथ लंबी बातचीत के बाद कैबिनेट मिशन ने एक योजना प्रस्तुत किया जिसके मुताबिक भारत में एक केंद्र सरकार होगी और उसके नीचे राज्यों के तीन समूह ए, बी और सी होंगे. ग्रुप ए और ग्रुप बी को लेकर तो कोई समस्या नहीं थी, लेकिन ग्रुप सी में पूर्वी भारत के दो राज्य यानी बंगाल और असम को एक साथ मिला कर रख दिया गया. समस्या यह थी कि असम और बंगाल की आबादी को पूरी तरह से मिला देने पर यह ग्रुप सी मुस्लिम बहुल समूह बन जाता था. इससे बंगाल के साथ-साथ असम पर भी हमेशा के लिए मुस्लिम लीग का प्रभाव हो जाता जबकि असम में उस समय 70% आबादी हिंदुओं की थी. लेकिन दुर्भाग्य से असम की समस्या की अनदेखी करते हुए कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन के प्लान को स्वीकार कर लिया. लेकिन गोपीनाथ बोरदोलई ने अपनी पार्टी यानी कांग्रेस के इस फैसले के खिलाफ जाकर पूरे असम में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए.बोरदोलोई की इस ज़िद के आगे ना केवल गांधी जी को झुकना पड़ा बल्कि कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन के प्लान को ही रिजेक्ट कर दिया और इस तरह गोपीनाथ बोरदोलई की दूरदृष्टि ने असम को पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बनने से बचा लिया.दुर्भाग्य की बात है कि उनके इस महान योगदान से देश के ज्यादातर लोग अनजान हैं.

सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह की भूमिका

असम को मुस्लिम बहुल राज्य बनाने के सूत्रपात करने वाले और इस काम को आगे बढाने वाला सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह था जिसे नॉर्थ ईस्ट का जिन्ना कहा जाता था. दरअसल 1940 के दशक में असम में मुस्लिम लीग की प्रांतीय सरकार थी और इसके मुखिया मुस्लिम लीग के बड़े नेता सैयद मोहम्मद सादुल्लाह थे. सादुल्लाह ने बड़ी तादाद में बाहरी मुसलमानों को असम में बसाया था. उसकी योजना असम को मुस्लिम बाहुल्य बनाकर पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में मिलाना था.सादुल्लाह ने अनाज उत्पादन बढ़ाने के नाम पर बाहरी मुस्लिम किसानो को असम में बड़े पैमाने पर बसाया था. दरअसल यह अन्न उत्पादन योजना नहीं बल्कि Muslim आबादी बढ़ाव योजना थी जिसका जिक्र तत्कालीन वॉइस लॉर्ड वेवल ने भी किया था.

संविधान सभा और सादुल्लाह की नियुक्ति

जिन्ना का यह अनुयायी सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह पाकिस्तान बनवाने के बाद पाकिस्तान नहीं गया बल्कि आखिरी सांस तक असम में ही रहा.मोहम्मद सादुल्लाह ने पहले तो असम में मुसलमान बसाए, फिर पाकिस्तान बनवाया और जब भारत आजाद हो गया तो सादुल्लाह पाकिस्तान ना जाकर भारत की संविधान सभा का सदस्य बन गया.आजादी के महज 14 दिन बाद 29 अगस्त 1947 को नेहरू सरकार ने मोहम्मद सादुल्लाह को भारत की संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी का सदस्य भी बना दिया जिसके चेयरमैन डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर थे.

स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही घुसपैठ

आजादी के बाद भी असम में जनसांख्यिकी परिवर्तन का खेल यथावत जारी रहा.आजादी के तत्काल बाद भी अवैध मुस्लिम घुसपैठ के खिलाफ असम के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई का संघर्ष जारी रहा.पूर्वी पाकिस्तान यानी वर्तमान बांग्लादेश से बड़ी तादाद में मुसलमान असम आ रहे थे क्योंकि उन्हें असम को एक मुस्लिम राष्ट्र बनाना था.असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई ने आजादी के सिर्फ 9 महीने बाद देश के गृह मंत्री सरदार पटेल को एक पत्र लिखा था.5 मई 1948 को बोरदोलोई के पत्र का मजमून हैं कि आदरणीय सरदार पटेल जी असम में हिंदू शरणार्थियों का आना तो समझ में आता है लेकिन बड़ी संख्या में मुस्लिम शरणार्थियों के आने से बहुत बड़ी मुसीबत पैदा हो रही है. हमें यह ध्यान में रखना होगा कि विभाजन के पहले पाकिस्तान की असम में रुचि थी.हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यदि असम को भारत का अंग बनाए रखना है तो मुस्लिम घुसपैठ को रोकने के लिए हमें बल प्रयोग की अनुमति दी जाए. असम के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई के इस पत्र से साफ हो जाता है कि आजादी के कुछ दिनों बाद ही पूर्वी पाकिस्तान यानी वर्तमान बांग्लादेश से मुस्लिम घुसपैठिए असम में दाखिल होने लगे थे.

नेहरू-पटेल पत्राचार और विवाद

1950 आते-आते असम में मुस्लिम घुसपैठियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी जिस कारण सरदार पटेल बहुत चिंतित थे. इस बारे में उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू को एक पत्र लिखा था.जवाहरलाल नेहरू ने इस समस्या को टालने के लिए एक अलग ही मोड़ दे दिया.नेहरू का 1 अक्टूबर 1950 को सरदार पटेल के पत्र का जवाब सिलेक्टेड वक्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू की सीरीज टू के वॉल्यूम 15 के पेज नंबर 36 पर प्रकाशित हैं. इस पत्र में नेहरू लिखते हैं प्रिय बल्लभ भाई आपने पूर्वी पाकिस्तान से असम आने वाले मुस्लिम अप्रवासियों के बारे में मुझे पत्र लिखा था. हमें इनके प्रवेश पर रोक लगाने की कोशिश करना चाहिए.नेहरू आगे लिखते हैं कि ऐसे व्यक्तियों यानी मुस्लिम घुसपैठियों की संख्या बहुत ज्यादा दिखाई नहीं देती है.आपके भेजे गए कागजात के मुताबिक किसी एक दिन इनकी यानी मुस्लिम घुसपैठियों की संख्या 120 थी. सामान्य तौर पर यह रोजगार ढूंढने वाले लोगों की भी आवाजाही है. इस पत्र से स्पष्ट होता हैं की नेहरू गुपचुप तरीके से मुस्लिम जनसंख्या बढ़ाकर अपने वोटबैंक को मजबूत करना चाहते थे.

मोइनुल हक चौधरी और बाद की राजनीति

1950 में असम में पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई का निधन हो गया और इसके कुछ दिन बाद सरदार पटेल भी नहीं रहे. ये दोनों नेता और कुछ समय तक जीवित होते तो इस समस्या का उसी समय समाधान हो जाता.असम में घुसपैठ को रोकने वाला कोई नहीं था.इसी दौर में असम कांग्रेस में मोइनुल हक चौधरी का उदय हुया. मोइनुल हक चौधरी आजादी से पहले मुस्लिम लीग के नेता हुआ करते थे और मुस्लिम लीग के यूथ फ्रंट के महासचिव होने के साथ-साथ कुछ समय के लिए मोहम्मद अली जिन्ना के प्राइवेट सेक्रेटरी भी रहा था. आजादी से पहले मोइनुल हक चौधरी ने जिन्ना से वादा किया था की वो असम को पाकिस्तान को सौंप देंगे.उनका वादा कागजों में दर्ज है. आजादी के बाद मोइनुल हक चौधरी मुस्लिम लीग छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गया और असम कांग्रेस के बड़े नेता और भारत के पूर्व राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद का दामन थाम लिया. मोइनुल हक चौधरी पांच बार विधायक बने और 1967 में असम सरकार में मंत्री भी बनाये गए. लेकिन सबसे हैरानी की बात है कि जिन्ना के इस अनुयायी को 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रिमंडल में मोइनुल हक चौधरी को देश का औद्योगिक विकास मंत्री बना दिया.

मोइनुल हक चौधरी की असम की सोच का जिक्र असम के पूर्व राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा की एक रिपोर्ट मिलता हैं जो उन्होंने 8 नवंबर 1998 को भारत सरकार को सौंपी थी. इस रिपोर्ट में उन्होंने विस्तार से असम में होने वाली अवैध घुसपैठ पर प्रकाश डाला है. इस रिपोर्ट में लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा मोइनुल हक चौधरी के बारे में लिखा हैं कि जब देश के बंटवारे की मांग हो रही थी तो यह माना जा रहा था कि पूर्वी पाकिस्तान में बंगाल के साथ-साथ असम को भी मिला लिया जाएगा. मोहम्मद अली जिन्ना के निजी सचिव मोइनुल हक चौधरी जो आजादी के बाद असम में मंत्री बने और बाद में केंद्र सरकार में भी मंत्री पद पर रहे उन्होंने जिन्ना से कहा था कि हम असम को चांदी की थाली में रखकर आपको सौंप देंगे. जिन्ना ने भी कहा था कि असम मेरी जेब में है.वोट बैंक की लालच में असम में बड़ी संख्या में अवैध मुस्लिम घुसपैठियों को बसाया गया था. जिन्ना की मुस्लिम लीग से आजादी के बाद कांग्रेस में आए मोइनुल हक चौधरी जैसे नेताओं के सर पर कांग्रेस के पुराने और वरिष्ठ नेता फकरुद्दीन अली अहमद का हाथ था.आरोप तो यह भी है कि उस घुसपैठ को फकरुद्दीन अली अहमद का समर्थन प्राप्त था. यह वही फकरुद्दीन अली अहमद हैं जो बाद में देश के राष्ट्रपति बने और उन्होंने ही इंदिरा गांधी के कहने पर 1975 में बतौर राष्ट्रपति देश में इमरजेंसी थोपी थी.

बी.के. नेहरू और अन्य आरोप

सिर्फ लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा ही नहीं बल्कि नेहरू परिवार के सदस्य और 1968 से 1973 तक असम के राज्यपाल रहे ब्रजकिशोर नेहरू ने अपनी किताब नाइस गाइस फिनिश सेकंड में यह आरोप लगाया है कि जब-जब उन्होंने असम में घुसपैठ की समस्या उठाया तो उसे फकरुद्दीन अली अहमद जैसे नेताओं ने मुसलमानों पर अत्याचार बताकर इंदिरा सरकार से खारिज करवा दिया. बी के नेहरू अपनी इस किताब नाइस गाइस फिनिश सेकंड के पेज नंबर 543 पर लिखते हैं कि मेरे कार्यकाल के दौरान अवैध घुसपैठियों को निकालने के प्रयास शुरू हुए थे लेकिन फकरुद्दीन अली अहमद, मोइनुल हक चौधरी और डी के बरुआ ने दिल्ली में जाकर यह शोर मचाया कि असम में मुसलमानों पर अत्याचार किए जा रहे हैं. केंद्र सरकार ने इस शोर का समर्थन किया क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान से आए मुसलमान कांग्रेस के लिए वोट बैंक थे.

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अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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