किसी भी इस्लामिक कट्टरपंथी मुल्क में अल्पसंख्यकों की स्थिति क्या होती है, वह भारत का ही अंग रहे पाकिस्तान और बांग्लादेश में गैर मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को देखकर समझा जा सकता है। हाँ, वह बात दूसरी है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान में गैर मुस्लिम लड़कियों के साथ जो कुछ भी होता है, वह सामने या तो नहीं आ पाता है या फिर आता भी है तो उसका विमर्श नहीं बन पाता है।
क्या हैं कॉप्टिक क्रिश्चियन
ऐसा ही अन्य देशों में भी होता है। वहाँ के भी अल्पसंख्यक इसी प्रकार शिकार होते हैं। परंतु उनकी भी पीड़ा सामने नहीं आ पाती है। ऐसा ही एक देश है, मिस्र। वहाँ के भी ईसाई इस समय अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। वहाँ के ईसाई समुदाय को कॉप्टिक क्रिश्चियन कहा जाता है। वहाँ पर इस समुदाय की आबादी 6% से 10% तक बताई जाती है। इसके अतिरिक्त शेष आबादी सुन्नी मुस्लिम है। वहाँ पर क्रिश्चियन समुदाय को लगातार भेदभाव का सामना करना पड़ता है और लड़कियों का अपहरण और जबरन निकाह उसी प्रकार होता है, जैसा पाकिस्तान और बांग्लादेश में रोज ही होते देख रहे हैं।
ताजा मामला है एक 17 वर्षीय कॉप्टिक क्रिश्चियन लड़की सिल्वना आतेफ का, जिसका अपहरण और जबरन मतांतरण करवा दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिलवना एतेफ की मानसिक उम्र मात्र 8 वर्ष है। अर्थात वह मानसिक रूप से मात्र 8 वर्ष की बच्ची है। उसका मानसिक विकास नहीं हुआ है। उसके जो भी वीडियो वायरल हैं, उनमें साफ दिख रहा है कि वह छोटे बच्चों के साथ खेल रही है।
अपहरण और शादी के लिए इस्लाम कबूल करवाया
परंतु दिसंबर 2025 में उसका अपहरण एक मुस्लिम आदमी सहेर मोहम्मद रगब ने कर लिया था, जिसके अब्बा एक पुलिस अधिकारी हैं। जब परिवार ने उसके अपहरण की पुलिस रिपोर्ट लिखवाई तो उन्हें बताया गया कि सिलवना ने सहेर से शादी करने के लिए इस्लाम कुबूल कर लिया है। परिवार का कहना है कि वह इस घटना से पहले उसे जानती तक नहीं थी और उसकी मानसिक अवस्था को देखते हुए मिस्र के कानून के अनुसार उसे बच्चा माना जाएगा, फिर भी पुलिस परिवार को उनकी बेटी वापस नहीं दे रही है।
बाहर से सहायता मांग रहे क्रिश्चियन संगठन
परिवार अब सरकार से गुहार लगा रहा है, और क्रिश्चियन संगठन बाहर से सहायता मांग रहे हैं कि सिलवना की मदद की जाए, क्योंकि उसकी मानसिक उम्र बहुत कम है और पुलिस उसके परिवार की बात नहीं सुन रही है। परंतु ऐसा बहुत कठिन है कि उनकी बात सुनी जाए, क्योंकि सोशल मीडिया पर जब और खंगाला तो पता चला कि कॉप्टिक क्रिश्चियन लड़कियों के जबरन निकाह के कई मामले खबरों में आए, परंतु चर्चा में नहीं आए। टीवी होस्ट और लेखक ब्रदर रचिद ने एक्स पर पोस्ट लिखा कि कैसे यह मिस्र का मौन खतरा है। उन्होनें लिखा कि मिस्र में कई कॉप्टिक क्रिश्चियन परिवार अपनी बेटियों को लेकर लगातार ही डर के साए में रह रही हैं। जब भी कोई क्रिश्चियन लड़की किसी मुस्लिम लड़के के साथ प्यार में पड़ती है, तो वह या तो भाग सकती है या फिर लड़के का परिवार उसे उठवा सकता है। फिर उस पर इस्लाम में याने का दबाव डाला जाता है और जैसे ही यह हो जाता है, वैसे ही उसकी वापसी उसके परिवार में असंभव हो जाती है, क्योंकि वह आधिकारिक रूप से मुसलमान हो चुकी है।
फिर वह लिखते हैं कि सलाफ़ी और दवाह कार्यकर्ता लगातार क्रिश्चियन परिवारों को उनकी बेटियों के माध्यम से संपर्क करते रहते है। लड़कियों को भावनात्मक रूप से लुभाया जाता है, उन्हें एक बेहतर जीवन का लालच दिया जाता है और फिर मतांतरित होने का दबाव डाला जाता है और फिर जैसे ही वे मतांतरित हो जाती हैं, तो फिर सोशल मीडिया पर घोषणा कर दी जाती है, फिर चाहे वाल लड़की नाबालिग ही क्यों न हों! इस समय लड़की की वापसी लगभग असंभव हो जाती है। इसके बाद अल अज़हर इंस्टीट्यूट मतांतरित होने का प्रमाणपत्र जारी कर देता है और लड़की के मुस्लिम होने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। और यह केवल क्रिश्चियन लड़कियों के ही लिए हैं। लड़कों को मुस्लिम लड़कियों से शादी करने की अनुमति नहीं है, परंतु मुस्लिम लड़के क्रिश्चियन लड़कियों से शादी कर सकती है।
दो वर्ष पहले डॉक्टर मालौफ ने भी ऐसी तमाम लड़कियों के विषय में लिखा था। उन्होंने लिखा था कि हर साल सैकड़ों कॉप्टिक क्रिश्चियन लड़कियां और महिलाएं मिस्र में जबरन मतांतरण और निकाह का शिकार होती हैं। परंतु उनके लिए एक भी आंदोलन नहीं होते हैं।
Every year, hundreds of Coptic Christian girls and women are kidnapped in Egypt and forced to convert to Islam.
Not a single protest for them! pic.twitter.com/XEsYyF2bjr
— Dr. Maalouf (@realMaalouf) August 2, 2024
इन्होनें ही 4 नवंबर 2024 को पोस्ट करते हुए जूलिया नामक लड़की के विषय में बताया था, जिसका अपहरण दिन दहाड़े इस्लामिस्टों ने कर लिया था, और उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट और सहायता के लिए तमाम आवाजों के बाद भी अधिकारियों ने उसे खोजने के लिए कुछ नहीं किया था। क्रिश्चियन आदमियों की हत्याएं भी लगातार होती रहती हैं, परंतु अपराध के इस रूप पर चर्चा ही नहीं होती है। कई वीडियो सोशल मीडिया पर हैं, जिनमें अपहृत हुई क्रिश्चियन लड़कियों की रिहाई के लिए विरोध प्रदर्शन है, कैन्डल मार्च हैं, परंतु लड़कियां नहीं मिलीं।
पाकिस्तान में भी लगातार हिन्दू लड़कियों का अपहरण और जबरन मतांतरण आम है, वहाँ भी विरोध प्रदर्शन होते हैं, मगर लड़कियां नहीं मिलती हैं। और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि पाकिस्तान से लेकर मिस्र तक लड़कियों की इस पीड़ा पर न ही कोई आवाज उठती है और न ही वह विमर्श में आ पाता है कि आखिर ये लड़कियां हैं कहाँ? कैसी हैं? उनकी ज़िदगी में आखिर क्या हुआ है?

















