100 साल का बुजुर्ग हत्या के केस से बरी, 42 साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिला इंसाफ
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100 साल का बुजुर्ग हत्या के केस से बरी, 42 साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिला इंसाफ

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 के मर्डर केस में 42 साल बाद 100 वर्षीय बुजुर्ग को बरी किया। कोर्ट ने अपने 23 पन्नों के फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां भी की। अभियोजन की कहानी पर उठे सवाल

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Feb 5, 2026, 08:28 pm IST
in भारत, उत्तर प्रदेश
Allahabad High Court

प्रयागराज (हि.स.) । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1982 के मर्डर केस में 100 साल के बुजुर्ग धनीराम को सजा से बरी कर दिया। पहले सेशन कोर्ट, हमीरपुर ने आरोपिताें को दोषी ठहराते हुए 1984 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसी फैसले के खिलाफ अगस्त 1984 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की गई थी। 42 साल बाद हाई कोर्ट से बुजुर्ग काे आराेपाें से बरी कर दिया गया। कोर्ट ने अपने 23 पन्नों के फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां भी की हैं।

अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में रहा नाकाम

उच्च न्यायालय ने यह फैसला केस की खूबियों के आधार पर किया। खासकर अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। हाईकोर्ट जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने अपने लम्बे फैसले में आरोपित की उम्र के बारे में कुछ ज़रूरी बातें कही हैं।

दशकों की देरी पर कोर्ट की मानवीय टिप्पणी

कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब कोई व्यक्ति जीवन के आखिरी पड़ाव पर कोर्ट के सामने खड़ा होता है तो दशकों की प्रक्रियात्मक देरी के बाद दंडात्मक परिणामों पर ज़ोर देना न्याय को एक ऐसे अनुष्ठान में बदलने का जोखिम पैदा करता है जो अपने मूल उद्देश्य से अलग हो जाता है।

न्याय में संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण जरूरी

कोर्ट ने आगे कहा कि जब सिस्टम खुद ही उचित समय के भीतर अंतिम फैसला देने में असमर्थ रहा है तो राहत देते समय कोर्ट एक संतुलित, मानवीय दृष्टिकोण अपनाने में सही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि न्याय अब क्या चाहता है, इसका आकलन करते समय दशकों से आरोपित द्वारा झेली गई चिंता, अनिश्चितता और सामाजिक परिणामों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।

1982 की घटना का अभियोजन पक्ष का दावा

मामले के अनुसार अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि 9 अगस्त, 1982 को शिकायतकर्ता और उसका भाई गुनुआ घर लौट रहे थे, जब वे मैकू से मिले, जिसके पास बंदूक थी, सत्ती दीन, जिसके पास भाला-बल्लम था और अपीलकर्ता-धनी राम, जिसके पास कुल्हाड़ी-फरसा था। कथित तौर पर सत्ती दीन और धनीराम (अपीलकर्ता) ने मैकू को गुनुआ को मारने के लिए उकसाया, क्योंकि उसने एक बार उसकी पिस्तौल ज़ब्त करवा दी थी और उसकी छह बीघा ज़मीन भी ले ली थी। पुरानी दुश्मनी के कारण मैकू ने उस पर गोली चला दी। गोली मृतक की पीठ में लगी, जिससे वह गिर गया और मर गया। गोली चलने की आवाज़ सुनकर 4 लोग घटनास्थल की ओर दौड़े और बीच-बचाव करने की कोशिश की। हालांकि, आरोपित भाग गए। जुलाई, 1984 में एडिशनल सेशन जज, हमीरपुर ने सत्ती दीन और धनीराम को धारा 302 के साथ धारा 34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।

मुख्य आरोपित फरार, सह-आरोपित की मौत

मुख्य आरोपित मैकू फरार हो गया। सत्ती दीन की अपील के दौरान ही मौत हो गई। इस तरह हाईकोर्ट के सामने सिर्फ़ धनीराम ही अकेले जीवित अपीलकर्ता बचे। हाईकोर्ट में कहा गया कि अपीलकर्ता की उम्र लगभग 100 साल है और उसे सिर्फ़ उकसाने का रोल दिया गया। यह कहा गया कि मुख्य आरोपित यानी मैकू जिसने कथित तौर पर मृतक को गोली मारी थी, उसे पुलिस ने कभी गिरफ्तार नहीं किया।

शासकीय अधिवक्ता का पक्ष

दूसरी ओर शासकीय अधिवक्ता ने आपराधिक अपील का विरोध किया। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि आरोपित अपीलकर्ता अब 100 साल का है।

गवाहों और सबूतों में गंभीर विरोधाभास

हाईकोर्ट की टिप्पणियां मामले और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने दो मुख्य गवाहों की गवाही और अन्य दस्तावेजी सबूतों को इन कारणों से मूल रूप से अविश्वसनीय पाया-

(i) घटना की शुरुआत में विरोधाभास।

(ii) चश्मदीद गवाह के तौर पर अनुचित व्यवहार।

(iii) प्राथमिकी में कमी।

(iv) स्वाभाविक रूप से असंभव बातें।

मेडिकल रिपोर्ट और गवाही में असंगति

बेंच ने आंखों देखे और मेडिकल सबूतों के बीच एक महत्वपूर्ण विसंगति की ओर भी इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि जबकि प्रॉसिक्यूशन के गवाहों ने दावा किया कि गोली लगने के बाद मृतक ज़मीन पर गिर गया, और सत्ती दीन ने फिर उसके सीने में भाला घोंप दिया, वहीं पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में चोट नंबर 5 को “आगे से पीछे और थोड़ा ऊपर” की दिशा वाला एक पंक्चर घाव बताया गया।

प्राथमिकी पर भी जताया गया संदेह

कोर्ट ने कहा कि अगर मृतक ज़मीन पर सीधा लेटा हुआ था, तो ऐसी ऊपर की ओर जाने वाली दिशा कानूनी और वैज्ञानिक रूप से असंभव थी। इसके अलावा, कोर्ट ने खुद प्राथमिकी पर भी शक किया।

बेंच ने कहा कि जबकि शिकायतकर्ता ने माना कि उसके अंगूठे के निशान की स्याही ‘रॉयल ब्लू’ थी, मुकदमा असल में ‘ब्लू-ब्लैक’ स्याही से लिखा गया। इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्राथमिकी शायद जांच अधिकारी के आने के बाद सोच-समझकर तैयार की गई होगी।

फरसा से चोट का कोई सबूत नहीं

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि जबकि अपीलकर्ता-धानी राम पर कुल्हाड़ी (फरसा) से लैस होने का आरोप था, मेडिकल रिपोर्ट में ऐसे हथियार से लगी कोई चोट नहीं दिखाई गई। इस तरह यह मानते हुए कि घटना की शुरुआत और तरीका संदिग्ध है और प्रॉसिक्यूशन ने घटना की असलियत को छिपाया, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।

40 साल की अपील भी अपने आप में सजा

हालांकि बरी सबूतों के आधार पर किया गया, कोर्ट ने यह भी कहा कि धानी राम अब लगभग 100 साल के हैं, जिन्होंने पेंडिंग अपील के साये में बेल पर लगभग 40 साल बिता दिया है।

न्याय मानवीय हालात से अलग नहीं हो सकता

बेंच के लिए लिखते हुए जस्टिस चंद्रधारी सिंह ने कहा, “न्याय कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो इंसानी हालात से अलग हो। कानून इस सच्चाई से अनजान नहीं हो सकता कि बढ़ती उम्र अपने साथ शारीरिक कमज़ोरी, निर्भरता और जीवन के सीमित होते दायरे को लाती है।”

पीढ़ियों तक चलने वाली प्रक्रिया खुद सजा बन जाती है

कोर्ट ने ज़ोर दिया कि इतनी बड़ी देरी सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं है। यह निष्पक्षता को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बन जाता है। बेंच ने कहा, “एक आपराधिक प्रक्रिया जो पीढ़ियों तक चलती है, वह सिर्फ जवाबदेही का एक तंत्र नहीं रह जाती और अपने आप में सज़ा का रूप ले लेती है।”

सजा रद्द, अपील स्वीकार

हाईकोर्ट ने सज़ा रद्द की और अपील स्वीकार कर ली और अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

Topics: IPC 302Allahabad High Court Murder Case42 Years Old Case Verdict100 Year Old AcquittalIPC 302 Appealइलाहाबाद हाईकोर्टJudicial Delay Indiaमर्डर केसउम्रकैद से बरीआपराधिक अपीलन्यायिक देरीधनीराम केस
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