भारत सरकार ने चिकन नेक (चिकन की गर्दन) कहे जाने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर को और मजबूत बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। यह कॉरिडोर उत्तर-पूर्वी राज्यों को बाकी भारत से जोड़ने वाली एक पतली-सी जमीन है, जो बेहद संवेदनशील मानी जाती है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोमवार को बताया कि इस इलाके में लगभग 40 किलोमीटर लंबे रेल कॉरिडोर को अंडरग्राउंड (जमीन के नीचे) बनाने की योजना है।
चिकन नेक क्यों है इतना अहम?
सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे लोग प्यार से या चिंता से चिकन नेक कहते हैं, पश्चिम बंगाल में सिलीगुड़ी के आसपास का एक संकरा इलाका है। इसकी सबसे पतली जगह पर चौड़ाई सिर्फ 20-25 किलोमीटर के आसपास है। एक तरफ नेपाल, दूसरी तरफ भूटान और तीसरी तरफ बांग्लादेश– ऐसे में यह कॉरिडोर उत्तर-पूर्व (असम, अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम) को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। अगर यहां कोई दिक्कत हुई तो पूरे उत्तर-पूर्व का संपर्क टूट सकता है– रसद, सामान, सेना की आवाजाही सब प्रभावित हो सकती है।
साल 2017 में डोकलाम स्टैंडऑफ के समय भी सेना के प्लानर्स ने इसकी कमजोरी की बात की थी। कोई भी छोटी-सी बाधा यहां डाल दी जाए तो उत्तर-पूर्व अलग-थलग पड़ सकता है।
खतरे की वजह से अंडरग्राउंड प्लान
हाल में बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों ने खुलेआम धमकियां दी हैं कि वे चिकन नेक को चोक (गला घोंट) कर उत्तर-पूर्व को काट सकते हैं। कुछ लोग तो उत्तर-पूर्व को ग्रेटर बांग्लादेश का हिस्सा बताते हैं। बांग्लादेश की तरफ से चीन के साथ करीबी बढ़ने की भी बातें हैं, जैसे तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की दिलचस्पी। ये सब मिलकर भारत के लिए चिंता की बात बन गई हैं।
इसीलिए सरकार ने फैसला किया है कि रेल लाइन को जमीन के नीचे ले जाया जाए। इससे अगर कोई बाहरी या आंतरिक खतरा आए, हमला हो या कोई और समस्या, तब भी रेल चलती रहेगी। एक अधिकारी ने कहा, “ट्रैक्स को अंडरग्राउंड करना संकट के समय भी कनेक्टिविटी बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।”
कहां-कहां बनेगा और क्या होगा?
नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे के जनरल मैनेजर चेतन श्रीवास्तव ने बताया कि अंडरग्राउंड हिस्सा टिन माइल हाट से रंगापानी स्टेशन तक बनेगा, जो पश्चिम बंगाल में ही है। यह करीब 40 किमी का स्ट्रेच होगा। साथ ही, मौजूदा रेल लिंक को चार ट्रैक वाला बनाने का प्रस्ताव भी बजट में है। यह उत्तर-पूर्व और बाकी देश के बीच लंबे समय से महसूस की जा रही जरूरत है। यह प्लान सिर्फ रेल की क्षमता बढ़ाने का नहीं है, बल्कि सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया गया है। कॉरिडोर की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इसे मजबूत बनाना जरूरी हो गया है, खासकर पड़ोसी देशों से आने वाले संकेतों को देखते हुए।

















