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सनातन मूल्यों का नृत्य उत्सव

नई दिल्ली के कमानी सभागार में आयोजित पांच दिवसीय कलायात्रा-2026 में 125 कलाकारों ने 10 नवीन नृत्य रचनाओं-अमृत मंथन, अतिजीवनम्, नादस्वरूपम्, गिरिजा कल्याण आदि के माध्यम से राम-कृष्ण आख्यानों को प्रस्तुत किया। डॉ. सोनल मानसिंह के नेतृत्व में यह सांस्कृतिक संवाद सनातन मूल्यों को जीवंत करने वाला रहा

Written byशशिप्रभा तिवारीशशिप्रभा तिवारी
Feb 18, 2026, 10:18 pm IST
inविश्लेषण, दिल्ली, कला-साहित्य
कलायात्रा 2026 में नृत्य संरचना- समुद्र मंथन का दृश्य

कलायात्रा 2026 में नृत्य संरचना- समुद्र मंथन का दृश्य

गत दिनों नई दिल्ली के कमानी सभागार में कला यात्रा-2026 का आयोजन किया गया। कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग-दिल्ली सरकार, सेंटर फाॅर क्लासिकल डांस और श्री कामाख्या कलापीठ द्वारा आयोजित यह पांच दिवसीय नृत्य उत्सव नवीन नृत्य संरचनाओं की प्रस्तुति का अवसर था। जनवरी के अंतिम सप्ताह में दो चरणों में संपन्न इस उत्सव में लंबे समय बाद बड़ी संख्या में कलाकार एक छत्र के नीचे दिखे।

इस उत्सव में दस समूहों के लगभग 125 कलाकारों ने ‘अमृत मंथन‘, ‘अति जीवनम्‘, ‘नादस्वरूपम् देविम् नमामि‘, ‘गिरिजा कल्याण‘, ‘सीता बिबाह बिहार‘, ‘कर्ण-बाउंड बाई फेट‘, ‘दुर्योधन‘, ‘चक्रव्यूह‘, ‘सौंधिकहरणम्’ और ‘मातृका‘ जैसी नृत्य प्रस्तुतियां दीं। इन नृत्य रचनाओं में श्रीराम और श्रीकृष्ण से जुड़े प्राचीन आख्यानों को नए कलेवर में पेश किया गया। भारतीय सांस्कृतिक वांग्मय में दर्शन, साहित्य, आख्यानों और लोककथाओं के माध्यम से सुर-असुर, नीति-अनीति का वर्णन सहजता से किया गया है। इससे व्यक्ति और समाज का यथार्थ बोध स्वाभाविक रूप से प्राप्त होता है।

कला यात्रा-2026 के आयोजन के बारे में प्रख्यात नृत्यांगना डाॅ. सोनल मानसिंह ने कहा कि यह मात्र नृत्य संरचना उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद का माध्यम है। हम सोशल मीडिया, यूट्यूब और इंस्टाग्राम से अलग हटकर अपनी ऊर्जा को नए विचारों व दिशाओं में लगाने के लिए नए कलाकारों को आगे लेकर आए हैं। हम सबकी जिम्मेदारी है कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए समय निकालें, वरना सनातन का यह प्रवाह धीरे-धीरे सूखने लगेगा। कलाएं ही हमारे देश और संस्कृति की प्राण हैं। यदि वे न रहेंगी, तो यह शरीर मृतप्राय हो जाएगा।

इस समारोह का आरंभ 13 जनवरी को नृत्य रचना ‘अमृत मंथन’ से हुआ। इसकी परिकल्पना व निर्देशन गुरु डॉ. सोनल मानसिंह ने किया। सेंटर फॉर इंडियन क्लासिकल डांसेज व श्री कामाख्या कलापीठ के कलाकारों ने भरतनाट्यम, ओडिसी, कथक, मोहिनीअट्टम और छऊ शैलियों का अनूठा संयोजन प्रस्तुत किया। प्रस्तुति का मूल संदेश था कि समुद्र मंथन की भाँति आत्ममंथन से मानवीय चेतना जागृत हो सकती है। सुर-असुर मंदार पर्वत को मथनी व वासुकी को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन किया, जिससे 14 रत्न, अमृत व विष प्राप्त हुए। भगवान शिव विष पान कर नीलकंठ कहलाए, जबकि विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। प्रस्तुति में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) व त्रिदेवी (ब्रह्माणी, लक्ष्मी, पार्वती) के दृश्य नृत्य, संवाद, सज्जा व अभिनय बहुत मनोहारी रहा। एन. रविकिरण के संगीत ने इसे और प्रभावी बना दिया।

कथकली शैली में नृत्य रचना ‘अतिजीवनम्’ प्रस्तुत की गई। इंटरनेशनल सेंटर फॉर कथकली की इस प्रस्तुति की परिकल्पना गुरु सदानम बालाकृष्णन ने की, जबकि संगीत रचना कोट्टकल जयन ने तैयार की थी। इस नवाचारी प्रदर्शन में पर्यावरण संतुलन व संरक्षण पर जोर दिया गया। पंचतत्व, जैसे-आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी की पवित्रता को नृत्य के माध्यम से दर्शाया गया। यह सामूहिक कथकली एक अनूठे अंदाज में रची गई।

केरल में नैशादी देवी यानी देवी सरस्वती को नाद की देवी माना जाता है। उनकी वंदना ‘नादस्वरूपम् देविम् नमामि’ को सात श्लोकों में सात अलग-अलग रागों व तालों के साथ प्रस्तुत किया गया। त्रिकाल गुरुकुलम के कलाकारों ने इसे मोहिनीअट्टम शैली में नृत्यबद्ध कर मोह लिया, जिसकी परिकल्पना प्रो. दीप्ति ओमचेरी भल्ला ने की थी। इसी तरह, यक्षगान शैली में ‘गिरिजा कल्याण’ नृत्य रचना प्रस्तुत हुई, जिसमें देवी पार्वती के विवाह प्रसंग को चित्रित किया गया। इसकी परिकल्पना गुरु के. शिवानंद हेगड़े ने की थी।

कलायात्रा 2026 में सत्रीय नृत्य शैली में ‘सीता बिबाह बिहार’ प्रस्तुत किया गया। श्रीमंत शंकरदेव की रचना रामविजय नाट पर आधारित इस नृत्य में भगवान श्रीराम व सीता के विवाह प्रसंग का चित्रण हुआ, जिसकी परिकल्पना भाबनानंद बरबायन ने की थी। उत्सव में शांख्य डांस कंपनी ने भरतनाट्यम में ‘कर्ण-बाउंड बाय फेट’ पेश किया। वैभव आरेकर की परिकल्पना में महाभारत के नायक कर्ण के जन्म व जीवन प्रसंगों को दर्शाया गया।

वहीं, ओडिसी शैली में दुर्योधन के बहुआयामी चरित्र (अहंकारी किंतु प्रजा-प्रिय व भाइयों के शोकाकुल) को पंडित नित्यानंद मिश्र के आलेख पर आधारित गुरु रति कांत महापात्र की परिकल्पना से ‘सृजन’ के कलाकारों ने अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया। इसी क्रम में मयूरभंज छऊ व कलरिपयट्टु शैलियों में पिरोई ‘चक्रव्यूह’ नृत्य रचना में अभिमन्यु के प्रसंग को श्रीराम भारतीय कला केंद्र के कलाकारों ने गुरु शशिधर आचार्य की परिकल्पना से जीवंत किया।

कलायात्रा उत्सव की अंतिम संध्या में चिदाकाश कलालय के कलाकारों ने मार्ग नाट्य शैली में ‘सौगंधिकाहरणम्’ नृत्य रचना प्रस्तुत की। गुरु पियाल भट्टाचार्य की परिकल्पना और दूर्बा सिंह रॉयचौधरी की संगीत संरचना से सजी यह प्रस्तुति द्रौपदी-भीम प्रसंग पर आधारित थी। जब द्रौपदी के आग्रह पर सौगंधिका पुष्प लाने गए भीम की भेंट वीर हनुमान से हुई, तब उन्होंने अपने दिव्य स्वरूप से उन्हें सनातन धर्म से परिचित कराया था। साम गायन, संवाद, नृत्य व अभिनय के माध्यम से कलाकारों ने इसे अत्यंत रोमांचक व आकर्षक बना दिया।
उत्सव का समापन रेनबो डांस ट्रुप के नृत्य से हुआ। रात्रि दास की रचना ‘मातृका’ में नर्तकियों ने देवी की नौ मातृ शक्तियों—ब्राह्मी, वैष्णवी, नृसिंही, वाराही, कौमारी, ऐंद्री, विनायकी, चामुंडेश्वरी को निरूपित किया। इस प्रस्तुति में सृजन, संरक्षण व परिवर्तन के प्रतीक स्वरूप शक्ति का चित्रण किया गया।

संस्कृतिविद् डॉ. सोनल मानसिंह के नेतृत्व में राजधानी दिल्ली में यह समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। देश के कई प्रसिद्ध साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी इस आयोजन के साक्षी बने। इनमें डाॅ सच्चिदानंद जोशी, ए. सूर्यप्रकाश, अभिजीत गोखल, जयराम राव, वनश्री राव, रंजना गौहर, शोवना नारायण, शाश्वती सेन, प्रतिभा प्रहलाद, सिंधु मिश्रा, माधवी मुद्गल, नलिनी-कमलिनी, शोभा दीपक सिंह, हेलेन आचार्य, कविता द्विवेदी आदि शामिल रहे।

Topics: वैष्णवीनृसिंहीसाहित्यवाराहीअग्निकौमारीपाञ्चजन्य विशेषविनायकीसंवादए. सूर्यप्रकाशसिंधु मिश्राजयराम राववनश्री राव‘गिरिजा कल्याण‘माधवी मुद्गल‘दुर्योधन‘शोभा दीपक सिंह‘चक्रव्यूह‘FEATURD
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