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शब्दों के संग संस्कृति का उत्सव

नक्सलवाद के शोर से निकलकर छत्तीसगढ़ अब साहित्य की भाषा बोल रहा है। आज वहां विचार, संवाद और संस्कृति के उत्सव हो रहे हैं। रायपुर साहित्य उत्सव 2026 राज्य में हो रहे बौद्धिक परिवर्तन का द्योतक है

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Feb 13, 2026, 08:38 am IST
inविश्लेषण, कला-साहित्य, मध्य प्रदेश
दीप प्रज्ज्वलित कर साहित्य उत्सव का उद्घाटन करते छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह। साथ में हैं (बाएं से) उपमुख्यमंत्री अरुण साव (बाएं), छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा और मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज झा

दीप प्रज्ज्वलित कर साहित्य उत्सव का उद्घाटन करते छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह। साथ में हैं (बाएं से) उपमुख्यमंत्री अरुण साव (बाएं), छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा और मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज झा

अब समय बदल रहा है। छत्तीसगढ़ की वह भूमि, जो वर्षों तक नक्सली हिंसा और वामपंथी विमर्श की छाया में सिमटी रही, आज राष्ट्रीय चेतना और साहित्यिक उत्सव की रोशनी से जगमगा रही है। साहित्य और उसके पाठक दोनों में गहरा परिवर्तन आया है। पुराने वैचारिक मठ ध्वस्त हो रहे हैं, वे मठ जहां नक्सलवाद को ‘क्रांति’ का नाम देकर पाला-पोसा जाता था। अब नए राष्ट्रीय गढ़ बनकर उभर रहे हैं, जो भारतीय संस्कृति, एकता और विकास की बात करते हैं। कई लेखक, बुद्धिजीवी और साहित्यकार वामपंथ की डूबती नाव को त्यागकर राष्ट्रीय विचारधारा के मजबूत जहाज पर सवार होने को तैयार दिख रहे हैं। पूर्व नक्सलियों की स्वीकारोक्ति साफ है, पैसे के बदले लिखे जाने वाले लेख अब थम चुके हैं। यह बदलाव बौद्धिक क्रांति का संकेत है, जहां शब्द हिंसा को हराते हैं और विचार नई शुरुआत की नींव रखते हैं। रायपुर साहित्य उत्सव इसी नई सुबह की घोषणा बना।

राष्ट्रीय विचार परिवार के साहित्यिक आयोजनों की श्रृंखला में एक नया अध्याय जुड़ गया है। लोकमंथन, नर्मदा साहित्य मंथन, शब्दोत्सव के बाद रायपुर साहित्य उत्सव ने इस श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ी है। ये उत्सव अब केवल साहित्यिक चर्चाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना, वैचारिक स्पष्टता और सामाजिक मूल्यों को मजबूत करने वाले मंच बन गए हैं। कुछ समय पहले तक चर्चा होती थी कि ‘जयपुर लिट फेस्ट’ जैसा कुछ चाहिए, ‘जश्ने-रेख्ता’ जैसा कुछ चाहिए। आज ऐसी चर्चाएं पुरानी हो चुकी हैं। राष्ट्रीय विचार के ये मंच इतने प्रभावशाली हो गए हैं कि वामपंथी लेखक-साहित्यकार भी इनसे फोमो (Fear of Missing Out) का शिकार हो रहे हैं। रायपुर साहित्य उत्सव को लेकर उनकी चिंता साफ दिखी- क्यों हमारे लोगों को शामिल नहीं किया जा रहा?

एक जमाने में यही गिरोह साहित्य का नियामक था। प्रो. रामदरश मिश्र, निर्मल वर्मा जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों को बाहर रखा जाता था। पुरस्कार रचनात्मकता से अधिक गिरोहबाजी पर निर्भर थे। पुरस्कार कल्याणकारी योजनाओं की तरह वितरित होते थे, न कि उत्कृष्टता के आधार पर।

साहित्यिक विरासत का राष्ट्रीय मंच

रायपुर साहित्य उत्सव 2026 छत्तीसगढ़ राज्य के रजत जयंती वर्ष और गणतंत्र के अमृतकाल के अवसर पर आयोजित हुआ। यह तीन दिवसीय उत्सव 23 से 25 जनवरी, 2026 तक नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में संपन्न हुआ। थीम ‘आदि से अनादि तक’ ने प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से लेकर समकालीन वैचारिक विमर्श तक की यात्रा को रेखांकित किया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार की यह पहल छत्तीसगढ़ की साहित्यिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में सफल रही। उत्सव में 120 से अधिक ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों ने भाग लिया। कुल 42 सत्रों में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और साहित्यिक मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। इसमें 5 समानांतर सत्र, 4 सामूहिक चर्चाएं और 3 विशेष संवाद शामिल थे। पत्रकारिता और साहित्य, ट्रैवल ब्लॉगिंग, नाट्यशास्त्र, समाज-सिनेमा, संविधान-भारतीय मूल्य तथा शासन-साहित्य के अंतर्संबंध जैसे विविध विषयों पर विमर्श हुआ।

शुभारंभ और प्रमुख संबोधन

23 जनवरी को विनोद कुमार शुक्ल मंडप में उत्सव का उद्घाटन हुआ। मुख्य अतिथि राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह और अध्यक्ष मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दीप प्रज्ज्वलित किया। उपमुख्यमंत्री अरुण साव, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. कुमुद शर्मा और अभिनेता मनोज जोशी सहित कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। श्री हरिवंश ने छत्तीसगढ़ के महान साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल को नमन करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ी साहित्य की प्राचीन परंपरा रही है। उन्होंने कबीर के काशी और कवर्धा से जुड़ाव का जिक्र किया तथा मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों से साहित्य की समाज-दिशा देने वाली भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने जोर दिया कि “एक पुस्तक और एक लेखक दुनिया बदलने की शक्ति रखते हैं।” भारत की आर्थिक प्रगति, आत्मनिर्भरता और 2047 के विकसित भारत संकल्प में साहित्य की भूमिका को रेखांकित किया।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ को प्रभु श्रीराम का ननिहाल बताते हुए कहा कि यह पावन भूमि साहित्य का महाकुंभ बनकर उभरी है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की तुलना समुद्र मंथन से की और माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे, पंडित लोचन प्रसाद पांडेय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी तथा गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे साहित्यकारों की स्मृतियों को सहेजने की जिम्मेदारी बताई। अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कविता अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध सिखाती है।

उद्घाटन के दौरान प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार की कॉफी टेबल बुक (छत्तीसगढ़ के 25 वर्ष पर), प्रो. अंशु जोशी की ‘लाल दीवारें, सफेद झूठ’ और राजीव रंजन प्रसाद की ‘तेरा राज नहीं आएगा रे’ का विमोचन हुआ।

सांस्कृतिक समावेश और लोक भागीदारी

उत्सव की खासियत इसका लोक-केंद्रित स्वरूप था। सुरेंद्र दुबे मंडप में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत पर भव्य चित्रकला प्रदर्शनी लगी, जिसमें छत्तीसगढ़ महतारी (सोनल शर्मा), बस्तर बाजार (अवध कंवर), राजिम कुंभ (दिव्या चंद्रा) और रामगढ़ पहाड़ियों के चित्र प्रमुख आकर्षण बने। पेंटिंग और कार्टून कार्यशालाओं में युवाओं को मार्गदर्शन मिला।

खान-पान में पारंपरिक व्यंजन जैसे कोदो का भात, चापड़ा चटनी, फर्रा, जिमिकंद का आचार और खट्टी कढ़ी परोसे गए। पारंपरिक साड़ियां, वनवासी आभूषण जैसे हसुली और बाजूबंद ने लोकाचार को जीवंत किया। चाणक्य नाटक का मंचन, लोकनृत्य, लोकगीत और छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गईं।

बेमेतरा की बिटिया वंदिता साहू ने भरथरी गीतों की परंपरागत शैली में प्रस्तुति दी। 10 वर्षीय अरुणिमा शर्मा ने मीर अली मीर के गीत का वादन सह गायन कर मन मोह लिया। बस्तर की लोकगीत विशेषज्ञ शकुंतला तरार ने बताया कि उत्सव में वरिष्ठ दिवंगत साहित्यकारों के नाम से मंच नामित किए गए, जिससे उपस्थित लोग उनके योगदान से प्रेरणा ले सके। डॉ. चितरंजन कर रचित उत्सव गीत सभी पंडालों में गूंजता रहा। सरगुजा के साहित्यकार अनिरुद्ध नीरव के नाम पर एक मंडप का नामकरण देखकर स्थानीय लेखकों में गर्व की भावना उमड़ी। ओपन माइक और जिलेवार कवि सम्मेलन ने युवा रचनाकारों को मंच प्रदान किया।

संविधान की बात

संविधान केवल कानून की पुस्तक नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता और मूल्यों का जीवंत दस्तावेज़ है। यह बात ‘संविधान और भारतीय अवधारणा’ विषय पर सार्थक चर्चा दौरान निकल कर सामने आई। पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने बताया कि बाबा साहेब ने वर्ग और जाति के संकीर्ण चश्मे से सोचने वालों को चुनौती दी और स्पष्ट किया कि राष्ट्रहित किसी भी वैचारिक खांचे से ऊपर है।

चर्चा में भाजपा के राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिव प्रकाश और पार्टी प्रवक्ता डॉ. गुरु प्रकाश पासवान भी शामिल थे। डॉ. पासवान के अनुसार-संविधान को भारतीय संस्कृति, कर्तव्य और समाज की सोच से जोड़कर समझने की बातचीत बेहद ज्ञानवर्धक रही।

साहित्य उत्सव में उपस्थित लाेगों को संबोधित करते भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश

कला प्रदर्शनी ने मोहा मन

उत्सव में सुरेंद्र दुबे मंडप एक विशेष आकर्षण का केंद्र बना। यहां लगी भव्य चित्रकला प्रदर्शनी ने प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और जनजीवन को जीवंत रंगों में उकेर कर दर्शकों का मन मोह लिया।

रायपुर की प्रतिभाशाली चित्रकार सोनल शर्मा की कृति ‘छत्तीसगढ़ी महतारी’ ने हर आगंतुक का विशेष ध्यान खींचा, जो मातृभूमि की ममता और शक्ति का प्रतीक बनी। धमतरी के प्रसिद्ध कलाकार अवध कंवर द्वारा निर्मित ‘बस्तर बाजार’ की जीवंत छवि ने बस्तर की लोकसंस्कृति, रंग-बिरंगे बाजार और जनजीवन की अनुभूति कराई। वहीं जांजगीर-चांपा की कलाकार दिव्या चंद्रा की छायाचित्र-आधारित पेंटिंग ‘राजिम संगम एवं फणीश्वर महादेव मंदिर’ ने आस्था और स्थापत्य सौंदर्य का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया। इंदिरा गांधी कला विश्वविद्यालय की एक छात्रा की ‘छत्तीसगढ़ सौंदर्य’ विषयक चित्रकला ने युवा दृष्टिकोण से प्रदेश की संस्कृति, अभूषण और बस्तर कला को सशक्त रूप दिया, जिसकी दर्शकों से खासी सराहना हुई।

प्रदर्शनी के साथ पेंटिंग कार्यशाला और कार्टून कार्यशाला भी आयोजित की गई, जहां युवा कलाकारों एवं विद्यार्थियों को अनुभवी मार्गदर्शकों से रंग तकनीक, रेखांकन, भाव-प्रस्तुति और सामाजिक कार्टून निर्माण का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण मिला।

साहित्य प्रेमियों, विद्यार्थियों और आमजन की बड़ी भीड़ ने इस कला-साहित्य के संगम को देखा। रजत जयंती के इस उत्सव में उभरती प्रतिभाओं को मंच, लोक-संस्कृति को प्रोत्साहन और नई पीढ़ी को कला प्रेरणा मिली। यह प्रदर्शनी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को रंगों के माध्यम से राष्ट्रीय मंच पर सशक्त रूप से प्रस्तुत करने में सफल रही।

सोशल मीडिया अभियान

यह अभियान पिछले 30 दिन में अत्यंत सक्रिय रहा, जिसमें कुल 470 से अधिक कंटेंट पीस तैयार कर विभिन्न मंचों पर प्रकाशित किए गए। मुख्य तीन दिवसीय आयोजन के दौरान ही 115 वीडियो और 38 कैरोसेल/स्टैटिक पोस्ट बनाए गए, जो इंस्टाग्राम, X (पूर्व ट्विटर), फेसबुक आदि पर व्यापक रूप से प्रसारित हुए।
अभियान की सबसे मजबूत कड़ी इन्फ्लुएंसर्स का सहयोग रहा। इंस्टाग्राम पर 263 से अधिक और X पर 65 इन्फ्लुएंसर्स ने सक्रिय भागीदारी की, जिससे कंटेंट का ऑर्गेनिक प्रसार तेज हुआ। इस सहयोग और निरंतर कंटेंट वितरण के फलस्वरूप कुल 65 लाख (6.5 मिलियन) व्यूज़ और 87.7 हजार से अधिक इंटरैक्शन प्राप्त हुए। हैशटैग #RaipurSahityaUtsav का उपयोग 69,000 ट्वीट्स में किया गया, जिसने उत्सव को राष्ट्रीय स्तर पर ट्रेंडिंग बनाया। वीडियो कंटेंट का प्रभाव विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा-सोशल मीडिया पर वीडियो कुल 5 करोड़ बार देखे गए, कुल व्यूज 9.4 करोड़ पहुंचे। 6.1 लाख लोगों ने स्वेच्छा से कंटेंट को लाइक, शेयर और अपने प्लेटफॉर्म्स पर साझा किया। जिससे यूजर-जनरेटेड कंटेंट की बाढ़ आई।

विचारधारा से जुड़ाव और अन्य उत्सव

रायपुर साहित्य उत्सव जयपुर साहित्य उत्सव से कई मायनों में भिन्न और अधिक प्रभावी साबित हुआ। यहां वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक गौरव प्रमुख थे, जबकि जयपुर में विचारों का मिश्रण अक्सर विवादास्पद हो जाता है। स्थानीय लोक-परंपराओं, वनवासी संस्कृति और छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का समावेश इसे जड़ों से जुड़ा बनाता है। जनभागीदारी और युवा रचनाकारों को स्थान मिला, जो अन्य बड़े उत्सवों में कम देखने को मिलता है।

यह उत्सव राष्ट्रीय विचार परिवार की निरंतरता का प्रमाण है। शब्दोत्सव की सफलता के बाद नर्मदा साहित्य मंथन का पांचवां संस्करण इंदौर में 30 जनवरी से 1 फरवरी 2026 तक ‘भारत उदय’ थीम पर आयोजित हुआ, जिसमें वैचारिक विमर्श, पुस्तक मेला और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां शामिल रहीं।

समापन और भविष्य की दिशा

समापन समारोह में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि डिजिटल दौर में भी साहित्य का महत्व अक्षुण्ण रहेगा। ‘वंदे मातरम’ का उदाहरण देते हुए शब्दों की ताकत पर जोर दिया और ऐसे उत्सवों को गांव-छोटे शहरों तक पहुंचाने की अपील की। वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी और रंगकर्मी सच्चिदानंद जोशी ने सराहना की। निर्देशक चन्द्रप्रकाश द्विवेदी ने समय अनुशासन और बस्तर जैसे स्थानों में दोहराव की बात कही। प्रदेश के ख्यात साहित्यकार परदेशीराम वर्मा ने इसे अनोखा और अविस्मरणीय बताया। भारतीय ज्ञानपीठ ने भी मुख्यमंत्री को बधाई दी।

नक्सल अब बीते जमाने की बात

एक वोट की ताकत ने वह चमत्कार कर दिखाया, जो दशकों की सशस्त्र लड़ाई से नहीं हो सका। छत्तीसगढ़ की वह धरती, जो कभी नक्सलियों के ‘लाल आतंक’ से लाल थी, आज साहित्य, संस्कृति और विकास के उत्सव मना रही है। रायपुर साहित्य उत्सव 2026 इसका जीता-जागता प्रमाण है, जहां कभी लेवी, गला काटने और हिंसा की खबरें छाई रहती थीं, वहां अब देश-विदेश के साहित्यकारों का जमावड़ा है, नए विमर्श गढ़े जा रहे हैं और छत्तीसगढ़ की महतारी की गोद में शांति लौट रही है।

एक दशक पहले कुछ वामपंथी लेखक, प्रोफेसर, आंदोलनजीवी और पत्रकार नक्सलवाद को भूख और गरीबी की मार्मिक कहानियों में लपेट कर प्रस्तुत करते थे। राष्ट्रीय पत्रिकाओं में सोलह-सोलह पेज के लेख छपते थे, जो एक पूर्व नक्सली के मुताबिक ‘पैसे के बदले’ लिखे जाते थे। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। ये पूर्व नक्सली खुद बता रहे हैं- पैसा बंद हुआ तो ऐसा लेखन भी थम गया। मतलब आंदोलनजीवी उतना ही लिखते हैं, जितने का ‘रिचार्ज’ होता है। नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले लेखक इन दिनों दिख नहीं रहे, क्या सभी भूमिगत हो गए या उनकी सहानुभूति खत्म हो गई? क्या उनकी सचाई यह है कि ‘रिचार्ज’ खत्म का मतलब कथित ‘आंदोलन’ खत्म।

रायपुर साहित्य उत्सव इसी परिवर्तन की घोषणा है। यह न केवल साहित्य का मेला था, बल्कि नए छत्तीसगढ़ का प्रतीक-जहां हिंसा की जगह संवाद, वसूली की जगह विकास और गला काटने की जगह विचारों की बहस हुई। देश भर से आए मेहमानों ने नए छत्तीसगढ़ को देखा, जाना और समझा। नक्सलवाद अब बीते जमाने की बात बन चुका है; आगे का रास्ता शांति, साहित्य और समृद्धि का है।

रायपुर साहित्य उत्सव 2026 महज एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा का उत्सव था। यह राज्य को साहित्यिक मानचित्र पर मजबूत स्थान देगा और राष्ट्रीय विचार की धारा को आगे बढ़ाएगा। आने वाली पीढ़ियां इससे प्रेरणा लेंगी।

Topics: UGCविष्णु देव सायप्रज्ञा प्रवाहरायपुर साहित्य उत्सव 2026वनवासी संस्कृतिबौद्धिक क्रांतिनक्सलवादवैचारिक मठभारतीय ज्ञान परंपराभरथरी गायनराष्ट्रहितलाल दीवारेंआदिवासीसफेद झूठसांस्कृतिक चेतनाऑर्गेनिक प्रसारपाञ्चजन्य विशेषराष्ट्रीय चेतना
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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यूपी व देश को अपमानित करने का काम करते हैं राहुल गांधी : सीएम योगी आदित्यनाथ

अजय राय, कांग्रेस नेता

सावन के महीने में अयोध्या में अजय राय का मछली भोज, भाजपा बोली- सनातन धर्म का अपमान ही कांग्रेस की पहचान

पंजाब में सभी 117 सीटों पर अकेले विधानसभा चुनाव लड़ेगी भाजपा : बीएल संतोष

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