जबलपुर से शुरू हुई थी तिल और खिचड़ी की परंपरा, मकर संक्रांति पर जानें अनूठा इतिहास
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जबलपुर से शुरू हुई थी तिल और खिचड़ी की परंपरा, मकर संक्रांति पर जानें अनूठा इतिहास

मकर संक्रांति के दिन गंगा कपिल मुनि के आश्रम पधारीं थीं। आज के दिन सूर्य देव और उनके पुत्र शनि का मिलाप होता है।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Jan 13, 2026, 07:33 pm IST
in धर्म-संस्कृति
मकर संक्रांति

मकर संक्रांति

सनातन में मकर संक्रांति का ऐतिहासिक, पौराणिक, आध्यात्मिक, खगोलिकी और वैज्ञानिक दृष्टि से बड़ा महत्व है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य भगवान ने अपने सारथी अरुण को शक्तिशाली मंत्र के महात्म्य को समझाया था। यह मंत्र है –

“ॐ नम: खखोल्काय”

यह मंत्र खखोल्क नामक सूर्य मंडल का प्रतीक है। इस मंत्र का जाप, विशेषकर मकर संक्रांति के दिन अतीव कल्याणकारी है, क्योंकि सूर्य इस दिन अत्यंत प्रभावशाली ऊर्जा के रूप में उदित होता है। यह मन्त्र संसार-सागर की औषधि और मोक्ष का साधन है। इसे मार्तंड मंत्र भी कहते हैं।

मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है अर्थात् सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होता है। शास्त्रों के अनुसार, देवताओं के दिन की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है, सूर्य जब दक्षिणायन में रहते हैं, तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि व उत्तरायण के छह माह को दिन कहा जाता है।

सूर्य की गति से निर्धारित होती है मकर संक्रांति

मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मनाया जाता है। यह वह क्षण होता है, जब सूर्य उत्तरायण होते हैं और खरमास के बाद शुभ काल आरंभ होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मशुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। सामान्यत: भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियां चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किन्तु मकर संक्रान्ति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है।

मां गंगा और शनि देव से भी जुड़ा है महात्म्य

मकर संक्रांति के दिन गंगा कपिल मुनि के आश्रम पधारीं थीं। आज के दिन सूर्य देव और उनके पुत्र शनि का मिलाप होता है। इसी दिन भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर, मंदरा पर्वत पर गाड़ कर बुराई पर अच्छाई का संदेश दिया था।

जबलपुर से शुरू हुई थी तिल संक्रांति

मकर संक्रांति के पावन अवसर पर जबलपुर से तिल संक्रांति और खिचड़ी परंपरा प्रारंभ हुई थी। ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्यों के आलोक में मकर सक्रांति के दिन मां नर्मदा के किनारे बसे प्राचीन नगर जबलपुर स्थित तिलवारा घाट में शनि देव ने मकर संक्रांति के दिन अपने पिता सूर्य की पूजा कर काले तिल अर्पित किए थे इसलिए इस घाट को तिलवारा घाट के नाम से जाना गया। इसी के साथ तिल संक्रांति का उत्सव मनाया जाने लगा। तिलवारा का शाब्दिक अर्थ है तिल को वारना अर्थात तिल अर्पित करना। मकर संक्रांति के दिन तिल का दान और उसका सेवन करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं और उनका कुप्रभाव कम होता है तथा सूर्य देवता का आशीर्वाद मिलता है।

छाया और शनि देव ने दिया श्राप

पौराणिक संदर्भ के परिप्रेक्ष्य में एक अविस्मरणीय कथा है कि कथा है, कि सूर्य देव की दो पत्नियाँ थीं, छाया देवी और संज्ञा देवी । शनि देव छाया के पुत्र थे, जबकि यमराज संज्ञा के पुत्र थे। सूर्य देव ने छाया को यमराज के साथ भेदभाव करते हुए देखा और क्रोधित होकर छाया देवी और शनि को अपने से पृथक कर दिया। क्रोधित होकर छाया और शनि ने सूर्य देव को कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया।

शनि देव ने काले तिल से की पूजा

अपने पिता के शाप के शमन के लिए यमराज ने कठोर तप किया और सूर्य देव को कुष्ठ रोग से मुक्त किया परंतु सूर्यदेव ने कुपित होकर शनि देव के घर कुंभ को जला दिया। इससे छाया और शनि देव को कष्ट भोगना पड़ा। यमराज ने अपने पिता सूर्य देव से आग्रह किया कि छाया और शनिदेव को शाप मुक्त कर दें। सूर्य देव सहमत हुए और वे शनि देव के घर कुंभ गए परंतु वहां पर सब कुछ जला हुआ था, केवल शनिदेव के पास काले तिल ही शेष थे, इसलिए उन्होंने काले तिल से सूर्य देव की पूजा की और उनको प्रसन्न किया।

तिल संक्रांति का महत्व

सूर्य देव ने शनि देव को आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन काले तिल से सूर्य की पूजा करेगा उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे और शनिदेव ने यह वचन दिया कि जो भी मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा करेगा वह उसे कभी कष्ट नहीं पहुंचाएंगे। इसलिए मकर संक्रांति के दिन तिल संक्रांति का विशेष महत्व है। इसी के अनुसार जबलपुर स्थित तिलवारा घाट का नामकरण हुआ और भारत में जबलपुर से तिल संक्रांति का प्रारंभ हुआ।

तिलवारा घाट का महात्म्य

तिलवारा घाट में पुरातन काल से मड़ई आरंभ हुई थी परंतु जब कलचुरि काल में युवराज देव प्रथम( सन् 915 से सन् 945) प्रतापी राजा हुए तब उनका विवाह दक्षिण के राजा अवनि वर्मा की बेटी नोहला देवी से हुआ जो भगवान् शिव की उपासक थीं और नर्मदा शिव पुत्री हैं। नोहला देवी ने मड़ई को मेला का स्वरूप प्रदान किया। प्रचलित है कि नर्मदा तट पर सूर्य को तिल अर्पण करने से मां नर्मदा के वाहन मकर के कष्टों का निवारण होता है और मां नर्मदा प्रसन्न होकर भक्तों को सुख समृद्धि देती है। इसी मान्यता के कारण मकर संक्रांति पर तिलवारा घाट में लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। नोहला देवी ने ही तिलवारा घाट का जीर्णोद्धार कराया, जहाँ विधिवत मकर संक्रांति पर पूजा आरंभ हुई थी।

खिचड़ी की परंपरा और कथा

दूसरी परंपरा मकर संक्रांति पर खिचड़ी की है। जो त्रिपुरी (जबलपुर) से प्रारंभ हुई। इसकी कथा इस प्रकार है कि महादेव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया था। तारकासुर के तीन पुत्रों ने तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली ने बदला लेने के लिए ब्रह्मा की तपस्या की और अजीब सा वरदान मांगा। तीन अभेद्य नगरी स्वर्णकार, रजत पुरी, और लोहपुरी जो आकाश में उड़ती रहें। एक हजार वर्ष बाद एक सीध में आएं तभी उनका विनाश होगा। ब्रह्मा ने तथास्तु तो कह दिया फिर क्या था? इन तीनों का तीनों लोकों में टकराव शुरू हुआ। यह तीनों पूरी मूल रूप से स्थायी नहीं रहती थीं परंतु काल गणना के अनुसार हजार वर्ष बाद त्रिपुरी में ही एक सीध में आना होता था।

शुरू हुआ अनूठा युद्ध

यह तथ्य मयदानव और विश्वकर्मा ने सभी देवताओं को बताया। सभी देवी – देवताओं ने महादेव से इनके विनाश के लिए आव्हान किया तब इस सृष्टि का सबसे अनूठा युद्ध हुआ। महादेव के लिए एक रथ तैयार हुआ जिसमें सूर्य और चंद्रमा के पहिया बने, अश्व के रूप में इंद्र, यम, कुबेर वरुण, लोकपाल बने।

धनुष पिनाक के साथ हिमालय और सुमेरु पर्वत डोर के रूप में वासुकी और शेषनाग, बाण में भगवान विष्णु और नोक में अग्नि आए। इसके बाद महादेव ने श्री गणेश का आह्वान किया और पाशुपत अस्त्र से तीनों पुरियों को एक सीध में आते ही एक ही बाण से विध्वंस कर दिया।

त्रिपुरेश्वर शिवलिंग की स्थापना

त्रिपुरी (जबलपुर) में शैव मत की स्थापना हुई। त्रिपुरेश्वर शिवलिंग की स्थापना हुई। युद्ध के उपरांत मकर संक्रांति पड़ी, खिचड़ी महादेव को प्रिय है। अतः मकर संक्रांति पर महादेव को सभी अन्नों को मिलाकर बनी खिचड़ी समर्पित की गई। यहीं से मकर संक्रांति पर खिचड़ी परंपरा आरंभ हुई। इस दिन महादेव को तिल भी चढ़ाया जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस तिथि का विशेष महत्व है क्योंकि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करता है तो सूर्य की किरणें नव ऊर्जा का संचार करती हैं जिसे संपूर्ण प्रकृति और मानस मंडल ग्रहण कर पल्लवित और पुष्पित होता है।

मकर संक्रांति सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और शुभ पर्व है, जो प्रकृति, सूर्य उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को प्रदर्शित करता है। मकर संक्रांति, अखंड भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रत्व का दर्पण है।

 

 

Topics: तिल संक्रांतिजबलपुरमकर संक्रांतिमकर संक्रांति का महत्वपाञ्चजन्य विशेष
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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