सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत सिर्फ गाली-गलौज या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अपने आप में कोई अपराध नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने साफ कहा कि इसके लिए जरूरी है कि अपमान या गाली देने का इरादा खास तौर पर उस व्यक्ति की अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की वजह से हो।
मामला कैसे शुरू हुआ
ये फैसला बिहार के एक शख्स केशव महतो उर्फ केशव कुमार महतो की अपील पर आया है। उनके खिलाफ एक आंगनवाड़ी केंद्र में हुई घटना को लेकर एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ था। आरोप थे कि वहां जाति के नाम पर गाली-गलौज हुई और मारपीट भी। ट्रायल कोर्ट ने समन जारी किया और पटना हाईकोर्ट ने भी उस आदेश को बरकरार रखा। केशव महतो ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आलोक अराधे थे। उन्होंने पिछले हफ्ते फैसला दिया कि इस केस में एससी/एसटी एक्ट लागू ही नहीं होता। कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के 15 फरवरी 2025 के फैसले को पलट दिया और अपीलकर्ता के खिलाफ चल रही कार्यवाही को पूरी तरह रद्द कर दिया।
कोर्ट ने क्या कहा
कोर्ट ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(आर) और संबंधित प्रावधानों का जिक्र किया। इस धारा के मुताबिक अपराध तब बनता है जब कोई गैर-एससी/एसटी व्यक्ति जानबूझकर सार्वजनिक जगह पर किसी एससी/एसटी सदस्य को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करे, डराए या जाति के नाम से गाली दे।
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कोर्ट की मुख्य शर्तें बताईं
- पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य होना चाहिए।
- अपमान, धमकी या गाली का इरादा खास तौर पर उसकी जाति की वजह से होना चाहिए।
बेंच ने कहा, “सिर्फ ये तथ्य कि शिकायतकर्ता एससी/एसटी का है, इसके आधार पर अपराध नहीं बन सकता। अपमान या धमकी का सीधा संबंध उसकी जाति से होना जरूरी है।” मामले में FIR और चार्जशीट में कहीं भी जाति-आधारित अपमान या धमकी का स्पष्ट आरोप नहीं था। इसलिए ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने गलती से कार्यवाही को जारी रखा।
अपराध कैसे साबित हो
कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध साबित करने के लिए अपमान का आधार पीड़ित की जाति होना अनिवार्य है। अगर कोई सिर्फ सामान्य गाली देता है, भले ही सामने वाला एससी/एसटी का हो, लेकिन जाति का जिक्र या इरादा न हो तो ये एक्ट लागू नहीं होगा। सार्वजनिक जगह पर जाति के नाम से गाली देना (धारा 3(1)(एस) के तहत) भी तभी अपराध है जब वो अपमान जातिगत हो।















