गत 30 जनवरी को नई दिल्ली स्थित पूसा का ए. पी. शिंदे सभागार पाञ्चजन्य के 79 वर्ष की अक्षुण्ण यात्रा का सिर्फ साक्षी नहीं बना बल्कि राष्ट्रीय चेतना और भारत की विकास यात्रा का संवाद एक ही मंच पर गूंजा। पाञ्चजन्य की यह यात्रा केवल एक पत्र के प्रकाशन की शुरुआत नहीं थी, बल्कि प्रारंभ से ही इसका ध्येय राष्ट्रबोध के पथ पर आगे बढ़ते हुए वैचारिक स्पष्टता के साथ मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता की सतत संघर्ष गाथा है। इस पत्रकारीय यात्रा में संघर्षों के अनेक सबक हैं और राष्ट्र जागरण का उदघोष भी। आज जब डिजिटल पत्रकारिता के दौर में सनसनी, तत्काल समाचार और सतही विमर्श को ही सफलता का मानक मान लिया जाता है, ऐसे समय में पाञ्चजन्य ने तथ्य, वैचारिक दृढ़ता, ‘बात भारत की ‘ दृष्टि के साथ सरोकारों को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय चेतना को अपनी पत्रकारिता का मूल आधार बनाए रखा है। स्वतंत्रता के बाद के संक्रमणकाल से लेकर वैश्वीकरण और डिजिटल युग तक, पाञ्चजन्य ने विचार को खबर से और खबर को राष्ट्रहित से जोड़ने का निरंतर प्रयास जारी रखा है।
पाञ्चजन्य के स्थापना दिवस पर आयोजित ‘बात भारत की’ कार्यक्रम में भारत की ज्ञान परंपरा से लेकर देश और पूर्वोत्तर की विकास यात्रा तक, राष्ट्रीय एकात्मता से लेकर कला-संस्कृति, भाषा और तात्कालिक वैचारिक विमर्शों को समेटते हुए गहन विचार विमर्श हुआ। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य एवं प्रख्यात विचारक श्री मुकुल कानिटकर, केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी एवं आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर उपस्थित रहे। पाञ्चजन्य के स्थापना दिवस पर पढ़िये इस अंक में विशेष रपट :

















