इतिहास केवल घटनाओं का वर्णन नहीं, बल्कि किसी राष्ट्र की आत्मा, उसके संघर्ष, आदर्शों और चेतना का दर्पण है। भारत के इतिहास में अनेक शासक हुए, परंतु राष्ट्र निर्माता कुछ ही बने। राष्ट्र निर्माता वह होता है, जो केवल शासन नहीं चलाता, अपितु समाज की चेतना जाग्रत करता है, सांस्कृतिक गौरव पुनर्जीवित करता है तथा स्थायी राजनीतिक-नैतिक व्यवस्था स्थापित करता है। छत्रपति शिवाजी महाराज ऐसे ही विरले राष्ट्र निर्माता थे। उन्होंने न केवल एक राज्य की स्थापना की, बल्कि स्वराज्य की अवधारणा को जन्म दिया-एक ऐसा शासन, जो जनता के लिए, जनता द्वारा तथा जनता के हित में हो। इसके विपरीत, तथाकथित टीपू सुल्तान एक शक्तिशाली एवं महत्वाकांक्षी शासक तो था, लेकिन उसका संघर्ष मुख्यतः राज्य-रक्षा एवं विस्तार तक सीमित रहा।
विडंबना देखिए, जब अंग्रेज इतिहासकार टीपू की सच्चाई उजागर करते हैं, तो वामपंथी इतिहासकार कहते हैं-अंग्रेज उसके विरोधी थे, इसलिए ऐसा लिखा। वहीं, जब टीपू के दरबारी मुस्लिम इतिहासकार उसकी क्रूरता, नृशंसता और जिहादी कुकृत्यों की प्रशंसा करते हैं, तो धूर्त वामपंथी एवं कांग्रेस-पोषित ‘सेकुलर’ इतिहासकार झूठ फैलाते हैं कि उन्होंने बढ़ा-चढ़ाकर लिखा होगा। इसी प्रकार, इन वामपंथी इतिहासकारों ने इस्लामिक आक्रांताओं एवं सुल्तानों को रहनुमा-महान बनाकर फर्जी इतिहास रचा, जिसे कांग्रेस का अंधा समर्थन मिला। भारतीयों को मूर्ख बनाने वाले इस फर्जी इतिहास का भंडाफोड़ अब आवश्यक है।
शिवाजी महाराज का स्वराज्य
छत्रपति शिवाजी महाराज का उदय उस काल में हुआ, जब भारत मुगल साम्राज्य एवं अन्य मुस्लिम सल्तनतों के अधीन था। समाज राजनीतिक रूप से कमजोर एवं मानसिक रूप से निराश था। बिना किसी साम्राज्यिक विरासत के, छोटी सेना और सीमित संसाधनों से उन्होंने दुर्गों, गुरिल्ला युद्ध एवं रणनीति द्वारा विशाल स्वराज्य की नींव रखी। इतिहासकार जदुनाथ सरकार लिखते हैं, ‘शिवाजी केवल योद्धा नहीं, राष्ट्र निर्माता थे, जिन्होंने नए भारत की नींव रखी।’
शिवाजी महाराज का शासन धार्मिक सहिष्णुता का उत्कृष्ट उदाहरण था। सेना एवं प्रशासन में मुसलमान उच्च पदों पर थे। जैसे-इब्राहिम खान (तोपखाना प्रमुख), दौलत खान (नौसेना प्रमुख), सिद्दी हिलाल (सैन्य अधिकारी)। उन्होंने मस्जिदों और कुरान का सम्मान किया। आलोचक इतिहासकार खाफी खान भी मानते हैं कि शिवाजी महाराज ने कभी मस्जिद या कुरान का अपमान नहीं किया। जब भी उनकी सेना को कुरान मिलता, उसे सम्मानपूर्वक लौटाया जाता था। उनका आदेश था कि किसी भी मत-पंथ की महिलाओं का अपमान न जाए, जो उस युग के लिए अभूतपूर्व था।
छत्रपति शिवाजी ने अष्टप्रधान परिषद की स्थापना की, जिसमें पेशवा, अमात्य, सेनापति आदि शामिल थे। यह आधुनिक प्रशासन की नींव थी। उन्होंने भूमि राजस्व प्रणाली में सुधार किया, किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित की। शिवाजी की मृत्यु के बाद भी मराठा साम्राज्य 150 वर्ष तक जीवित रहा और मराठा शक्ति पूरे भारत में फैली। इतना ही नहीं, मुगल भी अपनी रक्षा के लिए मराठों पर निर्भर थे। इसलिए कहा जाता है कि वास्तव में अंग्रेजों ने भारत को मुगलों से नहीं, मराठों से जीता था। मराठों का यह संघर्ष 1857 की क्रांति, क्रांतिकारी गतिविधियों एवं राष्ट्रीय आंदोलनों में दिखता रहा। वहीं, टीपू का संघर्ष देश के लिए नहीं, वरन् स्वयं के लिए था।
अंग्रेज इतिहासकारों की नजर में
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. फ्रांसिस बुकानन हैमिल्टन ने दस्तावेजों के आधार पर ‘अ जर्नी फ्रॉम मद्रास थ्रू द कंट्रीज ऑफ मैसूर, कैनारा एंड मालाबार’ में टीपू की क्रूरता, दुष्चरित्रता, मजहबी उन्माद के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है, ‘‘ब्राह्मणों ने मुझे बताया कि उनके परिवार में जो कन्याएं होती थीं, टीपू उन्हें अपने अन्तःपुर में ले जाता था। कुछ समय बाद जब उनसे मन भर जाता, तो उन लड़कियों को उनके माता-पिता के पास भेज देता था। इस प्रकार जो स्थान खाली हो जाता था, उसे क्रूर टीपू पुनः भर लेता था। टीपू में अपनी बहुसंख्यक प्रजा (हिंदुओं) की भावनाओं के प्रति रत्ती भर भी आदरभाव नहीं था। उसने जगह-जगह के असंख्य मंदिरों को ध्वंस किया और हिंदुओं को जबरन मुसलमान बनाया। टीपू का उद्देश्य संपूर्ण मालाबार का इस्लामीकरण करना था।’’
लीचीस राईस ने ‘हिस्ट्री ऑफ मैसूर’ में लिखा है, ‘‘टीपू के विस्तृत साम्राज्य में केवल दो मंदिर श्रीरंगपट्टनम किले के अंदर थे। उनमें नित्य पूजा होती थी और यह भी केवल ब्राह्मण ज्योतिषियों की सांत्वना के लिए था, जो उसकी जन्मपत्री देखते थे। 1790 ई. से पूर्व प्रत्येक हिंदू मंदिर की संपूर्ण संपत्ति जब्त कर ली गई थी।’’
पीसीएन राजा का कहना है कि टीपू का मूल उद्देश्य दक्षिण भारत का सम्राट बनना था। वह महराष्ट्र, कूर्ग, आवनकोर तथा निजाम को महत्व नहीं देता था। उसने फारस, अफगानिस्तान व टर्की से मदद मांगी थी, वह भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना चाहता था। वह निजाम की लड़की से विवाह करना चाहता था, परंतु शाही वंश का न होने के कारण विवाह न हुआ। (रिलीजस पॉलिसीज ऑफ टीपू सुल्तान, इतिहास दर्पण, भाग सात, नं. दो, अप्रैल-2002, पृ. 20-26)। मैसूर के विद्वान लेखक एम.ए. गोपाल राव ने एक लेख में लिखा कि टीपू की मृत्यु से पूर्व शासन के 65 उच्च पदों पर एक भी हिंदू नहीं था, सभी मुसलमान थे। केवल एक अपवाद पूर्णिया था। टीपू ने सभी प्रमुख स्थानों के नाम बदल दिए थे, जैसे-मंगलपुरी (मंगलौर) का जलालाबाद, कन्नौर (कषणपुरम) का कुशानाबाद, मैसूर का नजरबाद, डिंडिगुल का खालिकाबाद, रत्नगिरी का मुस्तफाबाद, कालीकट (कोजीकोड) का इस्लामाबाद आदि। टीपू के मरने के बाद पुनः कुछ पुराने नाम रखे गए।
विरासत में मिला हड़पा राज्य
मैसूर राज्य मूलतः वाडियार वंश का था। हैदर अली ने धोखे-षड्यंत्र से इसे हथिया लिया और टीपू को यही हड़पा हुआ राज्य विरासत में मिला। उसने शून्य से राज्य नहीं गढ़ा, बल्कि पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। गद्दी पर बैठते ही टीपू ने मैसूर को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया। मुस्लिम सुल्तानों की परंपरा के अनुसार, आम दरबार में टीपू ने घोषणा की, ‘मैं सभी काफिरों (गैर-मुस्लिमों) को मुसलमान बनाकर रहूंगा।’
उसने हिंदुओं के लिए फरमान जारी किया। मैसूर के गांव-गांव के मुस्लिम अधिकारियों को लिखित सूचना भेजी, ‘‘सभी हिंदुओं को इस्लाम में दीक्षा दो। जो स्वेच्छा से मुसलमान न बने, उसे बलपूर्वक मुसलमान बनाओ और जो विरोध करे उनका कत्ल करवा दो। उनकी स्त्रियों को पकड़कर शरिया कानून के अनुसार मुसलमानों में बांट दो।’’ मालाबार में नायरों (लगभग 30,000 बंदी) और मंगलौर में कैथोलिक ईसाइयों के जबरन कन्वर्जन के प्रमाण मिलते हैं। विरोध करने वालों को यातनाएं या मृत्युदंड दिया गया। यह ओटोमन खिलाफत से समर्थन पाने के उद्देश्य से किया गया था।
टीपू का एक शिलालेख है, जिसके शब्द इस प्रकार हैं-“हे सर्वशक्तिमान अल्लाह! काफिरों के समस्त समुदाय को समाप्त कर दे। उनकी सारी जाति को बिखेर दो, उनके पैरों को लड़खड़ा दो, अस्थिर कर दो! उनकी बुद्धियों को फेर दो! मृत्यु को उनके निकट ला दो, उनके पोषण के साधनों को नष्ट कर दो। उनकी जिंदगी के दिनों को कम कर दो। उनके शरीर सदैव चिंता का विषय बने रहें, उनके नेत्रों की दृष्टि छीन लो, उनके चेहरे काले कर दो, उनकी जीभ और बोलने के अंग को नष्ट कर दो! उन्हें शद्दाद की भांति कत्ल कर दो, जैसे फरऔन को डुबोया था, उन्हें भी डुबो दो और उन पर अपार क्रोध करो। हे संसार के मालिक, मुझे अपनी मदद दो।” (राव, सी. हयवदन, मैसूर गजेटियर भाग II, खंड IV, पृ. 2,697।)
ब्रिटिश अधिकारी एवं इतिहासकार मार्क विल्क्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Historical Sketches of the South of India (वॉल्यूम II)’ में टीपू सुल्तान के कूर्ग अभियान का वर्णन विस्तार से दिया है। वे लिखते हैं, ‘‘कूर्ग में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चला, हजारों लोगों को बंदी बनाया गया, उन्हें श्रीरंगपट्टनम ले जाया गया तथा कईयों को इस्लाम स्वीकार करने हेतु बाध्य किया गया। कुछ स्रोतों में बंदियों की संख्या 70,000 तक बताई गई है। विल्क्स के अनुसार यह केवल सैन्य विजय नहीं, बल्कि सामाजिक और मजहबी नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास था।
ब्रिटिश प्रशासक विलियम लोगान ने अपनी पुस्तक ‘Malabar Manual’ में टीपू के मालाबार अभियान का वर्णन किया है। उनके अनुसार, मालाबार में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चला, हजारों लोगों को बंदी बनाया गया, मंदिर क्षतिग्रस्त किए गए तथा सामाजिक-पांथिक संरचना प्रभावित हुई। टीपू के इन अभियानों ने क्षेत्र के समाज को गहरा आघात पहुंचाया।
मजहबी आततायी
टीपू सुल्तान की निजी डायरी ‘ड्रीम्स ऑफ टीपू सुल्तान’, जो ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित है, उसके मजहबी नजरिये को दर्शाती है। इसमें उसने स्वयं को इस्लाम का योद्धा बताया और अपने अभियानों को मजहबी नजरिये से प्रस्तुत किया। सी. हयवदन राव द्वारा संपादित मैसूर गजेटियर एवं अन्य स्रोतों के अनुसार, टीपू सुल्तान के अभियानों से कई मंदिर प्रभावित हुए। इनमें गुरुवायूर कृष्ण मंदिर, तिरुनवाया मंदिर, त्रिशूर एवं कालीकट क्षेत्र के मंदिर, कोयंबटूर के शिव मंदिर, त्रिक्कावु मंदिर (जिसे सैन्य गोदाम बनाया गया) आदि शामिल हैं। मैसूर गजेटियर के अनुसार, टीपू ने दक्षिण भारत में 800 से अधिक मंदिर नष्ट किए। के.पी. पद्मनाभ मेनन की ‘हिस्ट्री ऑफ कोचीन’ एवं श्रीधरन मेनन की ‘हिस्ट्री ऑफ केरल’ में त्रिप्रंगोट, थ्रिचैम्बरम, थिरुवन्नूर, कालीकट थाली, हेमम्बिका, पालघाट का जैन मंदिर, माम्मियूर आदि मंदिरों का उल्लेख है, जिन्हें टीपू ने नष्ट किया था।
मानसिकता उजागर करते पत्र

टीपू के अनेक पत्र ब्रिटिश लाइब्रेरी (इंडिया ऑफिस रिकॉर्ड्स) में सुरक्षित हैं। ये पत्र उसके द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों और उसकी जिहादी मानसिकता पर प्रकाश डालते हैं।
- 5 फरवरी, 1797 में जमान शाह को उसने पत्र लिखा था, ‘‘हमें काफिरों के विरुद्ध जिहाद के लिए एकजुट होना चाहिए।’’ यह दर्शाता है कि टीपू विदेशी मुस्लिम शासकों से सहायता पाना चाहता था।
- 22 मार्च, 1788 में कोडनचेरी के अब्दुल कादर को पत्र लिखा था, ‘‘बारह हजार से अधिक काफिरों को मुसलमान बना दिया गया है। उनमें कुछ नंबूदिरी भी थे। इन बातों को जगह-जगह काफिरों को बताओ। उन्हें बुलाकर इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहो।’’
- 19 जनवरी, 1790 को बदर-उज-जमान खान को पत्र लिखा था, ‘मैंने मालाबार में बड़ी विजय प्राप्त की और चार लाख से अधिक हिंदुओं को इस्लाम में परिवर्तित किया।’
- 1 दिसंबर, 1788 को उसने शेख कुतुब को लिखा, ‘‘मुझे तुम्हारी जानकारी पढ़कर खुशी हुई। तुम्हारी कैद में जितने भी काफिर 20 वर्ष से ज्यादा की उम्र के हैं, उन्हें पेड़ों से लटका कर फांसी दे दो। अगर वे किसी कोने या जंगलों में छिपे हुए हों, तो उन्हें खोज निकालो। इस काम के लिए दिलेर बिल खान की सेना को तीन टुकड़ियों में बांट दो।’’
- एक अन्य पत्र में उसने लिखा, ‘‘242 नायर कैदी भेज रहा हूं। उनके वर्गीकरण के मुताबिक एक कार्यक्रम भी साथ में है। उन्हें मुसलमान बना लो और पुरुषों को 6 फीट लंबा तथा स्त्रियों को आठ फीट लंबा कपड़ा तथा एक-एक चोली दे दो। इसके अलावा उन पर खास निगरानी रखना। अगर तुमने मेरा हुक्म नहीं माना या कोई कैदी छूट कर भाग गया, तो तुम्हें मेरे गुस्से का सामना करना पड़ेगा।’’
- 14 दिसंबर, 1788 को टीपू ने कालीकट के सेनानायक को लिखा, ‘‘मोर हुसैन अली को यहां से दो सहायकों के साथ भेजा गया है। अल्लाह की मेहरबानी से वे जल्दी ही पहुंच जाएंगे। उनके साथ मिलकर तुम सभी काफिरों को कैद कर लो या मार डालो। 20 वर्ष से कम के सभी पुरुषों को कैद कर लो। कम से कम पांच हजार लोगों को पेड़ों से लटकाकर फांसी दे दो। यह मेरा हुक्म है।’’
टीपू के जनानखाने में 601 महिलाएं थीं, जिनमें हैदर अली की 268 पत्नियां-रखेलें एवं टीपू की 333 पत्नियां-रखेलें। इनमें कुर्ग राजा की दो बहनें, मैसूर वाडियार घराने की तीन महिलाएं एवं पंडित पूर्णिया की भतीजी शामिल थीं। विद्वानों के अनुसार, इनमें अधिकांश हिंदू मूल की थीं।
टीपू द्वारा मालाबार को तबाह करने की रिपोर्ट इतिहासकार एम.जी.एस. की पुस्तक ‘कोझिक्कोडिंडे कथा’ (कोझिकोड की कहानी) में विस्तृत रूप से मिलती है। वे लिखते हैं कि टीपू का उद्देश्य ही मंदिरों को ध्वस्त करना था। उसने बड़ी संख्या में दक्षिण मालाबार के निवासियों को तलवार के बल पर इस्लाम में कन्वर्ट कर दिया (यही प्रमुख कारण है कि दक्षिण मालाबार में मुस्लिम आबादी अधिक है)। कोझिकोड में कन्वर्ट नहीं होने पर महिलाओं को लटकाने के बाद उनके गले में बच्चों को भी बांध कर लटका दिया जाता था। वहां टीपू के प्रति नफरत इतनी गहरी थी कि हाल तक मालाबार में आवारा कुत्तों के लिए ‘टीपू’ एक आम नाम बना रहा।
लीवीस बी. यूरो ने टीपू द्वारा मालाबार के हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों को महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी तथा नादिरशाह से अधिक बर्बर बताया है। इसी तरह, जर्मन मिशनरी गुनटेस्ट ने 1788 में टीपू के कोझिकोड में 60,000 सेना के साथ जाने तथा वहां के हिंदुओं को नेस्तनाबूद करने उल्लेख किया है।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और आईआईटी खड़गपुर के शोधार्थी रहे रजत सेठी के शोध के आधार पर निर्देशक पवन शर्मा द्वारा घोषित फिल्म ‘टीपू’ के अनाउंसमेंट वीडियो में यह दावा किया गया है कि इस क्रूर शासक ने 8,000 मंदिरों और 27 चर्चों को ध्वस्त किया था। यही नहीं, 40 लाख हिंदुओं को जबरन इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया, उन्हें गोमांस खिलाया गया। एक लाख से अधिक हिंदुओं को जेलों में ठूंसा गया तथा कालीकट में 200 ब्राह्मण परिवारों का नरसंहार किया गया। वीडियो में बताया गया है कि यह ‘जिहाद’ 1783 में शुरू हुआ था। वीडियो में जलते हुए मंदिरों को भी दिखा गया है।
टीपू की तलवार

“मेरी तलवार, जिसकी बुनियाद फतह है, काफिरों की रूहों पर बिजली बन गई। हैदर, दीन का सुल्तान, मेरी फतह में मेरा मददगार है।” टीपू की तलवारों पर अंकित ऐसी पंक्तियां, जो गैर-मुस्लिमों के प्रति उसकी सोच को दर्शाती हैं और ‘शमशेर-ए-मलिक-ओ-दीन’ (साम्राज्य और दीन की तलवार) जैसे उल्लेख उसके मजहबी कट्टरता और विस्तारवादी क्रूरता को रेखांकित करते हैं।
इतिहासकार टीपू को मजहबी रूप से कट्टर और उन शासकों में से एक मानते हैं, जिन्होंने गैर-मुस्लिमों के प्रति कठोर नीतियां अपनाईं। इतिहासकारों ने टीपू सुल्तान को मैसूर का शासक बताते हुए उसके शासन के दौरान कई अत्याचारों और जबरन धर्मांतरणों का भी उल्लेख किया है, विशेषकर मालाबार क्षेत्र में। उसकी तलवारों पर अंकित पंक्तियां, जैसे ‘काफिरों की रूहों पर बिजली बन गई’, उसके सैन्य अभियानों को मजहबी रंग देने और गैर-मुस्लिमों के प्रति उसकी क्रूरता को प्रमाणित करती हैं।
टीपू की तलवारों पर अरबी आयतें और अल्लाह की तारीफ में लिखी गई पंक्तियां स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि वह एक कट्टर मजहबी शासक था। इन तलवारों की मूठ पर बाघ की आकृति और धार पर ‘असदउल्लाह’ (अल्लाह का शेर) का उल्लेख भी मिलता है, जो उसके सैन्य अभियानों और मजहबी विश्वासों के गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। टीपू सुल्तान द्वारा इस्तेमाल की गई कुछ तलवारें, विशेषकर ‘बेडचेम्बर स्वॉर्ड’, पर अरबी और फारसी में मजहबी और विजय संबंधी पंक्तियां सुनहरे अक्षरों में लिखी हुई हैं। इन पर ‘शमशीर-ए-मलिक’ (शहंशाह की तलवार), सात बार अल्लाह और उसके पिता हैदर अली के सम्मान में ‘हैदर’ अंकित है। ये सब उसकी सोच को परिलक्षित करता है कि वह खुद को इस्लाम, साम्राज्य का रक्षक और विस्तारक मानता था। 1799 में श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई के बाद अंग्रेजों द्वारा जब्त की गई तलवारों में से एक 2023 में क्रिस्टीज नीलामी घर में नीलाम हुई थी।
इतिहास की कसौटी
इतिहास केवल अतीत का वर्णन नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। राष्ट्र-नायक तलवार की शक्ति से नहीं, अपितु चरित्र, आदर्श, सहिष्णुता, न्याय एवं राष्ट्र-निर्माण के कार्यों से बनते हैं। इसलिए महत्वपूर्ण प्रश्न है-हम किसे नायक मानें, आगामी पीढ़ियों को किस आदर्श के रूप में प्रस्तुत करें तथा कैसी राष्ट्रीय चेतना गढ़ें? भारत की परंपरा सदैव न्याय, सत्य एवं धर्म की पक्षधर रही है। यहां व्यक्ति का मूल्यांकन उसके मत-पंथ, जाति से नहीं, कर्म, चरित्र एवं राष्ट्र के प्रति योगदान से होता है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण भारतीय सांस्कृतिक परंपरा है, जहां विद्वान ब्राह्मण रावण को भी उसके अन्याय, अहंकार एवं अत्याचार के कारण प्रतिवर्ष दशहरा पर जलाया जाता है। यह परंपरा घोषित करती है कि भारत में पूजा व्यक्ति के आचरण एवं स्थापित आदर्शों की होती है, न कि जाति-पंथ की।
इस कसौटी पर छत्रपति शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व को देखते हैं, तो वे केवल शासक नहीं, राष्ट्र निर्माता के रूप में उभरते हैं। उन्होंने शून्य से स्वराज्य की स्थापना की, न्यायपूर्ण एवं समावेशी शासन-व्यवस्था बनाई तथा सभी पंथों-समुदायों के प्रति समान सम्मान का व्यवहार किया। उनका संघर्ष अन्याय-अत्याचार के विरुद्ध था, न कि किसी पंथ के।
इसके विपरीत, मार्क विल्क्स, विलियम लोगान एवं विक्रम संपत जैसे इतिहासकारों ने टीपू सुल्तान के शासन का मूल्यांकन किया है। इनकी व्याख्या में कूर्ग, मालाबार और अन्य क्षेत्रों में टीपू के कठोर सैन्य अभियानों, बड़े पैमाने पर बंदीकरण एवं मजहबी भाषा में युद्ध-व्याख्या जैसे तथ्य सामने आते हैं। टीपू ने अपवाद स्वरूप केवल दो मंदिरों को स्वार्थवश अनुदान दिए तथा शृंगेरी के शंकराचार्य को कन्नड़ में कुछ पत्र लिखे थे। इसी को आधार बनाकर वामपंथी इतिहासकारों ने टीपू की महानता के गुणगान किए।
कायरता के प्रमाण

लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में इंडियन ऑफिस रिकॉर्ड्स सुरक्षित हैं, जहां 18वीं शताब्दी की ब्रिटिश-भारतीय संधियों के मूल दस्तावेज रखे गए हैं। श्रीरंगपट्टनम संधि और इससे संबंधित दस्तावेज भी हैं, जो टीपू सुल्तान की कायरता एवं निकृष्टता को उजागर करते हैं। फिर भी कुछ इतिहासकारों ने शेर-बाघ बनाकर उसे महिमामंडित किया। अंग्रेजों और मैसूर सल्तनत के बीच चार युद्ध हुए, जिनमें पहले दो युद्ध टीपू के पिता हैदर अली ने लड़े, जबकि तीसरा और चौथा युद्ध टीपू सुल्तान ने।
तीसरा एंग्लो-मैसूर युद्ध 1790 से 1792 के बीच लड़ा गया, जिसमें टीपू बुरी तरह पराजित हुआ। जब ब्रिटिश सेना ने राजधानी श्रीरंगपट्टनम को घेर लिया, तब टीपू ने अंग्रेजों के सेनापति गवर्नर लॉर्ड कॉर्नवालिस को पत्र लिखकर दोस्ती और शांति की गुहार लगाई थी। टीपू के समकालीन ले. कर्नल मार्क विल्किस ने 1810 में लिखित पुस्तक ‘हिस्टॉरिकल स्केचेज ऑफ द साउथ ऑफ इंडिया : इन एन अटेम्प्ट टू ट्रेस द हिस्ट्री ऑफ मैसूर’ में इस पत्र के बारे में विस्तार से लिखा है।
टीपू के पत्र लिखने के बाद ही 18 मार्च, 1772 को श्रीरंगपट्टनम की संधि हुई थी। इसके अनुसार टीपू को आधा राज्य अंग्रेजों, निजाम एवं मराठों को देना पड़ा, साथ ही युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में 3.3 करोड़ रुपये का जुर्माना चुकाना पड़ा था। रकम की गारंटी हेतु टीपू ने पहले दो बड़े पुत्रों अब्दुल खालिक (11 वर्ष) व मुईनुद्दीन (9 वर्ष) को अंग्रेजों के पास गिरवी रखा, लेकिन जब अंग्रेज नहीं माने तो बाकी की किस्तों की गारंटी के लिए शेष दो पुत्रों अब्दुल खालिक (8 वर्ष) और मुहीउद्दीन को भी गिरवी रख दिया। दो साल बाद पूरी रकम देने के बाद 1794 में अंग्रेजों ने दोनों को रिहा किया।
200 साल से दीपावली पर अंधेरा
टीपू की क्रूरता के कारण कर्नाटक के मांड्या जिले के मेलकोटे गांव में 200 साल से दीपावली नहीं मनाई जाती है। टीपू के शासनकाल में इस गांव के अयंगर ब्राह्मण दीपावली मनाने के लिए श्रीरंगपट्टनम के नरसिम्हा मंदिर में एकत्र हुए थे। लेकिन टीपू ने दीपावली के दिन मंदिर के जंगली हाथी छोड़ दिए और मंदिर के दरवाजे बंद करवा दिए। इसमें 700 से अधिक अयंगर ब्राह्मण मारे गए थे।
यहां मूल प्रश्न इतिहास से परे नैतिकता एवं राष्ट्रीय चेतना का है। क्या मजहबी दमन, कठोर सैन्य अभियानों एवं मजहबी भाषा वाले युद्ध-उल्लेखों वाला शासक उसी स्तर का राष्ट्रनायक हो सकता है, जिस स्तर का सहिष्णुता, न्याय एवं स्वराज्य स्थापित करने वाला राष्ट्र निर्माता होता है? भारत ने सदैव उन व्यक्तित्वों को नायक माना है, जिन्होंने राष्ट्र को जोड़ा, समाज को सशक्त बनाया तथा मानवता के उच्च आदर्श स्थापित किए। अशफाक उल्ला खान ने स्वतंत्रता हेतु जीवन बलिदान किया, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने विज्ञान, शिक्षा एवं राष्ट्र-निर्माण से भारत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया-ये भारतीयता की आत्मा के प्रतीक हैं। इनका सम्मान उनके राष्ट्र-मानवता समर्पण के कारण है।
इतिहास सिखाता है कि राष्ट्र शक्ति से नहीं, नैतिकता, न्याय एवं समावेशिता से महान बनता है। समाज जोड़ने वाला राष्ट्र निर्माता होता है, जबकि सत्ता रक्षक मात्र क्षेत्रीय शासक। इस अंतर को समझना अत्यावश्यक है। इसलिए छत्रपति शिवाजी महाराज और टीपू सुल्तान की तुलना ऐतिहासिक एवं वैचारिक दृष्टि से उचित नहीं है। शिवाजी महाराज स्वराज्य, सहिष्णुता एवं राष्ट्र निर्माण के प्रतीक हैं। उन्होंने ऐसी चेतना गढ़ी जो मृत्यु के बाद भी अटल रही तथा भारत के राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास को नई दिशा दी।
आज आवश्यकता है आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र निर्माण, सहिष्णुता, न्याय एवं मानवता के मार्ग पर प्रेरित करने वाले आदर्शों की। इतिहास का उद्देश्य केवल अतीत जानना नहीं, बल्कि भविष्य को दिशा देना है। सत्य, न्याय एवं राष्ट्र निर्माण के आदर्श अपनाकर हम मजबूत, समावेशी एवं जागरूक राष्ट्र गढ़ सकते हैं। भारत की संस्कृति का मूल संदेश यही है कि नायक वही जो राष्ट्र की आत्मा जाग्रत करे। इस कसौटी पर छत्रपति शिवाजी महाराज का स्थान अद्वितीय एवं अनुपम है।















