भुवनेश्वर: दक्षिणी ओडिशा में माओवादी विरोधी अभियानों को बड़ी सफलता मिली है। ₹21 लाख के कुल इनाम वाला एक हार्डकोर माओवादी नेता बुधवार को मलकानगिरि के पुलिस अधीक्षक (एसपी) के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इस घटनाक्रम को क्षेत्र में माओवादी गतिविधियों के लिए बड़ा झटका और जिले को माओवादी-मुक्त बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी की पहचान सुकराम उर्फ सुरेश उर्फ योगेश के रूप में हुई है, जो प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) संगठन का एरिया कमेटी मेंबर (एसीएम) था। पुलिस के अनुसार, वह पिछले करीब 16 वर्षों से ओडिशा और पड़ोसी छत्तीसगढ़ में सक्रिय था और उसके खिलाफ कई गंभीर आपराधिक मामलों में तलाश थी। अधिकारियों ने बताया कि सुकराम ओडिशा, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के माओवादी प्रभावित इलाकों में आईईडी विस्फोट, नागरिकों के अपहरण और हत्याओं जैसी कई हिंसक घटनाओं में शामिल रहा है।
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आत्मसमर्पण के दौरान सुकराम ने एक सेल्फ-लोडिंग राइफल (एसएलआर), 12 राउंड जिंदा कारतूस और अन्य माओवादी सामग्री पुलिस को सौंपी। उसने प्रतिबंधित संगठन से सभी संबंध औपचारिक रूप से तोड़ते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास जताया। प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए मलकानगिरि के एसपी विनोद पाटिल ने कहा कि सुकराम का आत्मसमर्पण जिले में माओवादी अभियानों पर निर्णायक प्रहार है। उन्होंने कहा, “सीपीआई (माओवादी) के एक परिचालन और वैचारिक नेता का आत्मसमर्पण एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे मलकानगिरि को पूरी तरह नक्सल-मुक्त बनाने के हमारे लक्ष्य को बल मिला है।” इस दौरान सुकराम भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद रहा।
एसपी पाटिल ने यह भी स्पष्ट किया कि आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी को ओडिशा सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत सभी लाभ प्रदान किए जाएंगे। उन्होंने कहा, “उसने मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया है और सरकार के निर्धारित मानकों के अनुसार उसका पुनर्वास किया जाएगा।” पुलिस सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा बलों के निरंतर दबाव, माओवादी संगठन के भीतर बढ़ती असंतुष्टि और व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर बढ़ते भय के चलते हाल के महीनों में आत्मसमर्पण की घटनाओं में इजाफा हुआ है। अधिकारियों ने बताया कि हाल के समय में मलकानगिरि एसपी के समक्ष लगभग 22 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है, जो सशक्त काउंटर-इंसर्जेंसी अभियानों और पुनर्वास पहलों की प्रभावशीलता को दर्शाता है।
राज्य सरकार द्वारा 31 मार्च तक माओवादी प्रभावित क्षेत्रों से वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने की समयसीमा तय किए जाने के मद्देनजर सुरक्षा एजेंसियों ने माओवादी गढ़ों में अभियान तेज कर दिए हैं। पुलिस ने बताया कि कॉम्बिंग ऑपरेशन, खुफिया जानकारी पर आधारित कार्रवाई और सामुदायिक संपर्क कार्यक्रमों के जरिए माओवादी नेटवर्क को ध्वस्त करने और स्थायी शांति सुनिश्चित करने के प्रयास जारी रहेंगे।
कभी ओडिशा में माओवादी हिंसा का केंद्र माने जाने वाला मलकानगिरि जिले में पिछले कुछ वर्षों में उग्रवादी गतिविधियों में लगातार कमी दर्ज की गई है। एक सेवानिवृत्त डीजीपी रैंक के अधिकारी ने बताया कि राज्य में माओवादी हिंसा की शुरुआत मलकानगिरि से हुई थी, जो बाद में ओडिशा के 30 में से 21 जिलों तक फैल गई। उन्होंने कहा, “1990 के दशक में पड़ोसी आंध्र प्रदेश में सक्रिय माओवादी अक्सर मलकानगिरि में शरण लेते थे। यहीं से उन्होंने धीरे-धीरे पूरे ओडिशा में अपना नेटवर्क फैलाया।”
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एक दिन पहले सुंदरगढ़ में झारखंड का माओवादी ने भी किया था आत्म समर्पण
इसी कड़ी में एक अन्य घटनाक्रम में, पड़ोसी झारखंड का एक माओवादी कैडर एक दिन पहले सुंदरगढ़ जिले में आत्मसमर्पण कर चुका है, जिससे अंतर-राज्यीय सीमाओं पर तेज किए गए माओवादी विरोधी अभियानों का व्यापक असर सामने आया है।
आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी की पहचान उम्बलेन होनहागा उर्फ प्रभु के रूप में हुई है, जो सीपीआई (माओवादी) का लोकल गुरिल्ला स्क्वाड मेंबर (एलजीएसएम) था। वह झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के छोटानागरा थाना क्षेत्र अंतर्गत हलामुली गांव का निवासी है और सरांडा जंगल जैसे माओवादी गढ़ में सक्रिय था।
प्रभु ने सुंदरगढ़ जिला पुलिस कार्यालय में डीआईजी (पश्चिमी रेंज) बृजेश कुमार राय और राउरकेला एसपी नितेश वाधवानी के समक्ष आत्मसमर्पण किया। डीआईजी राय ने बताया कि प्रभु प्रतिबंधित संगठन के दक्षिण छोटानागरा डिवीजन से जुड़ा था और माओवादी विचारधारा से मोहभंग का शिकार हो गया था। उन्होंने कहा, “वह वरिष्ठ नेताओं द्वारा की जा रही आंतरिक प्रताड़ना से परेशान था और सुरक्षा बलों की लगातार कॉम्बिंग के कारण उसे अपनी जान का डर सताने लगा था। ओडिशा सरकार की आत्मसमर्पण नीति से प्रभावित होकर उसने हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया।” एसपी वाधवानी ने बताया कि प्रभु पिछले दो वर्षों से माओवादी संगठन के साथ सक्रिय था। उन्होंने कहा कि वामपंथी उग्रवाद के उन्मूलन पर राज्य सरकार के जोर के चलते ओडिशा-झारखंड सीमा पर माओवादी विरोधी अभियान और तेज किए गए हैं। यह आत्मसमर्पण सरांडा जंगल में हुए एक बड़े माओवादी विरोधी अभियान की पृष्ठभूमि में हुआ है, जहां लगभग पखवाड़े भर पहले छोटानागरा थाना क्षेत्र में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में 15 माओवादी मारे गए थे। अधिकारियों का मानना है कि निरंतर सुरक्षा कार्रवाई, अंतर-राज्यीय समन्वय और पुनर्वास-केंद्रित नीतियों का संयुक्त प्रभाव माओवादी कैडरों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित कर रहा है, जो क्षेत्र में लाल आतंक के खिलाफ लड़ाई में एक निर्णायक मोड़ का संकेत देता है।

















