पायजामे का नाड़ा खोलना, रेप की कोशिश! : सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का विवादित फैसला, जजों को लेकर भी कही बड़ी बात
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पायजामे का नाड़ा खोलना, रेप की कोशिश! : सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का विवादित फैसला, जजों को लेकर भी कही बड़ी बात

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला को गलत तरीके से छूना और पायजामे की डोरी खोलना रेप का प्रयास माना जाएगा। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए POCSO के तहत आरोप बहाल।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Feb 18, 2026, 04:39 pm IST
inभारत, उत्तर प्रदेश, दिल्ली
supreme court

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि किसी महिला को गलत तरीके से छूना और उसके पायजामे की डोरी खोलना रेप का प्रयास माना जाएगा। अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादास्पद फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें इस कृत्य को रेप का प्रयास नहीं बल्कि केवल तैयारी बताया गया था।

बता दें कि इस फैसले को महिलाओं की सुरक्षा और न्यायिक संवेदनशीलता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर उठा था विवाद

दरअसल 17 मार्च 2025 को आए इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। NGO We the Women की संस्थापक अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने इस पर आपत्ति जताते हुए पत्र लिखा, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया।

अब सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया है। साथ ही POCSO एक्ट के तहत दो आरोपियों पर रेप की कोशिश का सख्त आरोप बहाल कर दिया गया है।

महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता जरूरी : सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का और शोभा गुप्ता ने अदालत से यौन अपराधों के मामलों में अधिक संवेदनशीलता बरतने की अपील की। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि जब तक जज वादी की परिस्थितियों और उसके संघर्ष को समझने में संवेदनशील नहीं होंगे, तब तक पूर्ण न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती।

सीजेआई सूर्यकांत ने अपने फैसले में लिखा कि न्यायाधीशों को केवल कानूनी और संवैधानिक सिद्धांतों का पालन ही नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने निर्णयों में दया, सहानुभूति और मानवता भी झलकनी चाहिए।

न्यायिक प्रक्रियाओं में दया और मानवता पर जोर

अदालत ने कहा कि न्यायिक फैसले केवल कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं होने चाहिए। चाहे वह प्रक्रिया तय करने का मामला हो या अंतिम निर्णय देने का, हर स्तर पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। यही एक निष्पक्ष और प्रभावी न्याय व्यवस्था की बुनियाद है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही जजों को संवेदनशील बनाने के लिए सिद्धांत निर्धारित कर चुका है, इसलिए नए दिशा-निर्देश बनाने के बजाय उन्हीं सिद्धांतों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा।

जजों में संवेदनशीलता लाने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित

सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी के निदेशक जस्टिस अनिरुद्ध बोस से विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का अनुरोध किया है। यह समिति यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक सहानुभूतिपूर्ण और मानवीय बनाने के उपायों पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी।

अदालत ने यह उम्मीद भी जताई कि प्रस्तावित दिशा-निर्देश अत्यधिक जटिल या विदेशी शब्दावली से भरे न हों, बल्कि सरल और व्यवहारिक हों ताकि जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव दिख सके।

Topics: सुप्रीम कोर्ट फैसलाCJI Suryakant decision women safetyPOCSO एक्टpajama string attempt to rape case Indiaइलाहाबाद हाई कोर्ट विवादमहिला सुरक्षा कानूनसीजेआई सूर्यकांतजॉयमाल्या बागचीएनवी अंजारियाशोभा गुप्ताSupreme Court attempt to rape rulingAllahabad High Court verdict quashedरेप की कोशिशPOCSO Act latest judgment
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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