अफगानिस्तान में भारतीय दवाइयाँ अब पाकिस्तानी दवाओं की जगह ले रही हैं। भारत की दवा कंपनियां लगातार तेजी से आगे बढ़ रही हैं। अफगानिस्तान पहले अपनी ज़्यादातर दवाइयाँ पाकिस्तान से लेता था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। इसकी एक वजह ये भी है कि पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के बीच रिश्ते बिगड़े हैं।
अफगानिस्तान का बाजार
अफगानिस्तान अपनी ज़रूरत की 85-96% दवाइयाँ बाहर से आयात करता है। घरेलू उत्पादन बहुत कम है क्योंकि सालों की जंग ने फैक्टरियाँ और इंफ्रास्ट्रक्चर बर्बाद कर दिया। पहले पाकिस्तानी कंपनियाँ अफगान बाजार में 35-40% तक हिस्सेदारी रखती थीं, कुछ रिपोर्ट्स में तो 70% तक का ज़िक्र है। 2024 में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को करीब 186.69 मिलियन डॉलर की दवाइयाँ एक्सपोर्ट की थीं। ये दवाइयाँ सस्ती और आसानी से मिल जाती थीं क्योंकि बॉर्डर पास था।
प्रतिबंध क्यों कब लगा?
नवंबर 2025 में अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने पाकिस्तानी दवाओं पर पूरा प्रतिबंध लगा दिया। डिप्टी प्राइम मिनिस्टर अब्दुल गनी बरादर ने खुद ऐलान किया कि पाकिस्तानी दवाएँ घटिया क्वालिटी की हैं, जो अफगान लोगों के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हैं। उन्होंने व्यापारियों को कहा कि तीन महीने के अंदर पाकिस्तान से आयात बंद करो और भारत, ईरान या सेंट्रल एशिया से नई सप्लाई ढूंढो। ये फैसला अक्टूबर-नवंबर 2025 में पाकिस्तान-अफगानिस्तान बॉर्डर पर हुई झड़पों के बाद आया। तोरखम और चमन बॉर्डर क्रॉसिंग बंद हो गईं, जिससे अफगान व्यापारी मुश्किल में पड़ गए।
पाकिस्तान पर असर
प्रतिबंध के बाद पाकिस्तानी दवाओं का बाजार हिस्सा बहुत कम हो गया। एक्सपोर्ट लगभग रुक गया है। अफगानिस्तान में एंटीबायोटिक्स, इंसुलिन और दिल की दवाओं की कमी हो गई। कुछ फार्मासिस्ट नकली या महंगी दवाएँ बेच रहे हैं। पाकिस्तानी फार्मा कंपनियों को बड़ा नुकसान हुआ है क्योंकि अफगानिस्तान उनका बड़ा बाजार था।
इसे भी पढ़ें: अरब स्प्रिंग का डर: क्यों सऊदी-कतर-तुर्की नहीं चाहते अमेरिका का ईरान पर हमला
भारतीय दवाइयाँ कैसे बढ़ रही हैं?
अब भारतीय दवाइयाँ तेजी से जगह बना रही हैं। FY 2024-25 में भारत ने 108 मिलियन डॉलर की दवाइयाँ एक्सपोर्ट कीं, और 2025 के बाकी महीनों में करीब 100 मिलियन डॉलर। बाजार में हिस्सेदारी 12-15% तक पहुँच गई है। कुछ रिपोर्ट्स कहती हैं कि पाकिस्तानी हिस्से के कम होने से भारत 200 मिलियन डॉलर से ज्यादा एक्सपोर्ट कर सकता है। एक अफगान व्लॉगर फजल अफगान ने X पर लिखा कि उन्हें सिरदर्द हुआ तो क्लिनिक गए। तुर्किश पैरासिटामॉल (पारोल) 10 टैबलेट का पैक 40 अफगानी में था, लेकिन भारतीय वाला सिर्फ 10 अफगानी में मिला। दुकानदार ने कहा कि भारतीय दवा बेहतर काम करती है। व्लॉगर ने भारतीय दवा ली और कहा कि असर जल्दी हुआ। उन्होंने लिखा, “भारतीय दवाइयाँ धीरे-धीरे पाकिस्तानी दवाओं की जगह ले रही हैं।”
भारत की मदद
नवंबर 2025 में भारत ने 73 टन इमरजेंसी मेडिकल सप्लाई भेजी। पिछले चार सालों में 327 टन दवाइयाँ, वैक्सीन, एम्बुलेंस और हॉस्पिटल अपग्रेड दिए। जायदुस लाइफसाइंसेज ने अफगान कंपनी रोफी इंटरनेशनल ग्रुप के साथ 100 मिलियन डॉलर की MoU साइन की। इसमें एक्सपोर्ट के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, लोकल मैन्युफैक्चरिंग और जायदुस का अफगानिस्तान में ऑफिस खोलना शामिल है। तालिबान अधिकारी फार्मेक्सिल से भी बात कर रहे हैं कि अफगानिस्तान में प्लांट और लैब लगाएँ। दिसंबर 2025 में भारत के हेल्थ मिनिस्टर जेपी नड्डा ने अफगान पब्लिक हेल्थ मिनिस्टर से मुलाकात की और कैंसर दवाइयाँ, वैक्सीन हैंडओवर किए।














