‘फिर से भारत को टूटने नहीं देंगे’- मोहनराव भागवत
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RSS के 100 साल : ‘फिर से भारत को टूटने नहीं देंगे’- मोहनराव भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर 7 और 8 फरवरी को सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का मुंबई में विशेष व्याख्यान आयोजित हुआ। इसका विषय था- ‘संघ यात्रा के 100 वर्ष : नए क्षितिज।’ यह व्याख्यानमाला की चौथी और अंतिम कड़ी थी।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 16, 2026, 03:26 pm IST
in संघ @100, महाराष्ट्र
श्री मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

श्री मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर 7 और 8 फरवरी को सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का मुंबई में विशेष व्याख्यान आयोजित हुआ। इसका विषय था- ‘संघ यात्रा के 100 वर्ष : नए क्षितिज।’ यह व्याख्यानमाला की चौथी और अंतिम कड़ी थी। पहली कड़ी 2025 में 26-28 अगस्त तक नई दिल्ली में, दूसरी कड़ी 8 और 9 नवंबर को बेंगलूरु में और तीसरी कड़ी 21 दिसंबर को कोलकाता में आयोजित हुई थी। मुंबई में 900 से अधिक प्रतिष्ठित गणमान्य हस्तियों के समक्ष सरसंघचालक जी ने विचार रखे। वर्ली स्थित नेहरू सेंटर सभागार में हुए इस कार्यक्रम के मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, कोंकण प्रांत संघचालक अर्जुन चांदेकर और मुंबई महानगर संघचालक सुरेश भगेरिया उपस्थित थे। पहले दिन दो सत्र हुए, जिसमें श्री भागवत का उद्बोधन हुआ। दूसरे दिन भी दो सत्र हुए, जिनमें प्रश्नों के उत्तर दिए गए। प्रस्तुत हैं श्री भागवत के व्याख्यान के संपादित अंश-

केवल बाहरी रूप के आधार पर संघ का मूल्यांकन करने से गलतफहमियां पैदा होती हैं। संघ की शाखा, कार्यकर्ता, उनका परिवार, कार्यक्रम, वर्ग, शिविर-इनका सूक्ष्म निरीक्षण प्रत्यक्ष रूप से करने पर ही संघ को सही रूप में समझा जा सकता है। संघ का कार्य देश के लिए है। संघ किसी से प्रतिस्पर्धा करने या किसी की प्रतिक्रिया के कारण नहीं चलता। संघ किसी के विरोध में नहीं है। संघ सत्ता या प्रसिद्धि की आकांक्षा नहीं रखता। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने स्वतंत्रता आंदोलन की सभी धाराओं का अनुभव और चिंतन किया। इतिहास में भी हम बार-बार गुलाम बने। पराक्रम से स्वतंत्रता वापस पाई, लेकिन वह टिक नहीं सकी। अब भी हमें स्वतंत्रता मिलेगी, लेकिन फिर से गुलामी नहीं आएगी, इसकी क्या गारंटी है? हमारे समाज में कुछ कमी है, इसे डॉ. हेडगेवार ने पहचाना। हम अपनी एकता भूल गए, स्वार्थ बढ़ गया, समाज गुणहीन बन गया, अनुशासन नहीं रहा। दरिद्रता, गरीबी और अज्ञान उत्पन्न हुआ। समाज को गुणवान, अनुशासित, समृद्ध और संगठित बनाए बिना स्वतंत्रता को टिकाया नहीं जा सकता। इसी उद्देश्य से डॉ. हेडगेवार ने विभिन्न प्रयोगों के पश्चात् 1925 में संघ की स्थापना की।

‘धर्मनिरपेक्षता’ के स्थान पर ‘पंथनिरपेक्षता’

भारत का स्वभाव सनातन है। ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द गलत है। इसके स्थान पर ‘पंथनिरपेक्षता’ शब्द होना चाहिए। धर्म हमारा स्वभाव और कर्तव्य है, जो इहलोक और परलोक में सुख देता है। धर्म सभी को उन्नत करता है। हमें विश्वगुरु बनना है, पूरे विश्व को जोड़ना है। समाज की संगठित शक्ति के आधार पर देश को शक्तिशाली बनाने हेतु समाज को सशक्त करने के ध्येय को लेकर संघ आगे बढ़ रहा है। यदि आप सभी इसमें सहभागी होंगे तो कार्य अधिक गति से होगा। दैनिक शाखा में उपस्थित रहकर शरीर, मन, बुद्धि को मजबूत बनाने के लिए व्यायाम करना, यह तो एक काम है ही, परंतु अपनी-अपनी रुचि और क्षमतानुसार स्वयंसेवकों एवं सज्जन-शक्ति द्वारा चलाए गए देशहित के कार्यों में सहभागी होने तथा प्रामाणिक रूप से, निस्वार्थ बुद्धि से समाज-हित के लिए कोई भी कार्य करने पर आप संघ का ही कार्य कर रहे हैं, ऐसा संघ समझता है। इस मार्ग से भी आप स्वयं संघ से जुड़ सकते हैं।

कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्यजन। अगली पंक्ति में फिल्म निर्माता और निदेशक करण जौहर दिख रहे हैं।

देशहित का ध्यान रखें

ऐसी बहुत सी विदेशी वस्तुएं हैं, जिसके बिना हमारा दैनिक व्यवहार चल सकता है। हमारे देश का रोजगार कैसे बढ़े, इसका विचार करके ही वस्तु खरीदने का निर्णय प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। अपरिहार्य अंतरराष्ट्रीय व्यवहार भी किसी के दबाव में आए बिना हमारे देश के वातावरण के अनुकूल पद्धति से करना होगा। सामाजिक समरसता, पर्यावरण, कुटुंब प्रबोधन, स्व-बोध, संविधान आधारित नागरिक कर्तव्य का पालन, इन पंच बिंदुओं पर दैनिक व्यवहार में अधिकाधिक जोर देने का आग्रह स्वयंसेवकों सहित सभी को करना चाहिए। पंच परिवर्तन को व्यवहार में लाने हेतु स्वयंसेवकों को पहल करनी चाहिए।

सज्जन शक्ति से मित्रता

बस्तियों में, गांव-गांव में, चरित्रवान और निस्वार्थ बुद्धि से कार्य करने वाले, सभी के सुख-दुःख में सहभागी होने वाले ईमानदार व्यक्तियों के उदाहरण निर्माण हों और वे देशव्यापी बनें, इस उद्देश्य से संघ कार्य करता है। हम समाज के प्रेम और सज्जनों की भावना के बल पर चले और कार्यकर्ताओं के विश्वास पर आगे बढ़े। संघ का विरोध हुआ, आज भी हो रहा है, परंतु विरोधियों के विरुद्ध कटुता का भाव न रखते हुए संघ के कार्यकर्ता आगे बढ़े। सज्जनों से मित्रता और सज्जन शक्ति का जागरण यह हमारे संघ कार्य का मूलभूत भाव रहा। समय बदला, परिस्थिति बदली, पर संघ ने अपनी दिशा नहीं बदली और अपने ध्येय की ओर संघ आगे बढ़ रहा है। देशभर में समाज के सहयोग से स्वयंसेवक 1,30,000 से अधिक सेवाकार्य कर रहे हैं। शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संघ कार्य का विस्तार अधिक व्यापक करने की ओर संघ प्रयत्नशील है।

यह 1947 नहीं है

हम 2047 में देश विभाजन का डर पालने की बजाय, अखंड भारत के उदय की कल्पना करें। जो काम 500 साल में सुल्तान, बादशाह यहां रहकर नहीं कर सके, 200 साल में अंग्रेज नहीं कर सके, वह स्वतंत्र भारत में क्यों व कैसे होगा, यह 1947 नहीं है। हम बहुत आगे बढ़ गए हैं, अब भारत को तोड़ने वाले खुद टूट जाएंगे। भारत जुड़ जाएगा, और यह होगा। यह संकल्प मन में मजबूत बनाएं। जो थोड़े-बहुत लोग दुस्वप्न देख रहे हैं, उनके मंसूबे कभी सफल नहीं होंगे। हम सब लोग हैं, हम होने नहीं देंगे।

घुसपैठियों को बाहर करना होगा
जिज्ञासा समाधान

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