पद्म सम्मान 2026 : ‘दृढ़ संकल्प से हारा नक्सली डर’
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पद्म सम्मान 2026 : ‘दृढ़ संकल्प से हारा नक्सली डर’, डॉ. बुधरी ताती बोलीं- समाज के लिए छोड़ा घर

छत्तीसगढ़ की सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बुधरी ताती को भी पद्मश्री सम्मान मिलने जा रहा है। वह दंतेवाड़ा जिले के हीरानार गांव की रहने वाली हैं। 15 सितंबर, 1966 को पैदा हुईं बुधरी तांती 1984 से लगातार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं को शिक्षित करने और आत्मनिर्भर बनाने के कार्य में जुटी हुई हैं।

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Lalit Fulara
Feb 10, 2026, 05:31 pm IST
inभारत, छत्तीसगढ़, साक्षात्कार
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बुधरी ताती।

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बुधरी ताती।

छत्तीसगढ़ की सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बुधरी ताती को भी पद्मश्री सम्मान मिलने जा रहा है। वह दंतेवाड़ा जिले के हीरानार गांव की रहने वाली हैं। 15 सितंबर, 1966 को पैदा हुईं बुधरी तांती 1984 से लगातार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं को शिक्षित करने और आत्मनिर्भर बनाने के कार्य में जुटी हुई हैं। बस्तर में लोग उन्हें ‘बड़ी दीदी मां’ के नाम से बुलाते हैं। समाज सेवा के क्षेत्र में पद्मश्री मिलने की घोषणा होने पर पाञ्चजन्य प्रतिनिधि ने बुधरी ताती से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश-

आपको पद्मश्री मिलने वाला है। कैसा अनुभव कर रही हैं?
धूल-मिट्टी में रहने वाले लोगों के लिए यह बहुत बड़ा सम्मान है। मुझे प्रसन्नता है कि सरकार ने सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को खोजकर इतना बड़ा सम्मान देने का निर्णय लिया है। यह हमारे वनवासी समाज के लिए गर्व की बात है। यह सम्मान उस समाज के लिए है, जिसके बीच मैं रहती हूं, जिस समाज के विकास के लिए बचपन से लेकर आज तक लड़ रही हूं, संघर्ष कर रही हूं।

आप किन परिस्थितियों में कार्य कर रही हैं?
मैं 1984 से समाज सेवा के कार्य में लगी हूं। 1986 में मैंने बस्तर के अबूझमाड़ में कदम रखा। एक साल तक पैदल ही दक्षिण बस्तर में भ्रमण किया। उन दिनों रास्ते भी नहीं हुआ करते थे। घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच से जाना पड़ता था। हम 3-4 बहनों ने 400-500 गांवों का दौरा किया, वहां के लोगों से मिला। शुरुआत में अबूझमाड़ के वनवासी गांवों के लोग हमें देखकर भाग जाते थे, हमसे मिलने से कतराते थे, संवाद करने से भी मना कर देते थे। लेकिन मैंने तो पहले से ही ठान रखी थी कि वनवासियों के उत्थान, शिक्षा और बेहतर जीवन के लिए कार्य करना है। इसलिए मैंने भी उनके पीछे-पीछे भागना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे वातावरण बदला। जो लोग हमें देखकर भागते थे, वे हमें सहयोग करने लगे। इसका लाभ उनके बच्चों को मिला। कोई डॉक्टर है, कोई शिक्षक है, कोई नर्स है। पीढ़ी परिवर्तन हो रहा है, जीवन स्तर सुधर रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बुधरी ताती। नीचे बस्तर के ग्रामीणों के साथ बुधरी दीदी।

कभी-कभी ऐसी स्थिति भी हो जाती थी कि बिना खाए ही सोना पड़ता था। हम लोगों ने मजदूरी भी की। दिनभर काम करने पर 1 रुपया मिलता था। इन परिस्थितियों के बीच मन में यह विचार पैदा हो गया कि अपने समाज के लिए गांव-घर छोड़कर संघर्ष करना पड़ेगा। पिछले जन्म का ऐसा कोई कर्म रहा होगा कि यह भाव प्रबल होता गया।

 

जिस अबूझमाड़ में लोग जाने से डरते थे, वहां आपने इतने गांवों का दौरा कैसे कर लिया?
डर तो सभी को लगता है। हमें भी लगता था, लेकिन अंदर का प्रबल भाव था कि अपने समाज के लिए काम करना है। यही विचार और सोच हिम्मत पैदा कर देती थी। रास्ते नहीं थे। गांव-गांव पैदल चलकर जाते थे। नक्सली मारकर फेंक देंगे, तो पता भी नहीं चलेगा- ऐसे विचार भी मन में आते थे। लेकिन फिर मन में आता था कि हमें तो वनवासियों के उत्थान के लिए कार्य करना है। समाज के विकास के लिए कार्य करना है। भगवान तो है ही, वही बचाएगा। यही सोचकर हौंसला आ जाता था। धीरे-धीरे बाद में अंदर का डर समाप्त हो गया और वनवासियों का प्यार भी मिलने लगा। सबका सहयोग मिला।

सेवा की भावना कैसे आई?
हम दो बहनें, दो भाई हैं। अब मेरी बहन इस दुनिया में नहीं रही। मेरे पैदा होने के एक सप्ताह के अंदर ही पिता का देहांत हो गया। सारी जिम्मेदारी मां पर आ गई। बचपन बेहद अभावों और संघर्षों में बीता। घर मे खाने का दाना तक नहीं होता था। पैसों का बेहद अभाव था। हम भाई-बहनों को काफी संघर्ष करना पड़ा। कभी-कभी ऐसी स्थिति भी हो जाती थी कि बिना खाए ही सोना पड़ता था। हम लोगों ने मजदूरी भी की। दिनभर काम करने पर 1 रुपया मिलता था। इन परिस्थितियों के बीच मन में यह विचार पैदा हो गया कि अपने समाज के लिए गांव-घर छोड़कर संघर्ष करना पड़ेगा। पिछले जन्म का ऐसा कोई कर्म रहा होगा कि यह भाव प्रबल होता गया। और मैंने अपने समाज के लिए कार्य करने के वास्ते घर छोड़ दिया। 1984 में नागपुर में काम किया। इसके बाद रायपुर वापस आई। फिर बस्तर को कार्यक्षेत्र बनाया। तब से लेकर अब तक वनवासी समाज के लिए ही काम कर रही हूं।

आप महिलाओं को किस तरह स्वावलंबी बना रही हैं?
अब तक वनवासी समाज की 2,000 से अधिक महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। इन महिलाओं के पास पहले 10 रुपए भी नहीं हुआ करते थे। बैंक खाते भी नहीं थे। 50-50 रुपए में 10,000 बहनों का बैंक खाता खुलवाया। महिलाओं के छोटे-छोटे समूह बनवाए। सभी महिलाओं से हर महीने 10 रुपए जमा करने का आग्रह किया। धीरे-धीरे महिलाएं इसमें जुड़ीं। महिलाओं के कई संगठन बने और आज स्थिति ऐसी है कि उन बहनों के खाते में बचत के रूप में 1,00,000 रुपए तक हैं।

Topics: महिला सशक्तिकरणनक्सल प्रभावित क्षेत्रपाञ्चजन्य विशेषदंतेवाड़ाmain. FEATUREDडॉ. बुधरी तातीपद्मश्री 2026बस्तर समाज सेवावनवासी उत्थानअबूझमाड़ परिवर्तन‘आत्मनिर्भर भारत’नक्सली डर पर विजय
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