कश्मीर शैवदर्शन : सांस्कृतिक एकता का सेतु
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कश्मीर शैवदर्शन : सांस्कृतिक एकता का सेतु

कश्मीर शैवदर्शन उत्तरापथ-दक्षिणापथ के सांस्कृतिक प्रवाह का प्रमुख सेतु है। यह चैतन्य-केंद्रित अद्वैत दर्शन कश्मीर से उत्पन्न होकर पूरे भारत में फैला। ‘उत्तर भारत’ और ‘दक्षिण भारत’ औपनिवेशिक विभाजन हैं, न कि भिन्न संस्कृतियां

Written byजे नंदकुमारजे नंदकुमार
Feb 17, 2026, 12:26 pm IST
inविश्लेषण, संघ @100, जम्‍मू एवं कश्‍मीर
केंद्रीय विश्वविद्यालय केरल में आयोजित संगोष्ठी में जे.नंद कुमार

केंद्रीय विश्वविद्यालय केरल में आयोजित संगोष्ठी में जे.नंद कुमार

हमारी शब्दावली ही विचारों की अभिव्यक्ति का वातावरण तैयार करती है। ‘उत्तर भारत’ और ‘दक्षिण भारत’, ये आधुनिक क्षेत्र-परिचय सुगम बनाते हैं। हालांकि, इनके प्रयोग का ज्यादा श्रेय अंग्रेजों को जाता है, जिन्होंने प्रशासनिक सुविधा के नाम पर भारत को भौगोलिक खंडों में बांटा। हमारे प्राचीन इतिहास में इन्हें उत्तरापथ-दक्षिणापथ कहा गया है, जो परस्पर भिन्न संस्कृतियां नहीं, अपितु सांस्कृतिक आदान-प्रदान के साझा मार्ग थे। इनके जरिए ग्रंथों, रीति-रिवाजों, आध्यात्मिक दृष्टि और आचार्यों का आवागमन बना रहा। पुराणों का वाक्य इसका प्रमाण है- एकमेव हि तत्त्वं बहुधा प्रतिभाति अर्थात् एक ही तत्त्व अनेक रूपों में प्रतिपाद्य होता है।

यहां ‘उत्तर भारत’ व ‘दक्षिण भारत’ शब्द दो भिन्न परिवेशों का बोध नहीं कराते, अपितु उस सांस्कृतिक दृष्टि को चिह्नित करते हैं, जिसने सीमांकन से पूर्व ही इनके मध्य ग्रंथों, रीति-रिवाजों व आध्यात्मिक धाराओं का निर्बाध प्रवाह बनाए रखा। यही धारा विविधता में एकता को संजोती रही। हमारा विमर्श अकादमिक चर्चा के साथ औपनिवेशिक विभाजन से परे उस सभ्यता को समझने का प्रयास है, जिसने काल, स्थान, भाषा व स्वरूप में अपनी पहचान अक्षुण्ण रखी। कश्मीर-केरल पर एक साथ चिंतन किसी ग्रंथ या क्षेत्र से परे विस्तृत दृष्टि का आह्वान है। प्रश्न यह है कि भारत स्वयं को कैसे देखता है? उसका ऐतिहासिक अस्तित्व धुंधला क्यों? वर्तमान में मूल पहचान को कैसे जाग्रत करें? यह राष्ट्र, यानी भारत की अवधारणा पर गहन मंथन हेतु प्रेरित करता है।

राष्ट्र की अवधारणा पर पुनर्विचार

सबसे पहले राष्ट्र क्या है? आधुनिक परिभाषा के तहत, मोटे तौर पर इसके दो प्रमुख स्वरूप बताए गए हैं- नवराष्ट्रवाद और बहुराष्ट्रवाद।
नवराष्ट्रवाद : राष्ट्र, जो अभी शैशवास्था में है। जवाहरलाल नेहरू का ‘अ ट्रिस्ट विद डेस्टनी’ भाषण नवराष्ट्रवाद का प्रतीक है, जो बताता है कि भारत ‘निर्माण की प्रक्रिया में है’। यानी भारत को प्राचीन सभ्यता के बजाय भविष्य की राजनीतिक परियोजना बताया गया, जिसके साकार होने में समय लगेगा। यूरोपीय आधुनिकता से प्रेरित यह दृष्टि राष्ट्र को साझा राजनीतिक संकल्प, आर्थिक एकीकरण और संस्थागत गठजोड़ से उभरा तात्कालिक स्वरूप मानती है। इसके अनुसार, राष्ट्र न तो निरंतर प्रवाहमान सभ्यता है, न ही इसका आध्यात्मिक अस्तित्व, बल्कि यह तात्कालिक, आश्रित और विकासात्मक है। इसलिए नेहरू और समकालीन नेता राष्ट्र को प्राचीन निरंतर सभ्यता या आध्यात्मिक स्वरूप के तौर पर स्वीकार करने से परहेज करते थे।

भारतीय सभ्यता की प्राचीन धारा को पुर्नपरिभाषित कर अक्सर इसे सांस्कृतिक बहुलता वाला स्वरूप बताया गया, जिसे एक सूत्र में बांधने वाले आध्यात्मिक आधार का अभाव था। वहीं, राजनीतिक एकता को ऐतिहासिक विरासत के बजाय आकांक्षा का नाम दे दिया गया। इस प्रकार, पावन भूमि से जुड़ी साझा पहचान, चिंतन व सभ्यता-स्मृतियों वाली भारतीय राष्ट्र-अवधारणा को चालाकी से आधुनिकतावादी व्याख्या में बांध दिया गया। इसमें राष्ट्र इतिहास की स्मृतियों से नहीं उभरता या पहचाना जाता, अपितु निरंतर ‘निर्मित’ हो रहा होता है।

बहुराष्ट्रवाद : इस मान्यता के तहत बहुसांस्कृतिक विभाजन को महत्वपूर्ण मानते हुए एक ही क्षेत्र की सीमा के अंदर विभिन्न संस्कृतियों वाले कई राष्ट्रों के सह-अस्तित्व की बात कही गई है।

राष्ट्र को प्राचीन सभ्यता का अंग न मानने वालों ने ये दोनों विचार प्रचारित किए। हमारी शिक्षा, इतिहास-रचना व समीक्षाएं औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक प्रतिमानों पर आधारित रहीं व विकृत हुईं, जिनका हमने बिना सोचे-समझे अनुसरण किया।

भारतीय दृष्टि से राष्ट्र क्या है?

भारतीय परंपरा में एकता की प्रारंभिक अभिव्यक्ति राजनीतिक अनुबंध या प्रशासनिक अखंडता के बजाय तत्वमीमांसा में मिलती है। अथर्ववेद का यह कथन इसका प्रमाण है-‘भद्रं इच्छन्तः स्व-विद:’ अर्थात् स्वयं को जानने वाले सभी का कल्याण चाहते हैं। यहां सामाजिक सामंजस्य बाहरी नियमों से नहीं, आत्म-ज्ञान से उत्पन्न होता है। ऐसे समाज के मूल्य साझा अस्तित्व की आंतरिक पहचान से स्वाभाविक रूप से प्रवाहमान रहते हैं। अथर्ववेद का प्रसिद्ध श्लोक इसे स्पष्ट करता है-‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है, मैं इसका पुत्र हूं।

यह आधुनिक साहित्य का कोई रूपक नहीं, सभ्यता का दार्शनिक आधार है। भूमि अधिकार-क्षेत्र मात्र नहीं, जीवंत स्वरूप है जिससे व्यक्ति जुड़ा रहता है। इस दृष्टकोण के अनुसार, राष्ट्र का निर्माण केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति से नहीं, बल्कि भूगोल-स्मृति, रीति-रिवाजों और मूल्यों की साझा भावना में बंधे सहभागी समूहों की पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी विरासत से होता है।

डॉ. बी.आर. आंबेडकर राष्ट्रवाद को परिभाषित करते हुए इस अंतर्दृष्टि को स्पष्टता से व्यक्त करते हैं-‘यह अपनेपन की भावना है जो लोगों को एक-दूसरे से जोड़ती है।’ आंबेडकर का यह सूत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके लिए राष्ट्र का अर्थ शासन या वैधता तक सीमित नहीं, अपितु निरंतर प्रवाहमान भावना है। एक प्रभावी नैतिक एकता, जो संस्थागत स्वरूप में ढलने से पहले अस्तित्व में रहती है। यह दृष्टिकोण ग्यूसेप मैजिनी की उत्कृष्ट परिभाषा के बेहद करीब है कि ‘राष्ट्र आध्यात्मिक सिद्धांत है, जो समृद्ध स्मृतियों व सह-अस्तित्व की तीव्र इच्छा पर आधारित है।’ वे आगे कहते हैं, ‘लोग राष्ट्र हैं, क्योंकि वे राष्ट्र बनना चाहते हैं।’ यह विचार वैदिक-अंबेडकरवादी सूत्रों को एक साथ जोड़ता है कि राष्ट्र मात्र एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, जीवंत नैतिक अस्तित्व है, जो साझा स्मृतियों, सामूहिक आकांक्षा व इतिहास को एक साथ जीने की इच्छा से पोषित होता है। गहन मनन से स्पष्ट होता है कि राष्ट्र के पास आत्मा है, दुख झेलने, आनंद मनाने और आशा करने की साझा क्षमता है।

भारतीय राष्ट्र-अवधारणा परिवर्तन से परहेज नहीं करती। यह चिरराष्ट्रवाद की पुष्टि करती है, यानी प्राचीन होते हुए भी उर्जस्वल, विविधतापूर्ण फिर भी अखंड, सतत किंतु परिवर्तनशील। हर नई पीढ़ी के साथ इसका नव-निर्माण नहीं होता। यह स्मृतियों से पोषित होकर पुनः परिभाषित-पुर्नस्थापित होता है। इस अंतर को पहचानने के लिए अतीत खंगालने की आवश्यकता नहीं है। यह ऐतिहासिक परंपरा के आत्मबोध हेतु आवश्यक कदम है, जहां राजनीतिक स्वरूप सांस्कृतिक-आध्यात्मिक एकता की भूमिका निभाते हैं, उसे बदलते नहीं। राष्ट्र को अस्थायी शक्ति-व्यवस्था के बजाय चेतना-प्रवाह के रूप में देखने पर ही राष्ट्रीय एकता प्रशासनिक तालमेल से परे सांस्कृतिक-सामाजिक एकजुटता बनेगी।

केरल में तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन

गत दिनों केंद्रीय विश्वविद्यालय केरल में ‘क्रम और सांस्कृतिक प्रवाह : उत्तर और दक्षिण भारत के बीच कश्मीर शैवदर्शन’ विषय पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तर और दक्षिण भारत के मध्य कश्मीर शैवदर्शन की दार्शनिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं के अंतर्संबंधों पर गंभीर विमर्श करना था।

कार्यक्रम का आयोजन अभिनवगुप्त इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज, केरल के सहयोग से किया गया। प्रारंभ में केरल स्थित अभिनवगुप्त इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के निदेशक डॉ. आर. रामानंद ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कश्मीर शैवदर्शन केवल दार्शनिक परंपरा ही नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक एकता का सशक्त सेतु भी है। उद्घाटन सत्र में केंद्रीय विश्वविद्यालय केरल के कुलपति प्रोफेसर सिद्धू पी. अल्गुर ने कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया। अपने उद्घाटन वक्तव्य में उन्होंने कश्मीर शैवदर्शन की वैश्विक प्रासंगिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा में उसके योगदान को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच ज्ञान-संवाद की यह पहल अकादमिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अध्यक्षीय उद्बोधन में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ संस्कृत एंड इंडिक स्टडीज के प्रोफेसर रजनीश कुमार मिश्रा ने कश्मीर शैवदर्शन की दार्शनिक गहराई, क्रम परंपरा और सांस्कृतिक प्रवाह की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने इसे भारतीय चिंतन की समन्वयी परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। तीन दिनों तक चले इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आए विद्वानों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए और विषय के विविध आयामों पर सारगर्भित चर्चा की। समापन सत्र में केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के डॉ. अजय कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

ऐतिहासिक व सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य

समकालीन भारत में राष्ट्रीय एकता की चर्चा प्रायः राजनीतिक संरचनाओं, प्रशासनिक अखंडता या संवैधानिक ढांचों तक सीमित रहती है। ये महत्वपूर्ण हैं, किंतु एकता के बाह्य आवरण मात्र। भारत कभी केवल राजनीतिक शक्ति से एकजुट नहीं रहा। आधुनिक राष्ट्र-राज्य से बहुत पूर्व यह सांस्कृतिक-आध्यात्मिक एकीकृत अस्तित्व के रूप में विद्यमान था। इसकी अखंडता एकरूपता से नहीं, साझा आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हुई, जिसने विविधता को अक्षुण्ण रखते हुए फलने दिया।

डॉ. आंबेडकर ने 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय के शोधपत्र में इसे संक्षेप में कहा था, जिसे बाद में ‘कास्ट्स इन इंडिया’ में प्रकाशित किया गया। उन्होंने कहा था, ‘‘संस्कृति की एकता ही समरूपता का आधार है… ऐसा कोई देश नहीं है जो सांस्कृतिक एकता के संदर्भ में भारतीय प्रायद्वीप का मुकाबला कर सके… यह न केवल एक भौगोलिक एकता है, बल्कि एक गहरी और ज्यादा मौलिक एकता है। एक निर्विवाद सांस्कृतिक एकता, जो भूमि के एक छोर से दूसरे छोर तक बरकरार है।’’

औपनिवेशिक शासन ने सुनियोजित रूप से हमारी स्वाभाविक एकता को विकृत किया। भारत को ‘मोजेक’, जातीय समूह या परस्पर-विरोधी समुदायों का कृत्रिम संयोजन बताया। हमारे चिंतन को कपोल कल्पना, अनुष्ठानों को अंधविश्वास बताकर खारिज कर दिया गया और क्षेत्रीय परंपराओं को आध्यात्मिक ज्ञान से रहित ‘लोक-प्रथाओं’ के रूप में सूचीबद्ध कर दिया गया। उच्च दर्शन बनाम निम्न अनुष्ठान, अखिल भारतीय बनाम स्थानीय, ग्रंथ आधारित बनाम प्रस्तुति, उत्तर-आध्यात्मिक और दक्षिण-विषयासक्त-ये औपनिवेशिक व्याख्याएं हमारी विरासत नहीं, विदेशी नजरिए के प्रमाण हैं, जो हमारी सभ्यता के जीवन-विचार-स्मृति प्रवाह को नहीं समझ सके।

चेतना वास्तविकता का आधार

हमारी सभ्यता के दर्शन के केंद्र में एक मौलिक अंर्तदुष्टि है- वास्तविकता ही चेतना है। कश्मीर शैवमत इसे स्पष्ट करता है-चैतन्यआत्मा यानी चेतना ही आत्मा है। यहां चेतना पदार्थ से बना कोई उत्पाद या मस्तिष्क की रासायनिक प्रक्रिया से उपजी कोई घटना नहीं, न ही एक निष्क्रिय साक्षी है। यह जीवंत, रचनात्मक, स्वयं प्रकाशमान है। महानायप्रकाश शिव को नमन करते हुए, जिनका शरीर स्वयं चेतना है : श्रीमन् महाप्रकाशवपुषेशिवाय नमः। चेतना ब्रह्मांड को बाध्य होकर नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से प्रकट करती है : ‘स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति’अर्थात् परम शिव अपनी स्वेच्छा से अपने ही स्वरूप में विश्व का उद्घाटन करते हैं। यह दृष्टिकोण आधुनिक ज्ञानमीमांसा की मान्यताओं को उलट देता है। यह विज्ञान को अस्वीकार नहीं करता, अपितु जिज्ञासा के अर्थ को गहनता प्रदान करता है। (क्रमश:)

(केंद्रीय विश्वविद्यालय केरल में ‘क्रम और सांस्कृतिक प्रवाह : उत्तर और दक्षिण भारत के बीच कश्मीर शैवदर्शन’ पर आयोजित संगोष्ठी में दिए गए उद्बोधन के संपादित अंश)­

Topics: नेहरूवादी दृष्टिकोणजे. नंदकुमारबहुराष्ट्रवादपाञ्चजन्य विशेषनिर्मित राष्ट्रकश्मीर शैवदर्शनचैतन्य-केंद्रित अद्वैतचैतन्यआत्मातत्वमीमांसाराष्ट्र और सभ्यताचिरराष्ट्रवादउत्तरापथ और दक्षिणापथसांस्कृतिक एकता का सेतु
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