दिल्ली दंगों की साजिश के आरोप में पिछले कई वर्षों से जेल में बंद उमर खालिद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। कारण उनकी रिहाई नहीं, बल्कि उन पर लिखी गई एक किताब है- ‘Umar Khalid and his World’। इस कलेक्शन में इतिहासकार रोमिला थापर और रामचंद्र गुहा, एकेडमिक आनंद तेलतुंबड़े, लेखक मुकुल केसवन, कांग्रेस एमएलए जिग्नेश मेवाणी, न्यूयॉर्क शहर के मेयर ज़ोहरान ममदानी, और एक्टर प्रकाश राज और स्वरा भास्कर के निबंध और मैसेज शामिल हैं। इस वॉल्यूम में खुद उमर के भी कई निबंध शामिल हैं।
कल प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हुए इसके विमोचन ने एक बड़े नैतिक और कानूनी विमर्श को जन्म दिया है: क्या एक ऐसे व्यक्ति का ‘महिमामंडन’ किया जाना चाहिए जिस पर देश के खिलाफ साजिश रचने जैसे गंभीर आरोप हों और जिसे अदालतों ने अब तक जमानत के योग्य न माना हो?
प्रेस क्लब में आंदोलनजीवियों का जमावड़ा
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के कई पत्रकारों, लेखकों और आंदोलनजीवियों ने शिरकत की। उपस्थित लोगों में सिद्धार्थ वरदराजन, अपूर्वानंद, परंजय गुहा ठाकुरता और कई वामपंथी विचारधारा से जुड़े आंदोलनजीवी शामिल थे।
किताब का संपादन बनोज्योत्सना लाहिड़ी, शुद्धब्रत सेनगुप्ता, अनिर्बाण भट्टाचार्य ने किया है। निमंत्रण पत्र में श्रीनिवासन जैन, साबिहा खानम, गौतम भाटिया, नेहा दीक्षित, अपेक्षा प्रियदर्शिनी, साबिका नकवी, दानिश अली का नाम छपा था।
किताब रिलीज़ करने वाले जर्नलिस्ट श्रीनिवासन जैन ने कहा- “जैसा कि आप क्रोनोलॉजी समझिए। यह क्रोनोलॉजी किसी को समझ नहीं आ रही है कि सुबह आप अपने क्रिटिक्स को जेल में डालते हैं, और शाम को आप कहते हैं कि आप डेमोक्रेसी की मां हैं….”
कार्यक्रम का मुख्य स्वर यह था कि उमर खालिद को ‘असहमति की आवाज’ दबाने के लिए निशाना बनाया जा रहा है। वक्ताओं ने तर्क दिया कि खालिद के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं और उन्हें बिना मुकदमे के लंबे समय तक जेल में रखना मानवाधिकारों का उल्लंघन है। लेकिन यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या यह केवल ‘असहमति’ है या कुछ और?
न्यायालय का रुख और UAPA की गंभीरता
जहाँ एक ओर आंदोलनजीवी और अर्बन नक्सल समूह इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ बता रहा है, वहीं देश की सर्वोच्च अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट का रुख अलग रहा है।
• न्यायिक अवलोकन : अदालतों ने बार-बार उमर खालिद की जमानत याचिकाओं को खारिज किया है। अभियोजन पक्ष (पुलिस) का दावा है कि खालिद ने 2020 के दिल्ली दंगों की सोची-समझी साजिश रची थी।
• UAPA की धाराएं : गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जमानत मिलना अत्यंत कठिन है क्योंकि इसमें प्रथम दृष्टया (prima facie) आरोपों की गंभीरता को देखा जाता है। जब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने सबूतों को देखते हुए जमानत नहीं दी, तो सार्वजनिक मंचों पर उसे ‘निर्दोष’ या ‘नायक’ की तरह पेश करना न्यायपालिका की समझ पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
‘महिमामंडन’ पर विवाद: अभिव्यक्ति बनाम राष्ट्रहित
एक वर्ग का मानना है कि यह किताब और यह कार्यक्रम एक आरोपी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश है। जब मामला विचाराधीन हो, तो ऐसे आयोजन, गवाहों और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास माने जा सकते हैं।
• पीड़ितों का पक्ष : दिल्ली दंगों में जान-माल का नुकसान उठाने वाले परिवारों के लिए यह देखना ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ हो सकता है कि जिस व्यक्ति पर हिंसा भड़काने का आरोप है, उसे ‘प्रतिरोध का प्रतीक’ बताकर पेश किया जा रहा है।
• संस्थानों की भूमिका : प्रेस क्लब जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में ऐसे कार्यक्रमों का होना यह दर्शाता है कि वैचारिक ध्रुवीकरण कितना गहरा है। वैसे एडिटर्स गिल्ड और प्रेस क्लब आफ इंडिया पर यह आरोप लगता रहा है कि ये दोनों संस्थाएं वामपंथियों और आंदोलनजीवियों के प्रति सहानुभूति रखती हैं। प्रेस क्लब आफ इंडिया के निर्वाचित पदाधिकारियों को एक बार विचार करना चाहिए कि क्या एक आरोपी के लिए इस तरह का मंच प्रदान करना पत्रकारिता के तटस्थ धर्म के अनुकूल है?
बुद्धिजीवियों का दोहरा मापदंड?
यही आंदोलनजीवी वर्ग अन्य विचारधारा के आरोपियों के मामले में ‘कानून को अपना काम करने देने’ की बात करता है, लेकिन जब बात उमर खालिद की आती है, तो वे सीधे कानून और अदालत की प्रक्रिया को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। क्या किसी की ‘बौद्धिक पृष्ठभूमि’ या ‘लेखन क्षमता’ उसे देश के कानून से ऊपर बना देती है?
दो समांतर छोर
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन वह राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा की कीमत पर नहीं हो सकता। उमर खालिद दोषी हैं या नहीं, इसका निर्णय केवल अदालत करेगी। तब तक, किसी आरोपी को ‘शहीद’ या ‘महान क्रांतिकारी’ के रूप में पेश करना समाज में भ्रम की स्थिति पैदा करता है।
प्रेस क्लब में हुई इस बुक लॉन्चिंग ने यह साफ कर दिया है कि भारत में ‘सत्य’ के दो समांतर छोर बन गए हैं। एक छोर पर कानून की प्रक्रिया है, तो दूसरे छोर पर वामपंथियों, आंदोलनजीवियों और अर्बन नक्सल समूह की वैचारिक निष्ठा है। अंततः, न्याय की जीत तभी होगी जब भावनाओं और विमर्श के बजाय तथ्यों और साक्ष्यों को प्राथमिकता मिले।
















