भारत के सबसे सख्त कानूनों में गिने जाने वाले यूएपीए (UAPA) को लेकर इस समय सुप्रीम कोर्ट में बड़ी बहस चल रही है। यह बहस सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा और लोगों की आजादी से भी जुड़ी हुई है। सवाल यह है कि अगर किसी आरोपी का ट्रायल कई सालों तक पूरा नहीं होता, तो क्या उसे सिर्फ देरी के आधार पर जमानत मिलनी चाहिए?
बेल पर सरकार का सख्त रुख
सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कोर्ट में दलील दी कि अगर बड़े आतंकवादी मामलों में ट्रायल कई गवाहों और सबूतों की मौजूदगी के कारण लंबे समय तक चलते हैं, तो क्या ऐसे आरोपियों को भी बेल दी जाएगी? उन्होंने अजमल कसाब और हाफिज सईद जैसे नामों का उदाहरण देते हुए कहा कि सिर्फ समय बीतने से जमानत देना सही नहीं होगा। सरकार का मानना है कि कोर्ट को आरोपी की भूमिका और अपराध की गंभीरता को भी देखना चाहिए।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग बेंचों ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय दी है। मई 2026 में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से जेल में है और ट्रायल पूरा नहीं हो रहा, तो उसे जमानत मिलनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि “बेल सामान्य नियम है और जेल अपवाद।” यह सिद्धांत यूएपीए मामलों में भी लागू होना चाहिए। लेकिन जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच ने दिल्ली दंगा मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से मना कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि केवल लंबे समय तक जेल में रहने को जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। अगर आरोप गंभीर हैं, तो अदालत को उसे भी ध्यान में रखना होगा। इसी मतभेद को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को अब बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। अब नई बेंच तय करेगी कि यूएपीए मामलों में जमानत का सही नियम क्या होना चाहिए। इस फैसले का असर आने वाले समय में कई मामलों पर पड़ेगा।
















