राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और पंजाब पुलिस द्वारा सख्ती किए जाने के बाद अब खालिस्तानी तत्व ‘न्यूनतम जोखिम अधिकतम प्रभाव’ (लो रिस्क, हाई इम्पैक्ट) की नीति पर चलते दिख रहे हैं और गैंगस्टरों के सहारे फिर सक्रियता बढ़ाने के प्रयास में हैं। गत दिनों 26 जनवरी को अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर के विरासती गलियारे में खालिस्तान समर्थक रैली निकालने से यह संकेत मिला है कि खालिस्तानी तत्व कम रिस्क में अधिक प्रचार की नीति पर चलने लगे हैं। खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, विदेश से संचालित ये आतंकी नेटवर्क अब पंजाब में छोटे-छोटे हमले व वारदातों को अंजाम दे माहौल टटोल रहे हैं, ताकि बिना ज्यादा खर्च और जोखिम के दोबारा जमीन तैयार की जा सके।
छोटी घटनाओं को हल्के में लेना घातक होगा
खुफिया एजेंसियों को चेतावनी बेहद स्पष्ट है इन छोटी घटनाओं को हल्के में लेना भारी भूल साबित हो सकती है। ये सिर्फ छोटी वारदातें नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा हैं। इसका मकसद पंजाब में फिर अस्थिरता पैदा करना है। सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर हैं और उनकी कोशिश भी इस नेटवर्क को पनपने से पहले ही कुचल देना है, ताकि यह किसी बड़े खतरे में न बदल सके।
विदेशों में भी बेनकाब होने लगे खालिस्तानी
भारत ने कनाडा और यूके समेत कई देशों को खालिस्तानी नेटवर्क के खिलाफ ठोस सुबूत सौंपे हैं। लंबे समय तक इन देशों में ऐसे संगठनों के खिलाफ राजनीतिक स्तर पर नरमी रही, लेकिन अब वहां की एजेंसियां भी मानने लगी हैं कि खालिस्तानी संगठन फ्री स्पीच की आड़ में कट्टरपंथ और हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। यही वजह है कि अब विदेश में इन पर शिकंजा कसना शुरू हो गया है, जिससे फंडिंग और प्रचार दोनों कमजोर पड़े हैं।
सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार
खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, खालिस्तानी तत्व पहले इन छोटी-मोटी घटनाओं से खुद को अलग बताएंगे हैं, हैं लेकिन बाद में इन्हें इंटरनेट मीडिया और विदेश में बैठे समर्थकों के जरिए बड़ा मुद्दा बना सकते हैं। इसके जरिए यह परखा जाता है कि पंजाब में कितना समर्थन मिल सकता है। अगर थोड़ी भी सहानुभूति दिखती है तो उसी इलाके को अगला टारगेट बनाया जाता है।
सख्ती से खालिस्तानी नेटवर्क को पहुंचा भारी नुकसान
एनआइए और पंजाब पुलिस की लगातार सख्ती के चलते खालिस्तानी नेटवर्क को भारी नुक्सान पहुंचा है। कई माड्यूला ध्वस्त हो चुके हैं और दर्जनों लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। यही वजह है कि अब ये संगठन सी टकराव से बच रहे हैं और छिपे हुए तरीकों से माहौल बिगाडऩे व कोशिश कर रहे हैं।
पिछली पीढ़ी भी बनी दीवार
सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि 80-90 के दशक की हिंसा को देख चुकी पीढ़ी आज सबसे ब दीवार बनी हुई है, जो युवाओं इस रास्ते से दूर रखने की कोशिश कर रही है। इसी कारण कामयाब नहीं हो पा रहे।
विदेशी फंड को आरामपरस्ती में उड़ा रहे बड़े आतंकी
विदेशों से आ रही रिपोर्ट के अनुसार, विदेश में बैठे खालिस्तान समर्थक नेताओं की हालत भी कमजोर हो चुकी है। फंड की भारी कमी, आंतरिक भ्रष्टाचार और आइएसआई के दवाब ने इनके नेटवर्क को अंदर से खोखला कर दिया है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार, आइएसआइ ने ड्रग्स हथियार और अवैध नेटवर्क के जरिए कुछ पैसा जरूर भेजा, लेकिन वह भी बड़े आतंकियों के निजी खर्च में ही खत्म हो गया। आंदोलन के नाम पर जुटाया गया पैसा असल में आरामपरस्ती पर उड़ाया जा रहा है। गुरपतवंत सिंह पन्नू जैसे चेहरे केवल आनलाइन बयानबाजी और धमकियों तक सीमित रह गए है। जमीनी स्तर पर उनका कोई प्रभाव नहीं है, लेकिन इंटरनेट मीडिया के जरिए युवाओं को गुमराह करने की कोशिश लगातार जारी है।

















