फिल्म जगत : संस्कृति को बढ़ाता 'सेंगोल'
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फिल्म जगत : संस्कृति को बढ़ाता ‘सेंगोल’

इन दिनों 'सेंगोल' पर बनी फिल्म 'स्वयंभू' की बड़ी चर्चा है। इसके माध्यम से इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कहानी को सामने लाया गया है। 2023 में संसद भवन में स्थापित होने से पहले इस बारे में जानकारी बहुत कम लोगों को थी।

Written byअनुपम के. सिंहअनुपम के. सिंह
Feb 25, 2026, 03:59 pm IST
in मनोरंजन
फिल्म 'स्वयंभू' के दृश्य में अभिनेता निखिल सिद्धार्थ

फिल्म 'स्वयंभू' के दृश्य में अभिनेता निखिल सिद्धार्थ

भारत के सांस्कृतिक इतिहास में कई ऐसे प्रतीक हैं, जो चिरकाल तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की क्षमता रखते हैं। इनमें से कई मार्क्सवादी विमर्श की परतों के नीचे छिपा दिए गए, तो कई ऐसे रहे जिन्हें अध्ययन लायक ही नहीं समझा गया। चोल वंश का राजदंड ‘सेंगोल’ ऐसा ही एक प्रतीक है। इसे कभी ‘नेहरू की सुनहरी छड़ी’ बताकर प्रयागराज के संग्रहालय में रखा गया था, आज देश उसकी असली महत्ता समझ रहा है।

14 अगस्त, 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने ‘सेंगोल’ को स्वीकार किया था, जिसे सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में देखा गया। लेकिन उसके बाद यह प्रतीक सीधे मई, 2023 में तब चर्चा में आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आधीनम’ पुरोहितों के मंत्रोच्चार के बीच इसे भारत के नए संसद भवन में स्थापित किया। बड़ी बात यह भी है कि शैव संप्रदाय से संबंध रखने वाले ‘आधीनम’ सामान्यतः ग़ैर-ब्राह्मण होते हैं। सनातन से जुड़े ऐसे प्रतीक भारत जैसे विशाल व विविध संस्कृतियों वाले राष्ट्र को एक करते हैं। तमिल चोल राजवंश की राजधानी रहे तंजावुर से ढाई हजार किलोमीटर दूर भारतीय गणतंत्र की राजधानी दिल्ली तक ‘सेंगोल’ की यात्रा इसी का एक उदाहरण थी। आज ‘सेंगोल’ फिर से चर्चा में है और इसका कारण राजनीतिक नहीं है। तमिल राजवंश और हिंदी पट्टी में स्थित गणतंत्र की राजधानी से होते हुए अब यह तेलुगु सिनेमा तक पहुंच गया है।

मई 2023 में संसद में सेंगोल की स्थापना की प्रक्रिया पूरी करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

“वो ‘सेंगोल’, जिसे शिवजी ने स्वयं भगवान श्रीराम को सौंपा था, क्या उसकी किस्मत में भी वनवास ही लिखा है?” -एक तेलुगु फिल्म के टीजर की शुरुआत ही इस कथन से होती है। और हां, यह कोई छोटी-मोटी फिल्म नहीं है। 10 अप्रैल, 2026 को प्रदर्शित होने वाली ‘स्वयंभू’ 60 करोड़ रुपए में तैयार हुई है। इसके मुख्य अभिनेता निखिल सिद्धार्थ की 2022 में आई फिल्म ‘कार्तिकेय-2’ को उत्तर भारत के हिन्दीभाषी लोगों ने भी खूब प्यार दिया था। ‘कार्तिकेय-2’ श्रीकृष्ण व उनसे जुड़े रहस्यों पर आधारित एक एडवेंचर मूवी है, जिसमें भारत की भौगोलिक विविधता को प्रदर्शित किया गया था। वहीं ‘स्वयंभ’ एक प्राचीन योद्धा पर आधारित फिल्म है, जो ‘सेंगोल’ के इर्द-गिर्द नजर आती है। टीजर में ‘सेंगोल’ को पाने के लिए योद्धाओं में जो बेचैनी दिखती है, वह बताता है कि यह केवल एक प्रतीक मात्र नहीं, बल्कि सत्ता की प्रतिष्ठा का पर्याय था।

बड़ी बात यह है कि ‘स्वयंभ’ में जिस ‘सेंगोल’ को दिखाया गया है, वह वही है जिसे भारतीय संसद में लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी के पास प्रतिष्ठापित किया गया है। प्राचीन काल में भी ‘सेंगोल’ सत्ता के हस्तांतरण का एक प्रतीक था। ऐसी मान्यता थी कि जहां ‘सेंगोल’ होगा, वहां राज्य में समृद्धि व ख़ुशहाली होगी। अगर शाब्दिक अर्थ की बात करें तो ‘सेंगोल’ तमिल शब्द ‘सेम्मई’ से निकला है, और ‘सेम्मई’ का अर्थ है ‘नीतिपरायणता’। नीतिपरायणता, सत्ता को यानी न्यायपूर्ण व निष्पक्ष शासन का संदेश। ‘सेंगोल’ में सबसे ऊपर भगवान शिव के वाहन नंदी विराजमान हैं। ‘सेंगोल’ के जिस वर्तमान स्वरूप को हम देखते हैं, उसका निर्माण वुम्मिडी बंगारु चेट्टी ने किया है, जो संसद भवन के प्रतिष्ठापन कार्यक्रम में भी उपस्थित थे। वर्तमान में उनकी उम्र 98 वर्ष है।

हमने किस तरह अपनी ही संस्कृति को सदा उपेक्षित दृष्टि से देखा, उसे इसी तथ्य से समझ लीजिए कि ‘स्वयंभू’ से पहले शायद ही कोई ऐसी फिल्म बनी हो जिसकी कहानी के केंद्र में ‘सेंगोल’ हो। 2023 की संसद टीवी की डॉक्यूमेंट्री के अलावा इससे जुड़ी कोई भी दूश्य सामग्री हमें दिखाई नहीं देती। नई पीढ़ी हैरी पॉटर की छड़ी के बारे में जानती है, थॉर के हथौड़े ‘म्योल्निर’ के बारे में जानती है, गैंडाल्फ की लाठी के बारे में जानती है, लेकिन 2023 से पहले हममें से भी अधिकतर लोग ‘सेंगोल’ को लेकर अनभिज्ञ थे, नई पीढ़ी को इसके बारे में बताना तो दूर की बात!

अगर हम पाश्चात्य सभ्यता का उदाहरण लें तो वहां ऐसा नहीं है। ईसाई परंपरा में यीशु मसीह के अंतिम भोज से संबंधित थाली ‘होली ग्रेल’ को ही ले लीजिए। हॉलीवुड में इस पर आधारित एक से बढ़कर एक फिल्में हैं। 1989 में आई ‘इंडियाना जोन्स एंड द लास्ट क्रूसेड’ ऐसी ही एक फ़िल्म है। इसी तरह, राजा आर्थर की पौराणिक जादुई तलवार ‘एक्सकैलिबर’, जिसे ‘स्वॉर्ड-इन-द-स्टोन’ भी कहा जाता है। इस पर भी आपको कई फिल्में मिलेंगी। 1981 में ‘एक्सकैलिबर’ नाम से ही फिल्म आ चुकी है। ब्रिटेन के राजाओं के ‘क्राउन’ और उनसे जुड़े अन्य प्रतीकों पर भी फिल्में और सीरीज आ चुकी हैं। उन्होंने अपने प्रतीकों को न केवल कंटेंट के बाजार में भुनाया, बल्कि उन्हें लोकप्रिय बनाकर सम्मान भी दिलाया।

‘स्वयंभू’ जैसी फिल्मों का स्वागत होना चाहिए। यूं तो भारतीय युद्धकला के इतिहास पर एस.एस. राजामौली ने ‘मगाधीरा’ से लेकर ‘बाहुबली’ तक जैसी फिल्में बनाकर एक नया चलन शुरू किया, लेकिन हिंदी में भी ‘छावा’ जैसी फिल्मों ने कमाल किया है। कन्नड़ में ‘कांतारा-2’ ने जनजातीय संस्कृति और पौराणिक इतिहास का मिश्रण करके ऐसी सामग्री प्रस्तुत की, जिसे पूरे भारत के दर्शकों ने
पसंद किया।

तमिल सिनेमा अब तक इस चलन से अछूता नजर आ रहा है, क्योंकि वहां द्रविड़ राजनीति के हस्तक्षेप ने अब तक सिनेमा को स्थानीय पौराणिक इतिहास को खंगालने से रोक रखा है। चूंकि ‘सेंगोल’ का इतिहास तमिलनाडु से ही जुड़ा रहा है, उस पर सबसे पहले फिल्में वहीं बननी चाहिए थीं। उसे सबसे पहले तमिलनाडु विधानसभा में ही स्थापित होना चाहिए था। चोलों ने तमिलनाडु को गर्व करने के लिए नौसैनिक इतिहास व भव्य वास्तु-कला का उपहार दिया, फिर भी इस तरह की उपेक्षा समझ से परे है। तमिल सिनेमा को देखना चाहिए कि कैसे तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री ने भारत के पौराणिक इतिहास की खोज-यात्रा पर निकलकर स्वयं को समृद्ध किया है और साथ ही हिंदी डब वाली फिल्मों का एक विशाल बाजार खड़ा किया है। याद हो कि जब नई संसद में ‘सेंगोल’ को स्थापित किया जा रहा था, तब डी.एम.के. की तरफ से विरोध के स्वर उठे थे।

पार्टी के पूर्व सांसद टी.के.एस. इलंगोवन ने कहा था, “यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि राजतंत्र की निशानी है।” उन्होंने तो यहां तक कह दिया था, “मठ भी राजशाही के ही प्रतीक हैं।” यह हास्यास्पद है, क्योंकि शासन-तंत्र का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि हम अपने ही पूर्वजों पर गर्व करना छोड़ दें। अगर राजशाही की निंदा ही लोकतंत्र है, फिर तो महाराणा प्रताप से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज और ललितादित्य मुक्तापीड से लेकर महाराज छत्रसाल तक सबको नकारना पड़ेगा?

हमारे देश में ‘सेंगोल’ अगर स्वतंत्रता के बाद सत्ता हस्तांतरण का एक माध्यम बना, इसकी जड़ें भी परतंत्र भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन तक जाती हैं। वे माउंटबेटन ही थे, जिनके दिमाग में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया के लिए किस प्रतीक का इस्तेमाल किया जाए? जवाहरलाल नेहरू के पास इसका कोई जवाब नहीं था। इसीलिए तो वे चक्रवर्ती राजगोपालचारी के पास पहुंचे। राजगोपालचारी भारतीय इतिहास के जानकार थे। उन्होंने सत्ता हस्तांतरण के कार्यक्रम के लिए उसी प्रक्रिया को अपनाने का सुझाव दिया, जैसा चोल इतिहास में होता था।

आज यही ‘सेंगोल’ न केवल शासन की शुचिता का, बल्कि भारत की एकता का भी प्रतीक है। आने वाले समय पर इसे केंद्र में रखकर और भी फिल्में या वेब-सीरीज बनती हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ‘स्वयंभू’ ने जो सार्थक शुरुआत की है, वो अपने लक्ष्य तक तभी पहुंचेगी जब भारत के घर-घर में हमारे ऐतिहासिक प्रतीकों को लेकर जागरूकता हो, सम्मान का भाव हो।

Topics: चोल राजवंशपाञ्चजन्य विशेषसांस्कृतिक प्रतीकशैव संप्रदायसत्ता हस्तांतरणऐतिहासिक प्रासंगिकतानीतिपरायणतामार्क्सवादी विमर्शराजदंडपौराणिक इतिहाससेंगोलसंसद भवन
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