महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल के एक बयान ने देश में सियासी भूचाल पैदा कर दिया। सपकाल ने छत्रपति शिवाजी महाराज के संघर्ष की तुलना कट्टरपंथी टीपू से की। सपकाल के खिलाफ केस भी दर्ज कर लिया गया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने उनके इस बयान को शर्मनाक बताया। वहीं, हर्षवर्धन सपकाल का कहना है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा और उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। बाद में हर्षवर्धन ने मांफी मांगी।
टीपू विवाद की शुरुआत
मालेगांव नगर निगम की उपमहापौर शान-ए-ह हिंद निहाल अहमद के कार्यालय में टीपू की तस्वीर लगाने से विवाद की शुरुआत हुई। तस्वीर को लेकर शिवसेना पार्षदों और हिंदू संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई। विवाद थमा भी नहीं था कि हर्षवर्धन सपकाल ने बयान दे दिया। टीपू पर मचे बवाल में असदुद्दीन ओवैसी भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए मैदान में उतरे। उन्होंने कहा कि टीपू सुल्तान अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए थे।
भारत की राजनीति इतनी अजीब है कि यहां मजहब के नाम पर खलनायक को भी नायक की तरह पूजा जाता है। औरंगजेब की कब्र पर फूल चढ़ाए जाते हैं तो किसी यूनिवर्सिटी में जिन्ना जैसे गद्दारों की तस्वीर लगाई जाती है।
अंग्रेजों और मैसूर सल्तनत के बीच यार युद्ध
टीपू की कारगुजारियों की चर्चा करे तो अंग्रेजों और मैसूर सल्तनत के बीच चार युद्ध हुए थे। पहले दो युद्ध टीपू के अब्बा हैदर अली ने लड़े और तीसरा और चौथा युद्ध टीपू ने अंग्रेजों से लड़ा था। तीसरा एंग्लो मैसूर युद्ध 1790 से लेकर 1792 के बीच चला। इस युद्ध में टीपू की बुरी तरह से हार हुई थी। तीसरे युद्ध में जब अंग्रेज सेना ने राजधानी श्रीरंगपट्टनम को घेर लिया तब टीपू ने अंग्रेजों के सेनापति गवर्नर लॉर्ड कॉर्नवालिस को एक पत्र लिखा। इसमें उसने अंग्रेजों से दोस्ती और शांति की गुहार लगाई। इस पत्र को लेफ्टिनेंट कर्नल मार्क विल्किस द्वारा 1810 में लिखित मशहूर पुस्तक “हिस्टॉरिकल स्केचेज़ ऑफ़ द साउथ ऑफ़ इंडिया, इन एन अटेम्प्ट टू ट्रेस द हिस्ट्री ऑफ मैसूर” में विस्तार के साथ उल्लेखित किया गया है।
अंग्रेजों से संधि और बेटों को बंधक बनाया
मार्क विल्किस टीपू के समकालीन थे। कार्नवालिस को लिखे पत्र में टीपू ने अंग्रेजों से संधि करने की गुहार लगाई थी, जिसे अंग्रेजों ने स्वीकार कर लिया था। इसके उपरांत हुई संधि को इतिहास में श्रीरंगपट्टनम संधि के नाम से जाना जाता है। 18 मार्च 1792 को हुई संधि के मुताबिक टीपू ने अपने राज्य का आधा हिस्सा अंग्रेजों को सौंप दिया था। इस संधि में उसने अंग्रेजों को 3 करोड़ रुपये का हर्जाना देना स्वीकार किया। इस संधि की सबसे शर्मनाक शर्त के मुताबिक टीपू अपने दो अबोध पुत्रों 8 साल के अब्दुल खालिक और 5 साल के मोइनुद्दीन को अंग्रेजों को बंधकों के रूप में सौंप दिया था। टीपू ने यह वादा किया कि जब तक वह तीन करोड़ अंग्रेजों को नहीं दे देता तब तक उसके दोनों बेटे बंधक के तौर पर रहेंगे। अंग्रेजों ने इन दोनों बेटों को मद्रास में कैद करके रखा और जब 2 साल बाद जब टीपू ने अंग्रेजों को ₹3 करोड़ दे दिए तब इसके बदले में दोनों को 1794 में रिहा किया गया।
राज्य को दारुल इस्लाम बनाना था मकसद
टीपू का मकसद अपने राज्य को दारुल इस्लाम बनाना था। उसने 18वीं शताब्दी में तलवार के बल पर लाखों हिंदुओं को मुसलमान बनाया। टीपू के बारे में मशहूर है कि वह हिंदुओं के सामने तलवार या टोपी का विकल्प पेश करता था। दूसरे शब्दों में इस्लामी टोपी पहनकर मुसलमान बन जाओ वरना तलवार से सर कटवा लो। टीपू की इस खतरनाक सोच का सबूत उसकी राजकीय घोषणा में मिलता है।यह एक तरह का उसका संविधान था। इस राजकीय घोषणा का शीर्षक सरकार-ए-खुदादाद यानी खुदा द्वारा दी गई सरकार थी। टीपू की राजकीय घोषणा के अनुसार यह अटल उद्देश्य है कि उन निकम्मे और जिद्दी काफिरों को जिन्होंने सच्चे ईमान वालों यानी मुसलमानों की आज्ञा को मानने से इंकार कर दिया है उन्हें ईमान वालों यानी मुसलमानों के हाथों दंडित किया जाएगा। काफिरों को सच्चा मजहब स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाएगा।
टीपू ने हिंदुओं का नसरसंहार किया
टीपू ने खुद अपने लिखे पत्रों और दस्तावेजों में यह स्वीकार किया है कि उसने बड़े पैमाने पर हिंदुओं का नरसंहार किया और उनका जबरन इस्लामिक कन्वर्जन करवाया। उसने अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए उस वक्त तुर्की के खलीफा को भी पत्र लिखा था, जिसमें उसने यह स्वीकार किया कि उसने किस तरह से काफिरों यानी हिंदुओं पर जुल्म ढाए। प्रसिद्ध इतिहासकार विक्रम संपत ने टीपू पर पुस्तक लिखी है। उनके अनुसार टीपू की राजकीय घोषणा में लिखा है कि – मेरी सरकार-ए-खुदादाद है जिसका उद्देश्य काफिरों का निर्मूलन करना है।
टीपू ने तमिलनाडु पर और केरल पर कई हमले किए
मैसूर पर टीपू की हुकूमत 1782 से 1799 तक रही और इस दौरान उसने तमिलनाडु और केरल पर कई हमले किए। कई इतिहासकार मानते हैं कि इस दौरान उसने लाखों लोगों पर खूनी जुल्म किए और उन्हें मुसलमान बनने के लिए मजबूर किया। खासकर टीपू ने केरल के मालाबार इलाके में मजहब के नाम पर खून की नदियां बहाई थी। इसका सबूत उन खतों से मिलता है जो खुद उसने अपने सेनापतियों को लिखे थे। इन खतों के बारे में अंग्रेज अधिकारी विलियम किर्कपैट्रिक ने सिलेक्टेड लेटर्स ऑफ टीपू सुल्तान किताब लिखी थी। इस किताब के मुताबिक 19 जनवरी 1790 को बदरुज्जमा खान को एक पत्र में टीपू ने लिखा कि क्या तुम्हें पता है कि हाल ही में मैंने मालाबार पर एक बड़ी जीत दर्ज की है और 4 लाख से ज्यादा हिंदुओं को मुसलमान बनाया है। टीपू के अनुसार – त्रावणकोर के राजा मरदूद रामन नायर के खिलाफ जल्द हमला बोलूंगा क्योंकि उसे और उसकी प्रजा को मुसलमान बनाने के ख्याल से मैं बेहद खुश हूं इसलिए मैंने अभी श्रीरंगपट्टनम वापस जाने का विचार छोड़ दिया है।
टीपू की क्रूरता के कारण मांड्या में दिवाली पर नहीं जलता है दीया
इतना ही नहीं टीपू की क्रूरता के कारण वर्तमान में कर्नाटक के मांड्या जिले के मेलकोटे गांव में दिवाली पर अंधेरा रहता है। इस गांव में 200 साल से यहां पर दिवाली नहीं मनाई जाती है। टीपू के शासनकाल में इस गांव के रहने वाले अयंगर ब्राह्मण समुदाय दीपावली का त्यौहार मनाने के लिए श्री रंगपट्टनम शहर में नरसिम्हा मंदिर में एकत्र हुए थे। टीपू ने इन्हें सबक सिखाने के लिए ठीक दिवाली के दिन इस मंदिर के जंगली हाथी छोड़ दिए और मंदिर के दरवाजे बंद करवा दिए। इस नरसंहार में 700 से ज्यादा आयंगर ब्राह्मणों को मार डाला गया था। इस कारण अयंगर ब्राह्मण समुदाय दिवाली का त्योहार नहीं मनाते हैं।

















