1984 के सिख-विरोधी दंगों की त्रासदी भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसकी पीड़ा आज भी पूरी तरह भरी नहीं मानी जाती। इसी पृष्ठभूमि में जब कांग्रेस और सिख समुदाय के संबंधों पर चर्चा होती है, तो आलोचना बार-बार इस आरोप के साथ सामने आती है कि पार्टी अपने अतीत की संवेदनशील विरासत से पूरी तरह उबर नहीं पाई। इंदिरा गांधी के दौर से लेकर राजीव गांधी के समय तक उठे विवादों की स्मृतियाँ अभी भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा हैं, और अब हाल की एक घटना ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है।
संसद परिसर के बाहर कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के लिए “गद्दार” शब्द का प्रयोग राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया का कारण बना। राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, परंतु जब भाषा इतनी तीखी हो जाए कि वह व्यक्तिगत गरिमा और ऐतिहासिक संवेदनशीलताओं को छूने लगे, तो प्रश्न केवल राजनीति का नहीं, सार्वजनिक शिष्टाचार का भी बन जाता है।
इस घटना के दौरान कुछ पंजाब से आने वाले कांग्रेस सांसदों, जिनमें अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग का नाम भी लिया गया, की मौजूदगी और उनके व्यवहार को लेकर भी आलोचना हुई। इसी तरह केरल से सांसद हिबी एडेन की प्रतिक्रिया पर भी राजनीतिक टिप्पणी हुई। उस समय दोनों नेता कुछ ज़्यादा ही उत्तेजित और आक्रामक अंदाज़ में प्रतिक्रिया देते दिखाई दे रहे थे। एक सांसद सिख समुदाय से थे और दूसरे ईसाई समुदाय से। कम से कम उन प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जा सकती थी कि वे ऐसे संवेदनशील क्षण में संयम और गरिमा का परिचय देते। लेकिन जब राजनीतिक निष्ठा ही सर्वोपरि हो जाए और नेतृत्व को प्रसन्न रखना प्राथमिक लक्ष्य बन जाए, तब कई बार मूल मुद्दों की गंभीरता पीछे छूट जाती है—और यही चिंता इस पूरे घटनाक्रम को लेकर व्यक्त की जा रही है।
यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि यह केवल एक तात्कालिक तकरार नहीं, बल्कि उस व्यापक प्रश्न की ओर इशारा करता है—क्या भारतीय राजनीति अब भी इतिहास से जुड़ी सामुदायिक संवेदनशीलताओं को पूरी गंभीरता से समझने और सम्मान देने में सफल हो पाई है, या फिर बयानबाज़ी की तीव्रता अक्सर उस मर्यादा को लांघ जाती है जिसकी लोकतंत्र में अपेक्षा की जाती है।
विदित रहे कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है, और उसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी यही विविधता बनती है। जब राजनीति भाषा के माध्यम से चलती है, तो शब्द केवल विचार व्यक्त नहीं करते, वे इतिहास को छूते हैं, समुदायों की स्मृतियों को जगाते हैं और विश्वास या अविश्वास की नींव को प्रभावित करते हैं। बुधवार को संसद परिसर के बाहर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के बीच हुई तीखी नोकझोंक ने एक बार फिर उस संवेदनशील प्रश्न को सामने ला दिया है, जो दशकों से भारतीय राजनीति में मौजूद है—सिख समुदाय और कांग्रेस पार्टी के रिश्तों का इतिहास, उसकी जटिलताएँ और आज की राजनीति पर उसका प्रभाव।
यह प्रकरण केवल दो नेताओं के बीच का टकराव नहीं था। इसमें प्रयुक्त भाषा, राजनीतिक पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भों ने इसे एक व्यापक विमर्श का विषय बना दिया। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक मतभेद तीखे हों, पर जब शब्दों का संबंध किसी समुदाय की पहचान, उसके ऐतिहासिक अनुभव और सामूहिक स्मृति से जुड़ जाता है, तब उनका असर सामान्य राजनीतिक बयान से कहीं अधिक गहरा हो जाता है।
रवनीत सिंह बिट्टू का नाम इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि उनका राजनीतिक जीवन केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की कहानी नहीं, बल्कि पंजाब के हिंसक दौर के इतिहास से जुड़ा हुआ है। वे पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं। बेअंत सिंह ने उस समय पंजाब की बागडोर संभाली थी जब राज्य उग्रवाद, अलगाववाद और निरंतर हिंसा से जूझ रहा था। 1990 के दशक के मध्य में कानून-व्यवस्था को स्थिर करने के प्रयासों के बीच 1995 में चंडीगढ़ स्थित सचिवालय परिसर में हुए आत्मघाती विस्फोट में उनकी हत्या कर दी गई। यह घटना उस दौर की जटिलता और जोखिम को दर्शाती है, जब राजनीतिक नेतृत्व को सीधे हिंसक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण बिट्टू की राजनीतिक पहचान राष्ट्र, सुरक्षा और पंजाब के कठिन इतिहास से जुड़ जाती है।
इसीलिए जब उनके लिए सार्वजनिक रूप से “गद्दार” जैसा शब्द प्रयोग होता है, तो प्रतिक्रिया केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि भावनात्मक और ऐतिहासिक स्तर पर भी होती है। लोकतंत्र में दल बदलना, राजनीतिक रुख बदलना या वैचारिक असहमति व्यक्त करना असामान्य नहीं है। परंतु किसी भी नेता की आलोचना करते समय प्रयुक्त शब्दों का चयन इस बात को तय करता है कि बहस वैचारिक रहेगी या व्यक्तिगत और भावनात्मक स्तर पर चली जाएगी।
इस पूरे विवाद को समझने के लिए सिख समुदाय और कांग्रेस के ऐतिहासिक संबंधों की पृष्ठभूमि को देखना आवश्यक है। यह संबंध एकरेखीय नहीं रहे; इनमें सहयोग, प्रतिनिधित्व और तनाव—तीनों तत्व मौजूद रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद के दशकों में पंजाब की राजनीति, केंद्र–राज्य संबंध, भाषा, धर्म और क्षेत्रीय पहचान के प्रश्नों ने कई बार राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित किया। पर सबसे निर्णायक मोड़ 1980 के दशक में आया।
1984 भारतीय इतिहास का एक अत्यंत संवेदनशील वर्ष रहा। जून 1984 में अमृतसर स्थित श्री दरबार साहिब पर आक्रमण करते हुए श्री दरबार साहिब परिसर में सैन्य कार्रवाई हुई, जिसे व्यापक रूप से ऑपरेशन ब्लू स्टार के नाम से जाना जाता है। इस अभियान का घोषित उद्देश्य जो भी रहा हो लेकिन इसके दौरान हुए नुकसान ने सिख समुदाय की भावनाओं को गहराई से प्रभावित किया। विशेष रूप से श्री अकाल तख्त साहिब को हुई क्षति धार्मिक और प्रतीकात्मक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील थी। सिख समाज ने इसे अपनी आस्था और गरिमा पर आघात के रूप में महसूस किया। यह घटना आज भी राजनीतिक और भावनात्मक चर्चाओं का हिस्सा है।
इसी वर्ष अक्टूबर में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर दिल्ली में, सिखों के विरुद्ध व्यापक हिंसा भड़की। सिखों का कत्लेआम किया गया, हजारों लोग मारे गए, संपत्ति नष्ट हुई, परिवार उजड़े। यह हिंसा भारतीय लोकतंत्र पर एक गहरा धब्बा मानी जाती है। तब राजीव गांधी सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं ने कहा था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है। इसके बाद के वर्षों में अनेक आयोग, जाँच और न्यायिक प्रक्रियाएँ चलीं। कुछ मामलों में दोषसिद्धियाँ भी हुईं, परंतु न्याय की प्रक्रिया लंबी और जटिल रही, जिससे पीड़ित सिख समुदाय के एक हिस्से में यह भावना बनी रही कि न्याय देर से मिला या आंशिक रूप से मिला।
इन घटनाओं ने सिख समुदाय और कांग्रेस के रिश्तों पर स्थायी प्रभाव डाला। कांग्रेस नेतृत्व ने समय-समय पर इन घटनाओं पर खेद तो व्यक्त किया लेकिन कभी भी ना तो खुलकर माफी मांगी और ना ही गुनेहगारों को सजा देने की मांग की बल्कि 1984 सिख कत्लेआम में शामिल कांग्रेस के बड़े नेताओं को बड़े पदों से नवाज़ा गया जिनमें सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, कमलनाथ प्रमुख तौर पर शामिल हैं। सामूहिक स्मृति में दर्ज पीड़ा केवल औपचारिक वक्तव्यों से पूरी तरह समाप्त नहीं होती। यही कारण है कि जब भी वर्तमान राजनीति में कोई ऐसा प्रसंग सामने आता है, जिसमें सिख पहचान या सम्मान का प्रश्न जुड़ता है, तो 1984 की स्मृतियाँ स्वतः सक्रिय हो जाती हैं।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस के भीतर सिख नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं। फिर भी, इतिहास के संवेदनशील अध्यायों के कारण विश्वास की डोर हमेशा थोड़ी नाज़ुक बनी रही।
यही पृष्ठभूमि हालिया विवाद को और संवेदनशील बनाती है। जब राहुल गांधी द्वारा बिट्टू के लिए तीखा शब्द प्रयोग किया गया, तो उसके राजनीतिक अर्थ से अधिक उसके भावनात्मक अर्थ निकाले गए। बहुत से लोगों ने इसे केवल एक दल बदलने वाले नेता पर हमला नहीं, बल्कि उस समुदाय के प्रतिनिधि पर नैतिक टिप्पणी के रूप में देखा। दूसरी ओर, राहुल गांधी के समर्थकों का तर्क है कि यह टिप्पणी राजनीतिक संदर्भ में थी, न कि सामुदायिक पहचान के आधार पर। पर लोकतंत्र में शब्दों की व्याख्या केवल वक्ता के इरादे से नहीं, श्रोता के अनुभव से भी होती है।
यहीं से राजनीतिक बयानबाज़ी की जिम्मेदारी का प्रश्न उठता है। सार्वजनिक जीवन में उच्च पदों पर बैठे नेताओं के शब्द निजी बातचीत की तरह नहीं होते। वे रिकॉर्ड होते हैं, दोहराए जाते हैं, और विभिन्न संदर्भों में समझे जाते हैं। विशेषकर भारत जैसे बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश में, भाषा की सावधानी लोकतांत्रिक शिष्टाचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक शब्द जो किसी संदर्भ में राजनीतिक व्यंग्य लगे, दूसरे संदर्भ में अपमान का संकेत बन सकता है।
इसलिए लोकतांत्रिक परिपक्वता का एक मापदंड यह भी है कि नेता असहमति व्यक्त करते समय पहचान आधारित संकेतों से बचें और बहस को नीति, विचार और कार्यशैली तक सीमित रखें। इतिहास से जुड़ी संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखना केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, राजनीतिक बुद्धिमत्ता भी है।
रवनीत सिंह बिट्टू का राजनीतिक जीवन भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। उन्होंने युवा राजनीति से शुरुआत की, लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया और पंजाब की मुख्यधारा राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। हाल के वर्षों में उनका राजनीतिक दल बदलना विवाद का विषय बना, पर यह भी भारतीय राजनीति की एक स्थापित वास्तविकता है कि नेता वैचारिक, रणनीतिक या क्षेत्रीय कारणों से दल बदलते रहे हैं। इस प्रक्रिया की आलोचना की जा सकती है, पर इसे राष्ट्रभक्ति या विश्वासघात जैसे नैतिक शब्दों से जोड़ना बहस को अधिक तीखा और भावनात्मक बना देता है।
इस पूरे प्रकरण से जो व्यापक संदेश निकलता है, वह यह है कि भारतीय राजनीति अब भी अपने इतिहास के साथ संवाद की प्रक्रिया में है। सिख समुदाय और कांग्रेस के संबंधों में जो तनाव और अविश्वास के तत्व मौजूद रहे हैं, वे समय के साथ कम तो हुए हैं, पर पूरी तरह समाप्त नहीं हुए और यह सारा घटनाक्रम भी उसी ओर इशारा कर रहा है।
लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कितनी मर्यादित रहती है। तीखी आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, पर अपमानजनक या भावनात्मक रूप से उत्तेजक शब्दावली सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकती है। नेताओं की भाषा केवल वर्तमान बहस को नहीं, भविष्य के संबंधों को भी आकार देती है।
अंततः यह विवाद एक अवसर भी है—राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए आत्ममंथन का अवसर। खास तौर पर कांग्रेस और उसके नेताओं के लिए। क्या इतिहास की पीड़ाओं को ध्यान में रखते हुए भाषा अधिक जिम्मेदार हो सकती है ? क्या राजनीतिक आलोचना को वैचारिक धरातल पर सीमित रखा जा सकता है ? क्या समुदायों के साथ संवाद केवल चुनावी राजनीति तक सीमित न रहकर संवेदनशीलता और सम्मान पर आधारित हो सकता है ?
सिख समुदाय भारतीय समाज का एक जीवंत, सक्रिय और राष्ट्रनिर्माण में अग्रणी हिस्सा रहा है। उसके ऐतिहासिक अनुभवों का सम्मान करना केवल उस समुदाय के प्रति संवेदनशीलता नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का भी संकेत है। इसी तरह, किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने अतीत के कठिन अध्यायों से सीखते हुए वर्तमान में ऐसी भाषा और आचरण अपनाए, जो विश्वास की डोर को मजबूत करे, न कि उसे फिर कमजोर कर दे।
राहुल गांधी और रवनीत सिंह बिट्टू के बीच हुई तीखी नोकझोंक शायद समय के साथ राजनीतिक समाचारों की भीड़ में एक घटना बनकर रह जाए, पर उसने जो प्रश्न उठाए हैं—वे कहीं अधिक गहरे हैं। वे प्रश्न हैं स्मृति और राजनीति के संबंध के, पहचान और बयानबाज़ी के संतुलन के, और उस जिम्मेदारी के जो सार्वजनिक जीवन में शब्दों के साथ जुड़ी होती है। भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह इन प्रश्नों से बचने के बजाय उनका सामना करे।
ये पंजाबी सरदार का हाथ है, गांधी परिवार के वारिस से मेरा हाथ नहीं मिलेगा : रवनीत सिंह बिट्टू
इस पूरे प्रकरण के बाद रवनीत सिंह बिट्टू से जब बात हुई तो उन्होंने कहा कि जब वे कांग्रेस में भी थे तो राहुल गांधी को यही लगता था कि वो सबसे बड़े देश भक्त हैं। वे अपने पिता की शहादत का बखान करते नहीं थकते थे लेकिन जब उन्हें साथ में मेरे दादा शहीद-ए-आजम स. बेअंत सिंह जी की शहादत का भी जिक्र करना पड़ता था तो वो बात उन्हें नागवारा गुजरती थी। बिट्टू ने कहा कि मैंने उन्हें कहा भी था कि मेरे दादा जी स. बेअंत सिंह, जो आपने आग लगाई थी, पंजाब में जो आग लगाई थी वो कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार ने लगाई थी। उन्होंने कहा कि हमारे सबसे पवित्र गुरूद्वारा श्री दरबार साहिब पर हमला किया गया, टैंक व तोपों के साथ हुए इस हमले में हमारे सबसे पवित्र श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी के अंगों में गोली लगी। श्री अकाल तख्त साहिब को ढह-ढेरी कर दिया। हजारों सिखों और पंजाबियों को इन्होंने निशाना बना-बना कर उनका कत्लेआम किया, किसने किया, गांधी परिवार ने किया, कांग्रेस ने किया। बिट्टू ने कहा कि इनको तकलीफ है कि अगर राजीव गांधी का नाम शहीद लेना पड़ता है शहीद-ए-आजम स. बेअंत सिंह का नाम भी लेना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यदि मैं कांग्रेस में था तो ठीक था अब अगर भाजपा में हूं तो मुझे इन शब्दों से संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मैं गांधी परिवार से नहीं हूं और यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मेरे सिर पर पगड़ी है। ये लोग (गांधी परिवार) देश के गद्दार हैं, जो रोज देश और फौज के खिलाफ बातें करते हैं। बिट्टू ने कहा कि जब राहुल गांधी ने उनकी तरफ हाथ मिलाने को हाथ बढ़ाया था तो मैंने तब भी यही कहा था कि ये पंजाबी सरदार का हाथ, गांधी परिवार के वारिस के साथ मेरा हाथ नहीं मिलेगा जिसके परिवार के हाथ सिख कौम के खून से रंगे हुए हैं।
सिख कौम के लिए ट्रेटर शब्द इस्तेमाल करने वाले राहुल गांधी की बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता : हरदीप सिंह पुरी
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस पूरे मामले पर बहुत ही सख्त लहजे में बोलते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी कई दिनों से सदन में हंगामा खड़ा करके जहां सदन को प्रभावित करने में लगी हुई है वहीं बुधवार को उन्होंने सभी हदें ही पार कर दीं। उन्होंने कहा कि संसद भवन के बाहर कांग्रेसी नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में धरने पर बैठे थे तो वहां से निकल रहे हमारे मंत्रीमंडल के सिख सदस्य साथी रवनीत सिंह बिट्टू के लिए ट्रेटर शब्द का इस्तेमाल करने लगे। राहुल गांधी यहीं नहीं रूके, उन्होंने ट्रेटर भी कहा और यह भी कहा कि तुम वापिस आओगे। बताईए, एक तरफ ट्रेटर और दूसरी तरफ वापसी की बातें, कैसे संभव है। पुरी ने कहा कि ट्रेटर का हिंदी अनुवाद करने व बोलने में चाहे उसे गद्दार कह लिया जाए लेकिन ट्रेटर का सही मतलब होता कि जिसने देश के सीक्रेट्स बेचे हों या देश को बेचा हो इसलिए इस शब्द को हल्के में नहीं लिया जा सकता और ना ही इसे साधारण लहजे अथवा हलके में लेना ही चाहिए। उन्होंने कहा कि जैसे ही मुझे यह सब पता चला तो मैंने एक पोस्ट डाली जो कुछ ही समय में हजारों लोगों ने देखी जिससे लोगों की भावनाएं समझ में आती हैं। उन्होंने कहा कि यह सिख समुदाय के लिए बहुत ही गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है। रवनीत सिंह बिट्टू सिर्फ एक सिख सांसद या मंत्री नहीं हैं बल्कि बिट्टू वो शख्स हैं जिनके खुद के दादा बेअंत सिंह जी ने पंजाब की एकता व अखंडता के लिए मुख्यमंत्री रहते हुए शहादत दी है और कांग्रेस ऐसे सिखों के बारे में यह सोच रखती है। उन्होंने कहा कि हम सिख श्री गुरू तेग बहादर जी का 350वां शहीदी दिवस मना रहे हैं, हमारे सिखों के गुरूओं ने, हमारे साहिबजादों ने शहादत दी है, देश के लिए मर मिटने का जज्बा रखने वाली कौम हैं हम, सिख समाज का अर्थ है समानता, एक पिता एकस के हम बारिक, एक साथ लंगर, सिखों का इतिहास पढ़िए सिखों का तो कोई भी देन नहीं दे सकता। उन्होंने कहा कि श्री दरबार साहिब पर हमला किस ने किया ये तो बताने की जरूरत नहीं, 1984 में सिख कत्लेआम, कांग्रेस की वही मानसिकता बार बार सामने आ रही है। सिखों की संख्या दो फीसदी से भी कम है लेकिन देश की सुरक्षा में देखिए 25 फीसदी हमारा सिखों का योगदान है। यह गंभीर विषय है, लेकिन राहुल गांधी अब यह नहीं कह सकते कि उनसे भाषा में गलती हुई है क्योंकि अंग्रेजी में बोला है उन्होंने ट्रेटर। किसी भी समाज के लिए ट्रेटर बोला जाना बहुत ही निंदनीय है लेकिन जब यह शब्द बोला उस शख्स द्वारा जाए जो उस परिवार से आता हो जिसने सिखों का कत्लेआम किया है, जो रही सिखों की विरोधी हो, तो फिर गलती माफी के योग्य नहीं होनी चाहिए। यह गंभीर मामला है और इसे गंभीरता से ही लेना चाहिए।
राहुल गांधी ने डा. मनमोहन सिंह को नहीं बख्शा था, ये तो फिर रवनीत सिंह बिट्टू हैं, सिखों का गाली देना गांधी परिवार की आदत है : अरविंदर सिंह लवली
अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि राहुल गांधी की ओर से हमारे रवनीत सिंह बिट्टू के लिए जो शब्द इस्तेमाल किए गए हैं उसे लेकर समूचे सिख समाज में काफी रोष है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि जिस व्यक्ति के दादा जी ने इस देश की एकता व अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए हों, वो व्यक्ति राहुल गांधी को देशद्रोही दिखाई दे रहा है औरजो देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात करने की बात करने वाले आपकी आंख के तारे हैं। समस्या ये है कि जो परिवार अपने आप को अभी भी इस देश का मालिक समझता है, शहनशाह समझता है वो उस सिख विरोधी सोच और मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहा है। उनको लगता है कि जो उनके हिसाब से चलेगा वो ठीक है और जो उनका विरोध करेगा वो देशद्रोही है, राहुल गांधी इस मानसिकता से बाहर नहीं आ रहे। लवली ने कहा कि मेरे से ज्यादा गांधी परिवार को कोई नहीं जानता होगा और वो सिखों को गाली गलौच करने के आदी हैं, उनकी आदत है सिखों को गाली गलौच करने की और वो सिखों को गालियां देने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते। यह कोई पहला मौका नहीं है, डा. मनमोहन सिंह जी बहुत ही काबिल शख्सियत थे, वो कमजोर प्रधानमंत्री हैं, ये बात किसने स्थापित की थी देश में, एक आम सांसद होने के नाते डा. मनमोहन सिंह का सम्मान करने की बजाए उन्हें कमजोर प्रधानमंत्री साबित किया, तो ये तो फिर बिट्टू ही हैं। राहुल गांधी ने तो डा. मनमोहन सिंह को नहीं बख्शा था। कांग्रेस में रहने वाले सिखों को बुरा लगा, देश के लोगों को बुरा लगा लेकिन राहुल गांधी को बुरा नहीं लगा। लवली ने कहा कि पहले तो लोग ये कह रहे थे कि ये व्यक्ति राजनीति के लायक नहीं है अब तो लोग ये कहेंगे कि ये सांसद रहने के भी लायक नहीं है।
सिख सरदार और राहुल गांधी गद्दार : मनजिंदर सिंह सिरसा
दिल्ली के कैबिनेट मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने इस पूरे मामले पर बातचीत करते हुए कहा कि केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू जो हमारे सिख मंत्री हैं के बारे में ऐसे शब्द बोलने वालों की मैं कड़े शब्दों में निंदा करता हूं और ऐसी घटिया मानसिकता जिस मानसिकता के चलते ये सिखों को कभी तो आतंकी बताते हैं, कभी सिखों को देश को बांटने वाला बताते रहे हैं, ये गांधी परिवार की पुरानी मानसिकता है। सिरसा ने कहा कि देश का सिख, सरदार है और देश को बांटने व तोड़ने वाला राहुल गांधी का परिवार है। सिख सरदार और राहुल गांधी गद्दार, सही मायनों में ये है। जिस परिवार ने देश की सबसे मार्शल कौम के साथ गद्दारी की, श्री दरबार साहिब पर टैंकों-तोपों के साथ हमला किया, जिन्होंने देश के साथ खड़े होने वाले सिख जो आज भी देश की सरहदों पर देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं ऐसे सिखों के गलों में टायर डालकर जलाने का काम किया, जो सिख आर्मी में रहकर पाकिस्तान को हराने का काम किया उन सिखों का जलाने का काम गांधी परिवार ने किया। हमें बहुत खेद है कि, हमें लगता था कि कम से कम 40 साल बाद इनकी मानसिकता में कोई सुधार हुआ होगा लेकिन आज भी इनकी मानसिकता वही है, उसी मानसिकता के साथ ये लोग रह रहे हैं। सिरसा ने कहा कि ये वो पापी परिवार है जिन्होंने अखबारों में इश्तिहार दिया था और सिख टेक्सी ड्राइवर की फोटो लगाकर लिखा था कि क्या तुम्हें इनसे डर लगता है , ये वो परिवार है जिन्होंने सिखों को आतंकी साबित करने के लिए अखबारों में विज्ञापन दिए थे, विदेशों की एंबेसियों में विज्ञापन लगाए कि सिख आतंकी हैं। ये वही राहुल गांधी हैं जो कहते थे कि जब मेरी दादी मरी थी मुझे बहुत गुस्सा आया था, मेरा दिल कर रहा था कि मैं कुछ करूं और आज भी वही मानसिकता राहुल गांधी की झलक रही है। यह शब्द सिर्फ रवनीत सिंह बिट्टू तक सीमित नहीं हैं, यह पूरी सिख कौम के लिए हैं औऱ पूरी दुनिया यह देख रही है कि गांधी परिवार आज भी सिखों के लिए अपने मन में जहर लिए बैठा है। सिरसा ने स्पीकर लोकसभा से इस मामले का संज्ञान लेकर कार्रवाई की मांग की है।
गांधी परिवार और कांग्रेस अपनी सिख विरोधी मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रही : आर.पी सिंह
भाजपा के प्रवक्ता आर.पी सिंह ने इस सारे मामले की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा कि गांधी परिवार और कांग्रेस अपनी सिख विरोधी मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रही है। उन्होंने कहा कि रवनीत सिंह बिट्टू के लिए जो शब्द राहुल गांधी द्वारा बोले गए हैं उन्हें किसी भी कीमत पर बर्दाशत नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी अपनी राजाशाही से बाहर नहीं आ रहे और चापलूसों की घेराबंदी में उन्हें पता नहीं चलता कि वो क्या कह रहे हैं, क्या बोल रहे हैं और क्या कर रहे हैं लेकिन इस मामले में राहुल गांधी ने जो भी किया या बोला है वो उनकी सोची समझी मानसिकता है और सिखों के प्रति नफरत का इजहार उन्होंने ये शब्द बोलकर किया है। उन्होंने कहा कि सिख कौम राहुल गांधी को इस सब के लिए कभी भी माफ नहीं करेगी, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्त आर.पी सिंह ने कांग्रेस की सख्त शब्दों में निंदा करते हुए कहा कि कांग्रेस आज भी सिखों से नफरत करती है और यह सारा प्रकरण बिट्टू से ज्यादा सिखों को गद्दार कहने का था।

















