बांग्लादेश : चुनाव निकट, परंतु महिलाएं और अल्पसंख्यक कहाँ.?
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बांग्लादेश : चुनाव निकट, परंतु महिलाएं और अल्पसंख्यक कहाँ.?

शेख हसीना के बाद बांग्लादेश चुनावों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य क्यों? कट्टरपंथ, राजनीति और महिला अधिकारों पर बड़ा सवाल।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jan 28, 2026, 03:38 pm IST
in विश्व

भारत के पड़ोसी या कहें एक समय में भारत का ही अंग रहे बांग्लादेश में अब चुनावों का समय निकट आ रहा है और चुनाव जीतने के लिए वहाँ पर हर पार्टी अपना जोर लगा रही है। यह दुर्भाग्य है कि चुनाव इस समय वहाँ पर अवामी लीग के बिना हो रहे हैं। अवामी लीग को प्रतिबंधित कर दिया गया है, उसके नेताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है या फिर उनके विरुद्ध हिंसा हो रही है। इसके साथ ही हिंदुओं के साथ ही लगातार हिंसा हो रही है।

आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में महिलाएं

परंतु जो सबसे उपेक्षित क्षेत्र है, वह है महिला! हम सभी ने शेख हसीना को अपदस्थ करने वाली तस्वीरें लगातार देखी थीं। हमने यह भी देखा था कि कैसे छात्राएं और महिला प्रोफेसर्स शेख हसीना के खिलाफ चले आंदोलन में सड़कों पर थीं। उन्होनें न दिन देखा न रात, बल्कि वे लगातार कथित फासीवादी सरकार के खिलाफ आवाज उठाती रहीं। महिलाओं ने शेख हसीना के खिलाफ बिगुल बजाया और जब शेख हसीना के घर पर कथित छात्रों ने हमला किया था, तो उसमें ये महिलाएं भी शामिल थीं।

सत्ता परिवर्तन के बाद महिलाओं की अनुपस्थिति

कहा जा सकता है कि महिलाओं ने कंधे से कंधा मिलाकर शेख हसीना के खिलाफ लड़ाई लड़ी और सफलता भी हासिल की। परंतु अब जब चुनाव होने वाले हैं, चुनाव सिर पर हैं, तो बांग्लादेश में चुनावी राजनीति में महिलाएं कहाँ हैं? खालिदा जिया का निधन हो चुका है और शेख हसीना निष्कासित हैं। ऐसे में तमाम ताकतें केवल कट्टरपंथी ताकतों के ही हाथों में हैं। तो क्या उनमें महिलाएं हैं?

इतिहास में महिलाओं की भूमिका

बांग्लादेश में महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता किसी से छिपी हुई नहीं है। बांग्लादेश जब पूर्वी पाकिस्तान था और जब भाषाई भेदभाव के आधार पर बांग्लादेश का निर्माण हुआ तो उसमें भी महिलाओं की भूमिका थी। निशाना भी पाकिस्तानी सेना का महिलाएं ही बनी थीं। हजारों महिलाओं के साथ पाकिस्तानी सेना और रजाकारों ने बलात्कार किया था, परंतु महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी थी और सामना किया था।

लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का सवाल

और उसके बाद बांग्लादेश की राजनीति में महिलाओं की सक्रिय भूमिका भी रही, परंतु अब जब कथित फासीवादी शेख हसीना जा चुकी हैं, तो उसके बाद होने वाले चुनावों में महिलाओं की क्या स्थिति है? क्या कथित लोकतान्त्रिक दलों में महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिल रहा है?

महिला आरक्षण नियमों का उल्लंघन

बांग्लादेश में महिलाओं के राजनीति में प्रतिनिधित्व को लेकर यह नियम है कि हर दल को कम से कम 5% महिलाओं को अवसर देना चाहिए। और यह बढ़ते-बढ़ते 33% तक होना चाहिए। परंतु इस अधिनियम का पूरी तरह से उल्लंघन हो रहा है, क्योंकि चुनावों में उम्मीदवारों की सूची में संशोधन के बाद 1981 उम्मीदवारों में से केवल 76 ही महिलाएं थीं, और इस प्रकार वे केवल और केवल 3.84% हैं।

कथित उदार दलों से सवाल

ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या कथित फासीवादी और महिला, छात्र विरोधी शेख हसीना के जाने के बाद जो कथित लिबरल और उदार राजनीतिक दल चुनावों में नसीब आजमा रहे हैं, उन्होनें अपनी पार्टी में महिलाओं को टिकट क्यों नहीं दिए हैं? जब महिलाओं ने कथित क्रांति में बराबर साथ दिया तो अब राजनीति में उनके प्रवेश को लेकर वे लोग सहज क्यों नहीं हैं?

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की नाराज़गी

बांग्लादेशी मानवाधिकार कार्यकर्ता और मानुषेर जोनों फाउंडेशन की कार्यकारी निदेशक शाहीन अनम ने इस विषय में अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए एएनआई के एक वीडियो में कहा कि वे यह देखकर बहुत निराश हैं, कि कैसे महिलाओं के साथ राजनीतिक पार्टियां व्यवहार कर रही हैं।

राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं की उपेक्षा

उन्होनें कहा कि इस बात पर सहमति जताई गई थी कि कम से काम 5% सीटें महिलाओं को दी जाएंगी, मगर ऐसा हुआ नहीं है। बीएनपी ने दस सीटें दी हैं, जमात ने एक भी नहीं दी है, भेदभाव को समाप्त करने का दावा करने वाली एनसीपी ने केवल तीन सीटों पर ही महिला उम्मीदवार दी हैं। उन्होनें प्रश्न किया कि जब वे महिलाओं को सीटें ही नहीं दे रहे हैं, तो फिर वे वोट क्यों मांग रहे हैं?

अल्पसंख्यकों के साथ भी वही स्थिति

अल्पसंख्यकों को टिकट न दिए जाने पर भी उन्होनें कहा कि जिस प्रकार से महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं है, वैसे ही अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा है। केवल बातें की जा रही हैं। कि बांग्लादेश में सभी को समान अधिकार हैं, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों समान हैं। मगर जब चुनावों में टिकट देने की बात होती है या फिर उनका प्रतिनिधित्व होना चाहिए, ऐसी बात होती है, उस समय कुछ नहीं होता। दोनों को ही निराशा होती है।

लगातार व्यक्त की जा रही निराशा

शाहीन अनम ने वही निराशा व्यक्त की है, जो समय-समय पर अन्य महिलाओं ने बांग्लादेश में महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय पर बात करते हुए की है।

महिला उम्मीदवारों का विवरण

eurasiareview.com के अनुसार “नौ महिला उम्मीदवार बांग्लादेश समाजतांत्रिक दल-मार्क्सवादी से हैं, 6-6 उम्मीदवार जातीय समाजतांत्रिक दल (JSD) और इंसानियत बिप्लब बांग्लादेश से हैं, 5-5 उम्मीदवार गणसंहति आंदोलन और जातीय पार्टी से हैं, और 3-3 उम्मीदवार गणअधिकार परिषद (GOP) से हैं। बिप्लोबी वर्कर्स पार्टी ने दो महिला उम्मीदवारों को नॉमिनेट किया; और निम्नलिखित पार्टियों ने एक-एक महिला उम्मीदवार को नॉमिनेट किया है – बांग्लादेश मुस्लिम लीग, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ बांग्लादेश (CPB), बांग्लादेश सुप्रीम पार्टी (BSP), बांग्लादेश समाजतांत्रिक दल-बासोसद, बांग्लादेश रिपब्लिकन पार्टी, नेशनल पीपल्स पार्टी (NPP), आमजनता दल, इस्लामी फ्रंट बांग्लादेश, और बांग्लादेश लेबर पार्टी।

आधी आबादी, शून्य प्रतिनिधित्व

बांग्लादेश में महिलाएं लगभग आधी आबादी हैं, परंतु उनका प्रतिनिधित्व राजनीति में अब शून्य होने जा रहा है। महिलाओं पर लगातार हिंसा भी बढ़ी है। महिला कार्यकर्ताओं का कहना है कि बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथी समूह महिलाओं की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं और वे समाज में उनकी प्रतिभागिता को भी सीमित करना चाहते हैं।

भारत के महिला विमर्श की चुप्पी

प्रश्न यह भी उठता है कि कथित उदारवादी और सेक्युलर मोहम्मद यूनुस के शासनकाल में लगातार महिलाओं के साथ हिंसा हो रही है और अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी लगभग शून्य किया जा रहा है, परंतु भारत में उस वर्ग में पूरी तरह से चुप्पी है, जिसने शेख हसीना के जाने का जश्न बहुत जोरों शोरों से मनाया था।

कट्टर इस्लामिक देशों और महिला अधिकार

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि कट्टर इस्लामिक मुल्कों में महिलाओं के साथ हो रहे भेदभावों पर भारत के महिला विमर्श के ठेकेदारों में चुप्पी क्यों रहती है? अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने पर हर्ष और महिलाओं के साथ हिंसा पर चुप्पी और अब बांग्लादेश में भी? ऐसा क्यों होता है और हो रहा है? और कब इस वर्ग की चुप्पी टूटेगी?

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