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लेफ्ट-लिबरल: चाशनी में लिपटी कुनैन की गोली

अपराध नहीं बदलता, पीड़ा नहीं बदलती, बदलती है तो केवल पीड़ित की पहचान। यही चयनात्मक न्याय है। प्रख्यात लेखिका नीरजा माधव के साथ हुई घटना इसका ताजा उदाहरण है।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Jan 22, 2026, 03:25 pm IST
inभारत
कम्युनिस्ट शब्द अप्रिय हुआ, तो वह प्रोग्रेसिव बन गया। क्रांति डराने लगी, तो वह एक्टिविज़्म बन गई। वर्ग संघर्ष पुराना पड़ा, तो वह मानवाधिकार कहलाने लगा। यहीं से एक नया आवरण बना लेफ्ट-लिबरल।

कम्युनिस्ट शब्द अप्रिय हुआ, तो वह प्रोग्रेसिव बन गया। क्रांति डराने लगी, तो वह एक्टिविज़्म बन गई। वर्ग संघर्ष पुराना पड़ा, तो वह मानवाधिकार कहलाने लगा। यहीं से एक नया आवरण बना लेफ्ट-लिबरल।

किसी भी युग में सबसे खतरनाक विचार वे नहीं होते जो खुले रूप में सामने आते हैं। सबसे खतरनाक वे होते हैं जो न्याय, समानता, करुणा और मानवाधिकार जैसे सुंदर शब्दों की आड़ लेकर आते हैं। वे इतने मधुर शब्दों में बोलते हैं कि सुनने वाला यह भूल ही जाता है कि वह विचार नहीं, बल्कि एक तयशुदा पैटर्न सुन रहा है। आज के समय में इस पैटर्न का सबसे लोकप्रिय नाम है लेफ्ट-लिबरल। यह उस वैचारिक प्रवृत्ति की बात है, जो स्वयं को नैतिकता का अंतिम मानक मानती है, पर जिसका व्यवहार बार-बार यह दिखाता है कि उसकी नैतिकता सार्वभौमिक नहीं, चयनात्मक है।

नया आवरण लेफ्ट लिबरल बना

बीसवीं सदी में वामपंथ ने दुनिया के कई हिस्सों में सत्ता पाई। आदर्श बड़े थे, समानता, न्याय, शोषण-मुक्त समाज। लेकिन परिणाम लगभग हर जगह एक जैसे रहे ,असहमति का दमन, विचारों पर पहरा, और व्यक्ति से ऊपर राज्य। जब यह मॉडल आर्थिक और नैतिक दोनों स्तरों पर असफल हुआ, तब समाधान विचार बदलना नहीं था, समाधान था भाषा बदलना। कम्युनिस्ट शब्द अप्रिय हुआ, तो वह प्रोग्रेसिव बन गया। क्रांति डराने लगी, तो वह एक्टिविज़्म बन गई। वर्ग संघर्ष पुराना पड़ा, तो वह मानवाधिकार कहलाने लगा। यहीं से एक नया आवरण बना लेफ्ट-लिबरल। वही कुनैन की गोली, बस ऊपर से चाशनी।

खुद को अल्पसंख्यकों का प्रवक्ता घोषित किया

भारत में इस विचारधारा ने धीरे-धीरे खुद को संविधान का रक्षक, अल्पसंख्यकों का प्रवक्ता, और लोकतंत्र का एकमात्र प्रहरी घोषित कर लिया। यहां से एक नया नियम बना जो इस वैचारिक दायरे में है, वह नैतिक है; जो बाहर है, वह संदिग्ध है। कुछ व्यक्तियों को न्याय का प्रतीक बना दिया गया, यहां बहस अदालत, सबूत या प्रक्रिया पर नहीं टिकती, बल्कि इस बात पर टिकती है कि व्यक्ति किस विचारधारा से जुड़ा माना जाता है। न्याय सिद्धांत नहीं रह जाता, पहचान बन जाता है। यहीं से न्याय सिद्धांत नहीं रह जाता, कैंप बन जाता है।

अपराध वही, प्रतिक्रिया अलग

यहीं से असली पैटर्न दिखने लगता है। एक घटना पर देशभर में शोर लोकतंत्र ख़तरे में, संविधान का अपमान और दूसरी, वैसी ही घटना पर या तो चुप्पी, या सवाल कि परिस्थिति क्या थी? अपराध नहीं बदलता, पीड़ा नहीं बदलती, बदलती है तो केवल पीड़ित की पहचान। यही चयनात्मक न्याय है। प्रख्यात लेखिका नीरजा माधव के साथ हुई घटना इसका ताजा उदाहरण है। 20 जनवरी को हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आयोजित सेमिनार में नीरजा माधव को विरोध और हिंसक नारेबाजी का सामना करना पड़ा।

असुविधाजनक सच्चाई

जब बांग्लादेश में हिंदुओं के घर जलते हैं, मंदिर तोड़े जाते हैं, लोग पलायन को मजबूर होते हैं – तो वही संवेदनशील आवाज़ें अचानक धीमी पड़ जाती हैं। तर्क दिया जाता है, यह अंतरराष्ट्रीय मामला है, जटिल है। यदि मानवाधिकार सच में सार्वभौमिक हैं, तो पीड़ित की पहचान बदलते ही संवेदना क्यों बदल जाती है? जबकि दूर की करुणा, पास की घटना मौन बन जाती है। ग़ाज़ा पट्टी के नाम पर भारत के विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन होते हैं, पोस्टर बनते हैं, भाषण दिए जाते हैं। लेकिन भारत में मंदिरों पर हमले, आस्था का उपहास, परंपराओं का मज़ाक इन पर या तो चुप्पी, या पीड़ित को ही दोष है। यह मानवीय संवेदना नहीं, वैचारिक चयन है।

वही जो लोग दिन-रात मुस्लिम अधिकार की बात करते हैं, जो वैश्विक इस्लामी राजनीति के नैतिक संरक्षक बनने की कोशिश करते हैं, वे ईरान के संदर्भ में लगभग मौन रहते हैं। ईरान में महिलाओं पर अनिवार्य ड्रेस-कोड, असहमति पर जेल, धार्मिक सत्ता की कठोर तानाशाही। ये अत्याचार किस पर हैं? मुसलमानों पर ही। फिर आवाज़ क्यों नहीं उठती? क्योंकि यह लड़ाई धर्म की नहीं, विचारधारा की प्राथमिकता की है। अनिवार्य ड्रेस कोड अभिव्यक्ति है लेकिन घूंघट बंधन है , गजब के मापदंड है , वास्तव में कोई मापदंड नहीं है ये वैचारिक गुलामी है।

घुसपैठ, राष्ट्र और दोहरा रवैया

जब अवैध घुसपैठ का प्रश्न उठता है, तो यही पैटर्न कहता है मानवता पहले, सीमा बाद में। लेकिन जब देश की सांस्कृतिक पहचान, जनसांख्यिकी और सुरक्षा पर सवाल उठते हैं, तो उन्हें राष्ट्रवादी उन्माद कह दिया जाता है। राष्ट्र यहां एक साझा घर नहीं, एक बाधा बन जाता है।

विश्वविद्यालय: एकतरफ़ा आज़ादी की प्रयोगशाला

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे परिसरों में यह बार-बार दिखा है ,कुछ नारे अभिव्यक्ति की आज़ादी, कुछ विचार नफ़रत। जो भारत, परंपरा या संस्कृति की बात करेवह प्रतिगामी और जो उन्हें नकारे वह प्रगतिशील। यह बहस नहीं, वैचारिक एकाधिकार है।

न्यायपालिका और संस्थाएँ: सुविधा तक सम्मान

फैसला अनुकूल हो तो संविधान की जीत और फैसला प्रतिकूल हो तो संस्थागत पक्षपात। यानी वही पुरानी कहावत मीठा-मीठा खाए, कड़वा-कड़वा थू-थू।

धर्म, परंपरा और उपहास

सुधार ज़रूरी है, विमर्श आवश्यक है,लेकिन जब एक धर्म पर व्यंग्य साहस कहलाए और दूसरे पर वही बात घृणा, तो यह सुधार नहीं, पूर्वाग्रह है।

मीडिया और बुद्धिजीवी: आईना या फ़िल्टर?

एक-से चेहरे, एक-सी बहसें, एक-सी संवेदनाएँ। समाज को सवाल पूछना होगा कि आप यहाँ बोले, वहाँ क्यों नहीं? यह पीड़ा दिखी, वह क्यों नहीं?

विस्थापन की दो कहानियां: स्मृति भी चयनात्मक क्यों?

1990 के दशक में कश्मीर से एक पूरा समुदाय उजड़ गया। घर, मंदिर, ज़मीन-सब पीछे छूट गया। दशकों तक राहत शिविरों में जीवन बीता। यह भारत का सबसे बड़ा आंतरिक विस्थापन था। लेकिन इस त्रासदी का स्थान सार्वजनिक स्मृति में सीमित रहा और न ही अकादमिक विमर्श , न वैश्विक मंचों पर स्थायी आक्रोश। इसके विपरीत, अन्य वैश्विक शरणार्थी संकटों पर विस्तृत रिपोर्टिंग, विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम, और अंतरराष्ट्रीय अभियान बने। प्रश्न उठता है कि क्या विस्थापन का दर्द पीड़ित की पहचान से तय होता है?

महिला अधिकार: अफ़ग़ानिस्तान और ईरान का असुविधाजनक सच

तालिबान-शासित अफ़ग़ानिस्तान में लड़कियों की शिक्षा पर रोक, काम पर प्रतिबंध और सार्वजनिक जीवन से निष्कासन यह सब खुले तथ्य हैं। शुरुआती शोर के बाद, वैश्विक विमर्श में यह मु्द्दा धीरे-धीरे हाशिये पर चला गया। इसी तरह, ईरान में महिलाओं पर अनिवार्य ड्रेस-कोड, शांतिपूर्ण विरोध पर जेल और धार्मिक सत्ता की कठोरता, ये अत्याचार मुसलमान महिलाओं पर हैं। फिर भी मुस्लिम अधिकार की बात करने वाला वैश्विक शोर यहाँ अपेक्षाकृत धीमा क्यों हो जाता है? यदि मानक महिला अधिकार हैं, तो भूगोल बदलते ही आवाज़ क्यों बदलती है?

शरणार्थी और नीति: करुणा बनाम यथार्थ

रोहिंग्या संकट पर करुणा का आह्वान स्वाभाविक है। पर जब किसी देश के सामने सुरक्षा, संसाधन और जनसांख्यिकी जैसे यथार्थ प्रश्न आते हैं, तो उन्हें निर्दयता कहकर खारिज कर देना नीति नहीं बनाता। करुणा आवश्यक है पर अधूरी करुणा, जो यथार्थ को न देखे, स्थायी समाधान नहीं देती। यहां भी समस्या सिद्धांत की नहीं-संतुलन की है।

औपनिवेशिक अत्याचार बनाम सभ्यतागत आघात

औपनिवेशिक अत्याचारों पर पाठ्यक्रम, संग्रहालय और विमर्श बने यह आवश्यक भी है। पर सभ्यतागत आघात जैसे सांस्कृतिक विनाश और मंदिर विध्वंस पर अक्सर कहा जाता है इतिहास को मत कुरेदो, आगे बढ़ो। इतिहास को चुनकर याद करना भी चयनात्मक नैतिकता है। या तो सारी स्मृतियाँ मान्य हों, या फिर इतिहास को राजनीति से मुक्त रखा जाए।

अभिव्यक्ति की आज़ादी: मानक एक या सभ्यता-आधारित?

पश्चिमी समाजों में तीखा व्यंग्य और धर्म की खुली आलोचना फ्री स्पीच मानी जाती है। गैर-पश्चिमी संदर्भों में वही मानक अचानक संवेदनशीलता और सामाजिक शांति के नाम पर सीमित हो जाते हैं। यदि अभिव्यक्ति सचमुच सार्वभौमिक अधिकार है, तो उसके मानक भी सार्वभौमिक होने चाहिए।

शिक्षा के परिसर: अन्वेषण या एकाधिकार?

विश्वविद्यालय विचारों की प्रयोगशाला होते हैं। लेकिन जब कुछ दृष्टिकोण प्रगतिशीलऔर अन्य अस्वीकार्य ठहराए जाने लगें, तो बहस नहीं—एकाधिकार जन्म लेता है। शिक्षा का उद्देश्य निष्कर्ष देना नहीं, निष्कर्ष तक पहुँचने की क्षमता देना हैा और यह बहुविचार के बिना यह संभव नहीं है।

असली समस्या का नाम

समस्या लेफ्ट या राइट नहीं। समस्या है चयनात्मक न्याय , सशर्त संवेदना, राष्ट्र, आस्था और परंपरा से वैचारिक असहजता, यही वह कुनैन है जो चाशनी में लिपटी हुई है।

सच दिखता है, फिर स्वीकारना कठिन क्यों?

अक्सर यह प्रश्न उठता है कि जब तथ्यों और वास्तविकताओं की जानकारी सभी पक्षों को होती है, तो फिर सार्वजनिक विमर्श में कुछ दृष्टिकोण चयनात्मक क्यों दिखाई देते हैं। इसका उत्तर दुर्भावना में नहीं, बल्कि मानव मन और वैचारिक ढाँचों में खोजा जाना चाहिए। सबसे पहला कारण पहचान से जुड़ाव है। कोई भी व्यक्ति केवल तथ्यों से नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक पहचान से भी जुड़ा होता है। जब कोई तथ्य उस पहचान को चुनौती देता है, तो उसे स्वीकार करना मानसिक रूप से कठिन हो जाता है। यह प्रवृत्ति केवल किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय स्वभाव का हिस्सा है।

दूसरा कारण नैतिक आत्मछवि है। जो व्यक्ति स्वयं को न्याय, समानता या मानवाधिकारों के पक्ष में देखता है, उसके लिए यह मान लेना कठिन हो सकता है कि उसकी दृष्टि कभी-कभी अधूरी या असंतुलित भी हो सकती है। यह असुविधा अक्सर मौन या विषय-परिवर्तन के रूप में प्रकट होती है।

तीसरा कारण सामाजिक और पेशेवर परिवेश है। शिक्षा, मीडिया या सामाजिक संगठनों में प्रचलित विमर्श से अलग बोलना कई बार अलगाव या आलोचना का कारण बन सकता है। ऐसे में व्यक्ति अनजाने में सुरक्षित मार्ग चुन लेता है।

अंततः, सच को स्वीकार करना केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि नैतिक साहस की भी माँग करता है, अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने का साहस। यही कारण है कि कई बार सच सामने होते हुए भी विमर्श में पूरी तरह स्थान नहीं पा पाता।

समाधान टकराव में नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, आत्ममंथन और वैचारिक विनम्रता में है। जब हम यह मान लेते हैं कि कोई भी दृष्टि पूर्ण नहीं होती, तभी सार्वजनिक विमर्श अधिक संतुलित और सार्थक बनता है।

 

Topics: नीरजा माधवलेफ्ट लिबरलजेएनयूवामपंथी विचारधारापाञ्चजन्य विशेषवामपंथी झूठहैदराबाद विश्वविद्यालय
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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