स्थापना दिवस पाञ्चजन्य के 79 साल: “आलोचना का स्वागत, लेकिन राष्ट्र का अपमान स्वीकार नहीं”
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पाञ्चजन्य के 79 साल: “आलोचना का स्वागत, लेकिन राष्ट्र का अपमान स्वीकार नहीं”

संघ संवाद के सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य एवं प्रख्यात विचारक श्री मुकुल कानिटकर से पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने संघ की सुदीर्घ यात्रा एवं विभिन्न तात्कालिक विषयों पर विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके संपादित अंश:

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 9, 2026, 05:08 pm IST
in विश्लेषण, दिल्ली, पाञ्चजन्य इवेंट

एक तरफ परंपरा को साथ लेकर चलने की बात होती है तो दूसरी तरफ परिवर्तन है। क्या संघ ये स्वीकार करता है कि परंपरा और परिवर्तन के बीच जो तनाव या टसल है, वह भारतीय सभ्यता का स्थाई गुण है ?
भारतीय संस्कृति का जो सातत्य है, वही इसका मूल है। सहस्राब्दी की यात्रा के बाद, अनेक आक्रमणों को सहते हुए भी यह संस्कृति आज भी बनी हुई है। इसके आगे कोई टिक न सका। तुर्की के इस्तांबुल विश्वविद्यालय में 25 वर्ष से एक प्रोजेक्ट चल रहा है। सारे विश्व का खलीफा बनने का प्रयास करने वाला यह देश इस बात का अध्ययन कर रहा है कि इस्लाम जिन देशों में गया, वहां के लोग महज 20 से 22 वर्ष में मुसलमान हो गए। मिस्र में गया तो वहां 17 साल में कोई नहीं बचा। पर्शिया गया तो पर्शियन समाप्त कर दिए, जो बचे वह भारत में ही बचे। और तुर्की में गया तो वहां 21 साल में इस्लाम ने पहले की संस्कृति खत्म कर दी। लेकिन भारत में छठी-सातवीं शताब्दी में इस्लाम के आने के बाद, इतने वर्षों तक राज के बाद भी आज विश्व में 120 करोड़ से अधिक हिंदू ना केवल रह रहे हैं बल्कि विश्व विजय करने के लिए तत्पर हैं। तो इसके पीछे का रहस्य क्या है ? इसके पीछे का रहस्य है-नित्य नूतन चिर पुरातन। दिल्ली स्थित रामकृष्ण मठ के तत्कालीन अध्यक्ष स्वामी रंगनाथानंद जी को रूस में तीन व्याख्यानों के लिए आमंत्रित किया गया। तो उन्होंने एक जगह मानवीय मूल्य पर व्याख्यान दिया। एक व्याख्यान उनका आध्यात्मिक लोकतंत्र पर हुआ। और तीसरा मास्को विश्वविद्यालय में व्याख्यान हुआ उसका विषय था— बदलते हुए समाज में शाश्वत मूल्य। तो भारत में सदा से यह परिवर्तन और परंपरा का समन्वय किया गया। संघर्ष नहीं हुआ। हमारे यहां दो संकल्पना है। एक शाश्वत की संकल्पना है। सनातन धर्म की संकल्पना है। सनातन का अर्थ होता है जो काल से बाधित नहीं होता। त्रिकालबाधित सत्य है। धर्म के दस लक्षण लेंगे तो वह तो त्रिकालबाधित है। सच बोलना चाहिए। ये हजार वर्ष पहले भी उतना ही सत्य था और आज भी सत्य है। अमेरिका के लिए भी उतना ही सत्य है। ट्रंप भी झूठ बोलते हैं तो वहां के लोग भी कहते हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं। झूठ बोलने को कहीं भी सही नहीं माना गया है। आदत के रूप में हो सकता है, लेकिन सही नहीं है। ऐसे जो भी मूल्य हैं, वह सनातन मूल्य हैं। इसे ही सनातन धर्म कहा है। लेकिन यह सनातन धर्म देश, काल परिस्थिति के अनुरूप उसका उपायोजन किया जाता है। उसको हमारे यहां पर शब्द दिया युगधर्म। और इस युगधर्म की व्याख्या स्मृतियों ने की। तो संघ भी 100 वर्ष की यात्रा के बाद यदि वटवृक्ष के रूप में फल-फूल रहा है, फैल रहा है तो संघ ने परंपरा को परिवर्तन के मध्य संजोया है। इस विवेक के साथ कि किसे पकड़े रखना है, किसे छोड़ना है। जो चिरंतन है, उसे पकड़े रहना और परिवर्तन को स्वीकार करना, यह संघ का स्वभाव है, यह हिंदू का स्वभाव है। उसी हिंदू के स्वभाव से, उसी भारत के स्वभाव से उतनी ही सहजता से संघ परिवर्तन को स्वीकार करता है।

श्री मुकुल कानिटकर से बातचीत करते पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर

राज्य की आलोचना को राष्ट्र की आलोचना मान लिया जाता है। राष्ट्र हित में इसे अलग करके कैसे देखा जा सकता है ?
अंग्रेजी का शब्द है राइट। उसका अनुवाद अधिकार कर देते हैं। उर्दू में जिसे हक कहा जाता है। संस्कृत में अधिकार शब्द का ये अर्थ ही नहीं है। संस्कृत में इसे ऐसे लेंगे कि जैसे ये शास्त्र अध्ययन का अधिकारी है। यह इस मंच पर बैठने का अधिकारी है। यह उसका राइट नहीं है। तो हमारे यहां अधिकार शब्द का ऐसा अर्थ है। अधिकार आपका अंदरूनी मूल्य है, जिसे आपने अर्जित किया है। आपने जो अर्जित किया उसको कोई अन्य रोक नहीं सकता। इसलिए जब आप किसी समाज में रहते हैं तो उसकी एक मर्यादा है। ऐसा नहीं है कि आपका जो मन आए वह करेंगे। आपको स्वतंत्रता है पर एक बिंदु पर रोक भी है। इसलिए यह जो व्यक्तिगत अधिकार और राष्ट्र के बीच लड़ाई होती है, उसका कोई अर्थ नहीं है। जहां तक आलोचना की बात है, तो भारत में उसे स्वीकार किया गया है। यही नहीं उसका स्वागत किया गया है। सम्मान भी दिया। बुलाया गया। हम तो कहते हैं आओ भाई आलोचना करो। इसलिए निंदक नियरे राखिए कहा गया है। बड़े प्रेम से, उसको सत्कार के साथ रखो। कई बार हम इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि आलोचना को स्वीकार ही नहीं करते। आप कहो मेरी कब्र खुदेगी स्वीकार है। आपको अधिकार है। आप मेरी मृत्यु की कामना करो तो ये मेरे लिए अच्छी बात है। क्योंकि मेरे जीवित रहने से आप परेशान हैं। यदि राष्ट्र के शत्रु मेरे होने से परेशान हैं तो मेरे लिए तो गर्व का विषय है ये। मेरा जीवन सार्थक हो गया। इसलिए ‘मुर्दाबाद’ और ‘कब्र खुदेगी’ जैसे नारों से दुख नहीं होना चाहिए। राज्य की आलोचना करो, नीतियों की करो, व्यक्तियों की करो, सब चलेगा लेकिन हां ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’, बिल्कुल भी स्वीकार नहीं होगा। राष्ट्र का अपमान बिल्कुल भी सहन नहीं करेंगे।

 समरस शब्द संघ सृष्टि में खूब सुनाई देता है। बाहर वैसा प्रचलित नहीं हुआ। तो समरसता का व्यापक अर्थ आपकी दृष्टि में क्या है? विविध पहचानों का सम्मान करना या अंततः एकरूपता की दिशा में बढ़ना है। और अगर बढ़ना है तो वह एकरूपता किस तरह की है?
एकरूपता तो असंभव है। संस्कृत में नानात्व शब्द प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ कोई भी दो एक जैसे नहीं हैं। इस सृष्टि में नानात्व है। विविधता में तो वर्ग विविधता भी हो सकती है। दस एक प्रकार के फूल, दस दूसरे प्रकार के फूल, यह भी विविधता है। लेकिन यह दो पुष्प भी एक जैसे नहीं हैं। इसका भान होने को कहते हैं नानात्व। हमारे ऋषियों को इस नानात्व का भान था। इमली के पेड़ पर लाखों पत्ते होते हैं। कोई भी दो पत्ते एक जैसे नहीं होते। ईश्वर की सृष्टि में कोई भी दो एक समान नहीं हैं। इतना नानात्व है। तो एकरूपता तो संभव नहीं है। हम में से प्रत्येक अद्वितीय हैं। हर कोई विशिष्ट है। इसलिए समरसता ही संभव है। जब हम प्रत्येक की अद्वितीयता को स्वीकार करते हैं कि कोई मेरे जैसा बन ही नहीं सकता, क्योंकि मैं किसी के जैसा नहीं हूं। और तब मैं इस नानात्व को स्वीकार करता हूं। स्वीकार ही नहीं करता, उसका उत्सव मनाता हूं। और उसमें से जब मौलिकता को जन्म देता हूं, तब समरसता आती है। इसलिए 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए गए अपने अंतिम भाषण में डॉक्टर बाबा साहब आंबेडकर ने कहा, ‘जस्टिस एंड इक्वलिटी इन द प्रएमबल ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन आर नॉट आइसोलेटेड कांसेप्ट. देयर कैन नॉट बी जस्टिस. देयर कैन नॉट बी इक्वलिटी. इफ देयर इज नो फ्रेटरनिटी।’ बंधुता के बिना समरसता संभव ही नहीं। और उन्होंने विपक्ष के सवालों पर बंधुता शब्द पर कहा कि यह शब्द फ्रेंच राज्य क्रांति से लिया गया।

बाबासाहेब आंबेडकर ने स्पष्ट किया कि भगवान बुद्ध के एकत्व से निकली हुई यह बंधुता है। मुझे इस बंधुता की प्रेरणा उनसे मिली। इस बंधुता को जब हम स्वीकार करेंगे तो बंधुता हमें समझ में आएगी। समानता से आगे चलकर सदभाव है। जहां हम अवसर की समानता को देखते हैं। हम प्रत्येक के नानात्व को प्रकट होने का समान रूप से अवसर प्रदान करते हैं। किसी को ठोक पीट के सांचे में डाल करके एक जैसा बनाने का प्रयास नहीं करते। वह समरसता की संकल्पना है, जो भारतीय संस्कृति का मर्म है। भारत के हृदय में समरसता है। भारत के प्रत्येक व्यक्ति के मन में समरसता है। उस समरसता की अभिव्यक्ति कभी सड़क में आंदोलन के रूप में होती है। कभी घर में सहभोज के रूप में होती है। कभी गांव में सबको एक साथ लेकर उत्सव मनाने में होती है। केरल में माघ मेला फिर से प्रारंभ हो गया। वहां समरसता दिखी। केवल प्रयाग के कुंभ में नहीं केवल नासिक और उज्जैन के कुंभ नहीं, भारतपुरा के कुंभ में भी समरसता दिखती है। सब साथ में आते हैं। यह भारत की आत्मा है। संघ भारत की बात करता है। भारत को समझता है। इसलिए संघ उन सारी बातों को केंद्र में रखता है जो आत्मविस्मृति हो गईं। डॉक्टर साहब ने यही कहा कि भारत का सबसे बड़ा रोग आत्मविस्मृति है। हम स्वयं को भूल गए। आत्मविस्मृति के जंजाल से बाहर निकालने का काम संघ का काम है। अपने आप को स्वयं का स्मरण कराने का काम है।

आज सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में दो शब्द बहुत प्रयोग में आते हैं। पहला है, बहुसंख्यकवाद और दूसरा है, राष्ट्रवाद। सामाजिक—राजनीतिक विमर्श गढ़ने के लिए इन शब्दों का प्रयोग विमर्श की आधारशिला रखने में प्रयोग होता है। क्या बहुसंख्यकवाद और राष्ट्रवाद के बीच एक सूक्ष्म परंतु खतरनाक अंतर आप देखते हैं ? इन दोनों शब्दों को कैसे परिभाषित करेंगे?
यह जो ‘वाद’ नाम की शब्दावली है, यह यूरोप की है। ‘इज्म’ यह यूरोप की शब्दावली है। भारत में ‘इज्म’ नहीं है। भारत में ‘वादे वादे जायते तत्व बोधा’ कहा गया है। उसमें ये ‘इज्म’ या ‘वाद’ की बात नहीं है। वदति इस धातु से वाद आता है। तो बोलने को वाद कहा गया। तो बोलेंगे आपस में संवाद भी उसी से बना। तो बोलेंगे सम्यक होगा तो संवाद होगा। यदि विपरीत होगा तो विवाद होगा। लेकिन ‘वाद’ शब्द का अर्थ तो बोलना है। और यहां हमने पता नहीं क्या-क्या ‘वाद’ लगा रखे हैं। यहां तक कि हिंदूवाद भी। हिंदूइज़्म कैसे हो सकता है? बुद्धिज्म कैसे हो सकता है? जैनिज्म कैसे होगा? फिर तुम इस्लामिज्म क्यों नहीं बोलते? क्रिश्चियनिज्म क्यों नहीं बोलते ? यह इज्म का इज्म है ही नहीं। इसलिए ना बहुसंख्यकवाद है और ना राष्ट्रवाद है। दोनों शब्दों को संघ स्वीकार नहीं करता। संघ मानता ही नहीं कोई बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की कल्पना है। हम मानते हैं कि इस भारत को जो अपनी मातृभूमि मानता है, पितृभूमि मानता है, चाहें जिस भी ईश्वर की पूजा करता हो, चाहे जिस भी उपासना पद्धति को मानता हो, वह हमारे लिए हिंदू है।

हिंदुत्व हमारा राष्ट्रीयत्व है। राष्ट्रवाद नहीं है। यह हमारी राष्ट्रीयता है। इसलिए तुम अल्लाह की पूजा करते हो तो भी तुम हिंदू हो हमारे लिए। ऐसे ही यदि तुम ईसा मसीह की पूजा करते हो तो भी तुम हिंदू हो। यदि तुम भारत को मानते हो। तो हिंदुत्व हमारे लिए उपासना पद्धति से जुड़ा हुआ विषय नहीं है। ये विषय जब हम समझते तो यह बहुसंख्यकवाद और बहुलतावाद इस-उस चक्कर में पड़ते ही नहीं। जब हमारे यहां नानात्व है तो बहुलता क्या हुई? उस नानात्व को जो नहीं समझता वह ‘प्लूरलिज्म’ की बात करता है। ‘मल्टीकल्चरलिज्म’ कहता है। अरे संस्कृति तो सारे मानवता की एक ही है। करुणा, शुचिता, मुदिता, समता यह तो संस्कृति है। ये मूल्य ही तो जीवन का आधार हैं। तो जब यह संस्कृति है तो ‘मल्टीकल्चरिज्म’ कैसे हो सकता है? भारत ने इन विषयों को जिया है। इसलिए हम उसको भारतीय संस्कृति कहते हैं। इसलिए राष्ट्रवाद शब्द को भी टालना चाहिए। मेरा कहना कि वाद-विवाद के चक्कर में मत पड़िए। राष्ट्रीय पत्रकार बनिए। राष्ट्रीय विचारक बनिए। राष्ट्रीय लेखक बनिए। राष्ट्रप्रेमी बनिए। राष्ट्रभक्त बनिए। राष्ट्र के काम करने के लिए राष्ट्रकर्ता बनिए। केवल भाव प्रेम का होकर के नहीं चलेगा। केवल भक्ति होकर के नहीं चलेगी। वह सेवा के रूप में, अपने कर्म में भी उतारनी पड़ेगी। हम संघ में इस बात को इस ढंग से देखते हैं। हम एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक जन की बात करते हैं। भारत एक राष्ट्र है। इसका एक जन है। विभिन्न विविधताओं के मध्य जन एक हैं। और मैं पूरे भारत में प्रवास करता हूं और मैंने देखा है कि भाषा अनेक हैं लेकिन भाव एक है।

श्री मुकुल कानिटकर का अभिनंदन करते (बाएं से) श्री कपिल खन्ना, श्री हितेश शंकर और श्री अरुण कुमार गोयल

‘संस्कृति सबकी एक, निरंतर खून रगों में हिंदू है।’ ऐसा संघ का गीत हम सुनते आ रहे हैं। संस्कृति के प्रवाह की बात के. एम. मुंशी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बाबा साहब आंबेडकर ने की। इसी निरंतरता में अतीत की बजाय जब हम भविष्य को देखते हैं तो भविष्य के तकनीकी विषय, भविष्य में वैश्वीकरण के विषय, भविष्य में सामाजिक संरचनाओं और परंपराओं का बदलना, ऐसे में नैतिकताओं की परिभाषाएं क्या होंगी? संरचनाएं कैसी होंगी, संघ उन्हें कैसे देखता है? साथ ही जो युवा पीढ़ी है उसकी देशभक्ति का स्वरूप क्या पुराने समय के उदाहरण जो हैं उनसे भिन्न नहीं हो सकती? भिन्न हो सकती है तो उस भिन्नता को संघ कैसे स्वीकार करता है?
समय के साथ तो बदलना ही पड़ता है। काल सतत प्रवाहित है। हमारे यहां मृत्यु को भी काल कहते हैं। काल के चक्र को हम उल्टा नहीं घुमा सकते। स्वतंत्रता से पहले देश के लिए मरना आवश्यक था। हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए। इसलिए बलिदानियों को हम नमन करते हैं। लेकिन आज हमें ऐसा करने की जरूरत नहीं है। आज देश के लिए जीने की आवश्यकता है। तो आज देशभक्ति के मायने बदलने ही पड़ेंगे। स्वयं के अंदर ढूंढना है कि मैं आज के समय देश के लिए क्या कर रहा हूं। आत्मावलोकन करना है। रात को सोने से पहले स्वयं से पूछें कि आज मैंने क्या किया देश के लिए? देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें। तो रात को सोने से पहले पूछो क्या आप देश को दे रहे हैं। अन्यथा तो स्वामी विवेकानंद कहते हैं ये शरीर चलता फिरता, खेलता-बोलता शव है। आज आपने क्या किया? कितनों को मुस्कुराहट दी? कितनों को संबल दिया? कितनों को प्रेम दिया? कितनों को स्नेह दिया? जब हम ऐसा मूल्याकंन शुरू कर देंगे तो हमें पता चलने लगेगा कि हम देश के लिए क्या कर रहे हैं।

Topics: मल्टीकल्चरिज्ममुकुल कानिटकरसंघ का गीतपाञ्चजन्य विशेषबहुसंख्यकवादबाबासाहेब आंबेडकरसंघ संवादयुगधर्मसंघ परिवर्तनहितेश शंकरसंघ सृष्टिसमरसताबहुलतावादराष्ट्रवाद
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