प्रयागराज (हि.स) । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत से जुड़े मामले में एमज़ेड विज़टाउन प्लानर्स के निदेशक अभय कुमार को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि अभय कुमार की गिरफ्तारी हाईकोर्ट के हालिया फैसले और निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए की गई।
खंडपीठ की टिप्पणी, हालिया निर्णय के विपरीत हुई गिरफ्तारी
जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने पाया कि अभय कुमार की गिरफ्तारी उमंग रस्तोगी एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में दिए गए निर्णय के विपरीत की गई। विशेष रूप से गिरफ्तारी मेमो की धारा 13 का पालन नहीं किया गया, जो उत्तर प्रदेश में अनिवार्य रूप से लागू है।
गिरफ्तारी मेमो की धारा 13 के उल्लंघन पर कोर्ट की आपत्ति
कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी मेमो की धारा 13 के तहत पुलिस को यह स्पष्ट रूप से दर्ज करना आवश्यक होता है कि आरोपित की भूमिका से सम्बंधित ठोस सामग्री क्या है। साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तारी की आवश्यकता क्यों पड़ी और कौन से दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मौजूद हैं।
कानून के विरुद्ध मानी गई गिरफ्तारी
इन अनिवार्य शर्तों का पालन किए बिना की गई गिरफ्तारी को कोर्ट ने कानून के विरुद्ध माना। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए खंडपीठ ने सम्बंधित प्राधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता अभय कुमार को तत्काल रिहा किया जाए। इसके साथ ही बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार कर लिया गया।
निर्माण स्थल हादसे से जुड़ा मामला
मामला नोएडा के सेक्टर-150 स्थित एक व्यावसायिक निर्माण स्थल से जुड़ा है, जहां सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की एक पानी से भरे गड्ढे में गिरने से मौत हो गई थी। बताया गया कि घने कोहरे के बीच युवराज ने एक तीखा मोड़ लिया और निर्माण स्थल के पास बने खुले व पानी से भरे गड्ढे में गिर गए।
प्रारम्भिक जांच में सामने आई लापरवाही
प्रारम्भिक जांच में सामने आया था कि निर्माणाधीन परियोजना के पास मौजूद इस गड्ढे पर कोई चेतावनी चिह्न, बैरिकेडिंग या स्पष्ट चिन्हांकन नहीं किया गया था। यह परियोजना ’विज़टाउन प्लानर्स’ द्वारा संचालित की जा रही थी।
गिरफ्तारी, जमानत खारिज और हाईकोर्ट में याचिका
इसी आधार पर कम्पनी के निदेशक अभय कुमार को 20 जनवरी को गैर-इरादतन हत्या व लापरवाही से मृत्यु कारित करने और मानव जीवन को खतरे में डालने के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। 2 फरवरी को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। जिसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाइकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी।
















