फिर सामने आया रोमिला थापर का मुगल प्रेम : बाबर से औरंगजेब तक- लूट, विद्रोह और पतन का इतिहास
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फिर सामने आया रोमिला थापर का मुगल प्रेम : बाबर से औरंगजेब तक- लूट, विद्रोह और पतन का इतिहास

मुगल इतिहास, अशोक, और हिंदू अतीत को लेकर रोमिला थापर की सोच पर सवाल। क्या इतिहास चयनात्मक घृणा से लिखा गया? पढ़िए पूरा विश्लेषण

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jan 27, 2026, 04:15 pm IST
in भारत, विश्लेषण

कथित इतिहासकार रोमिला थापर का मुगल प्रेम एक बार फिर से सामने आया है। यह सर्वविदित सत्य है कि कैसे छोटे-मोटे लुटेरों को भारत का शासक बताकर अभी तक भारत की आत्मा के साथ कथित इतिहासकारों ने छल किया है और अभी तक कर रहे हैं।

बाबर से औरंगजेब तक : लूट, विद्रोह और पतन का इतिहास

बाबर भी एक लुटेरा था और औरंगजेब का पूरा जीवन तो अपने प्रति विद्रोह के साथ लड़ते हुए ही बीत गया था। बाबर भारत में टिक नहीं सका था और हुमायूँ को भी भागना पड़ा था। अकबर इसलिए टिक सका क्योंकि उसने हिन्दू शासकों के साथ मिलकर शासन किया। जहांगीर और शाहजहाँ ने भी लगभग उसी नीति का पालन किया। औरंगजेब ने जब कट्टरता को अपनाया तो उसे छत्रसाल, गोकुल जाट, छत्रपति शिवाजी, शंभा जी, तारबाई, गुरु तेगबहादुर सिंह, गुरु गोविंद सिंह, बंदा बैरागी सहित न जाने कितने वीरों का सामना करना पड़ा था।

इतिहास लेखन की विकृत अकादमिक परंपरा

भारत का इतिहास पढ़ते समय ऐसा लगता ही नहीं है कि भारत का इतिहास पढ़ा जा रहा है। अकादमिक जगत में भारत का इतिहास मौर्य वंश से आरंभ होता है और उसके बाद अकबर में आकर यह पूर्ण होता है। मौर्य वंश से पहले के इतिहास को मिथक बताकर बच्चों के मन में यही धारणा डाली जाती थी कि हिन्दू धर्म दरअसल कुछ था ही नहीं, जो भी इतिहास है वह मौर्यकाल से आरंभ होता है। और मौर्यकाल अर्थात बौद्ध! अशोक को हिन्दू धर्म में रहते हुए रक्तपात करने वाला बताया जाता है और बाद में इस रक्तपात अर्थात हिन्दू धर्म से मोह भंग।

अशोक, बौद्ध धर्म और ऐतिहासिक तथ्य

जबकि सच्चाई कुछ अलग ही है। और यह सच्चाई रोमिला थापर भी लिख चुकी हैं कि अशोक कलिंग के युद्ध से पहले से ही बौद्ध मत का अनुयायी हो चुके थे। बात बौद्ध या हिन्दू धर्म की नहीं बल्कि तथ्य एवं सत्य की है। कि सत्य क्या था और पढ़ाया क्या जाता रहा।

राधामुकुंद मुखर्जी का ऐतिहासिक संकेत

राधामुकुंद मुखर्जी ने भी इस ओर संकेत करते हुए लिखा था कि “अशोक कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध नहीं बने थे, बल्कि वह बौद्ध धर्म के पहले ही उपासक हो चुके थे। और कलिंग युद्ध के बाद हुई हानि के बाद वह और अधिक पालन करने लगे।“

रोमिला थापर और हिन्दू इतिहास से वैचारिक घृणा

अब बात फिर से रोमिला थापर की। हालांकि रोमिला थापर इस बात को मानती हैं कि अशोक कलिंग युद्ध से पहले ही बौद्ध मत का पालन करने लगे थे, परंतु वे इस सीमा तक हिन्दू इतिहास से घृणा करती हैं कि वे एक आयोजन में यह तक कहती हुई नजर आई थीं कि सम्राट युधिष्ठिर ने अहिंसा का सिद्धांत सम्राट अशोक से लिया था।

पाठ्यपुस्तकों से मुगल अध्याय हटाने पर आपत्ति

रोमिला थापर की हिन्दू इतिहास से घृणा अब एक बार फिर से सामने आई है जब उन्होनें पाठ्यपुस्तकों में से मुगल कुनबे को हटाने की आलोचना की है। केरल साहित्य उत्सव के नौवें संस्करण में ऑनलाइन संबोधित करते हुए उन्होनें कहा कि जिस प्रकार से पाठ्यक्रम से इतिहास की चीजों को बाहर किया जा रहा है और यह बताया जा रहा है कि उन्हें पढ़ने की आवश्यकता नहीं है, वह बकवास है। इतिहास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह लोगों और संस्कृति का विकास है।

एनसीईआरटी और दिल्ली सल्तनत पर विवाद

उन्होनें कहा कि मुगलों के अध्यायों को हटाने से इतिहास का क्रम टूटता है और उसका कोई भी अर्थ नहीं होता। दरअसल वे इस बात पर दुख व्यक्त कर रही थीं कि एनसीईआरटी ने कक्षा 7 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से दिल्ली सल्तनत और मुगलों के पाठ क्यों हटा दिए हैं।

प्राचीन भारतीय राजवंशों को स्थान मिलने पर चुप्पी

वे इस बात पर प्रसन्नता क्यों नहीं जता पा रही हैं कि इतिहास में अब प्राचीन भारतीय राजवंशों को विस्तार से स्थान प्रदान किया गया है। वे इस बात पर प्रसन्नता क्यों नहीं व्यक्त कर पा रही हैं कि इस पुस्तक में अब पवित्र भौगोलिक क्षेत्रों की बात करते हुए नदियों के संगम, पर्वतों और वनों की बात की गई है।

क्या भारत का इतिहास केवल दिल्ली सल्तनत से शुरू होता है?

प्रश्न यह उठता है कि क्या भारत का इतिहास केवल दिल्ली सल्तनत अर्थात भारत में इस्लाम के आगमन से आरंभ होता है? दिल्ली सल्तनत के विषय में जब कुतुबमीनार का इतिहास अब तक गलत पढ़ाया जा रहा था, तो रोमिला थापर ने आपत्ति क्यों नहीं व्यक्त की? यहाँ तक कि मंदिर तोड़े जाने को भी धार्मिक कारण के रूप में नहीं जोड़ा गया था।

मुगल इतिहास पढ़ाना है तो पूरा सच क्यों नहीं?

यदि रोमिला थापर चाहती हैं कि दिल्ली सल्तनत और बाबर से लेकर औरंगजेब और उसके बेटे-पोतों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए तो यह भी वे स्पष्ट करें कि उनके द्वारा तोड़े गए मंदिरों को, हिंदुओं के कत्लेआम को, भी उसी तरह से पढ़ाया जाना है या नहीं?

इतिहास के वे प्रश्न जो आज भी अनुत्तरित हैं

क्या इतिहास की पुस्तकों में यह नहीं पढ़ाया जाना चाहिए कि कुतुबमीनार का इतिहास क्या है? अजमेर में ढाई दिनों का झोंपड़ा जो है, उसकी वास्तविकता क्या है और उसके साथ ही कश्मीर से हिन्दू आखिर कैसे विस्थापित हुए, या फिर तक्षशिला और नालंदा को किसने जलाया, कैसे पाकिस्तान का जन्म हुआ, कैसे प्रभुश्रीराम के पुत्र लव के नाम पर बसा नगर आज हिंदुविहीन होकर लाहौर हो गया है और कैसे उस नगर को हिन्दू विहीन किया गया?

इतिहास की निरन्तरता या चयनात्मक घृणा?

इतिहास का अध्ययन घटनाओं की निरन्तरता है यह बात सत्य है, परंतु निरन्तरता में से केवल हिंदुओं के प्रति घृणा से भरी हुई निरन्तरता को ही जारी रखा जा सकता है।

बच्चों को क्या पढ़ाया जाना चाहिए?

जब इतिहास बच्चों को पढ़ाया जाए तो निरन्तरता रहनी चाहिए कि भारत की शिक्षा, भारत की आयुर्वेद प्रणाली, भारत की शासन व्यवस्था क्या थी? तभी तो बच्चों को समझ आ पाएगा कि इस्लाम के आक्रमण के बाद और उसके दौरान जो क्षति हुई वह कितनी थी और तभी वह समग्र अध्ययन कर पाएगा।

प्रश्न यही है कि आखिर हिंदुओं के प्रति घृणा से भरा हुआ इतिहास ही पढ़ाए जाने पर रोमिला थापर जैसों का जोर क्यों रहता है?

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