हिन्दू पंचांग के ग्यारहवें महीने ‘माघ’ की सनातन संस्कृति में विशेष महत्ता है। अन्त:ऊर्जा के जागरण की इस विशिष्ट इस अवधि को श्रीमद्भगवद्गीता में ‘आलोक मास’ की संज्ञा दी गई है। ‘माघ मकर गत रवि जब होई, तीरथ-पतिहि आव सब कोई।’ गोस्वामी तुलसीदास जी के इन शब्दों में इस विशेष साधनाकाल की महिमा स्वत: स्पष्ट हो जाती है। आध्यात्मिकता के उत्कर्ष के साथ इस माह में लोकतत्वों की जीवंतता के साथ प्रकृति के प्रति आदरभाव और लोकरंजन की गहन भावना भी समाहित है। ज्ञात हो कि इस ऋ तु में हमारा अन्नदाता हमें नए धान, नई उरद की दाल, नए गुड़, तिल व सरसों के साथ ज्वार, बाजरा व मक्के की नई फसलों का उपहार देता है। यह वह समय होता है जब शीतकाल अपने पूर्ण यौवन पर होता है। ऋ तु अनुकूलन के लिए इस अवधि में नदी स्नान तथा उष्ण प्रवृत्ति के भोज्य पदार्थों के सेवन का विधान हमारे मनीषियों की वैज्ञानिक सोच का परिचायक है।
आधुनिकता की तेज बयार के बावजूद इस माह में देश भर के आंचलिक व ग्रामीण क्षेत्रों में लगने वाले माघ मेले समूचे लोकजीवन में एक नया उल्लास भर देते हैं। देश की सनातन जीवनधारा को पोषित करने वाले इन माघ मेलों में प्रयागराज का त्रिवेणी संगम मेला, पश्चिम बंगाल का गंगासागर मेला, गोरखनाथ धाम का खिचड़ी मेला तथा उत्तराखंड का बागेश्वर व उत्तरकाशी का उत्तरायणी मेला तथा छत्तीसगढ़ के राजिम तीर्थ में लगने वाले माघ मेले की विशेष लोकप्रियता है। लोक आस्था और समाज की जनचेतना को जाग्रत करने वाले इन मेलों की लौकिक व पारलौकिक, दोनों रूपों में विशिष्ट महत्ता है।

माघ मेला और दिव्य कल्पवास
इन मेलों में सर्वोपरि है प्रयाग के त्रिवेणी संगम का माघ मेला। यह मेला विश्व का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा ने इस तीर्थ को ‘तीर्थराज’ की उपाधि दी थी। उन्होंने सतयुग में इसी त्रिवेणी संगम पर सृष्टि रचना से पूर्व ‘प्राकृष्ठ यज्ञ’ संपन्न किया था। पौराणिक मान्यता है कि इस शुभ मुहूर्त में देहत्याग करने वाले जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। इसी कारण महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए इस अवधि में मकर संक्रांति की तिथि का चयन किया था। शास्त्र कहते हैं कि प्रयागराज माघ मेले में धार्मिक अनुष्ठान के फलस्वरूप प्रतिष्ठानपुरी के नरेश पुरुरवा, व्याघ्र मुख वाले विद्याधर और गौतम ऋ षि द्वारा शापित इंद्र त्रिवेणी स्नान से श्राप मुक्त हुए थे।
माघ मेले के दौरान त्रिवेणी संगम की रेतीली भूमि पर तंबुओं का एक विशाल शहर बस जाता है। इस दौरान संगम तट पर किया जाने वाला कल्पवास और संयमित साधना और संत मनीषियों के उद्बोधन अध्यात्म पथ के साधकों में नई जीवनदृष्टि विकसित करते हैं। इस स्नान पर्व पर सनातनियों के भीतर उमड़ने वाले सात्विक भाव देश की सांस्कृतिक चेतना को परिपुष्ट और सामाजिक संघबद्धता को सुदृढ़ करते हैं। प्रयाग के माघ मेले का भौतिक महत्व भी कम नहीं है। धार्मिक व सांस्कृतिक गतिविधियों के अलावा यहां पारंपरिक हस्तशिल्प, भोजन और दैनिक उपयोग की पारंपरिक वस्तुओं की भी अच्छी बिक्री होती है। विगत कई वर्षों से राज्य की आर्थिकी को नई ऊर्जा देने वाले विकास मेलों के रूप यह मेला खासा लोकप्रिय हो रहा है।
गंगासागर का महास्नान
माघ माह के लोकोत्सवों में मकर संक्रांति के पावन पर्व पर लगने वाला पश्चिम बंगाल का गंगासागर मेला भी समूचे देश में लोकप्रिय है। मोक्ष प्राप्ति की विशेष मान्यता के कारण कहा जाता है ‘सारे तीरथ बार बार, गंगासागर एक बार।’ पौराणिक कथानक है कि राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई मां गंगा मकर संक्रांति के दिन ही सागर से मिली थीं। गंगाजल के पावन स्पर्श से राजा सगर के 60 हजार पुत्रों की अतृप्त आत्माओं को मुक्ति मिली थी। सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तब गंगा सागर स्नान का विशेष धार्मिक महत्व हिंदू धर्म में माना गया है। सनातन धर्मावलम्बियों की मान्यता है कि सागर द्वीप के गंगासागर स्नान से 100 अश्वमेध यज्ञ का पुण्य फल मिलता है। इसीलिए गंगासागर में माघ माह के मकर स्नान को महास्नान की संज्ञा दी जाती है।
गोरखनाथ का खिचड़ी भोज
माघ के महीने में गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला खिचड़ी मेला भी दुनियाभर में विख्यात है। इस खिचड़ी मेले का कथानक काफी रोचक है। कहते हैं कि एक बार गुरु गोरखनाथ अपने शिष्यों के साथ भ्रमण करते हुए वर्तमान गोरखपुर क्षेत्र में आ पहुंचे थे। यह वनाच्छादित क्षेत्र उनको तप करने के लिए अच्छा लगा तो धूनी रमाकर बैठ गए। उस समय देश में मोहम्मद खिलजी का शासन था। नाथपंथी साधुओं को आए दिन उसकी सेना से मोर्चा लेना पड़ता था। युद्धकाल में प्राय: उन्हें भोजन बनाने का भी समय नहीं मिल पाता था। फिर भूखे पेट वे शक्तिशाली खिलजी से आखिर कब तक युद्ध करते। उन्होंने अपनी समस्या बाबा को बताई। तब इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने मकर संक्रांति के दिन दाल-चावल एक साथ पकाकर प्रसाद रूप में सबको बांटा। झटपट बन जाने वाला यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था। उन्होंने इस व्यंजन को खिचड़ी नाम दिया। तभी से इस खिचड़ी मेले की परंपरा शुरू हो गई। आज भी माघ मास में प्रतिवर्ष गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी का महापर्व मनाया जाता है और इस अवसर पर एक माह का मेला लगता है। इस खिचड़ी पर्व पर यहां नेपाल के श्रद्धालुओं की संख्या भी हजारों में होती है।

उत्तरायणी मेले
देवभूमि उत्तराखंड में माघ मास में लगने वाले दो मेले पूरे देश में विख्यात हैं- एक बागेश्वर (कुमाऊं) का और दूसरा उत्तरकाशी (गढ़वाल) का। इन मेलों को पर्वतीय अंचल में घुघुतिया, पुस्योड़िया, मकरैण, मकरैणी, उतरैणी, उतरैण, घोल्डा, घ्वौला, चुन्या त्यार, खिचड़ी संकंराद आदि नामों से जाना जाता है। कड़ाके की सर्दी के बाद जब माघ माह का खुशनुमा ऋ तुकाल आता है तो पर्वतीय अंचल के लोग सरयू, रामगंगा, काली, गोरी व गार्गी (गौला) आदि नदियों के तट पर जुटकर सूर्य आराधना करते हैं। इस अवसर पर समूचा पर्वतीय अंचल सुमधुर पर्वतीय लोक गीतों के सुमधुर स्वरों व लोकनृत्यों से चहक उठता है।
इतिहासकारों के अनुसार बागेश्वर के उत्तरायणी मेले का शुभारंभ यहां के चंदवंशीय राजाओं के शासनकाल में हुआ था। प्रयाग के गंगा-यमुना व सरस्वती के संगम की तरह बागेश्वर का सरयू व गोमती के संगम को ‘सरयू बगड़’ के नाम से जाना जाता है। पूर्व काल में यहां भी एक माह के कल्पवास की परंपरा थी। पुण्य कमाने की मंशा के साथ उत्तरायणी मेले में आने का एक और मकसद दूर-दराज के नाते-रिश्तेदारों से मिलने का भी होता था। पवित्र स्नान और कुटुम्बियों से मिलने की लालसा में मीलों की पैदल यात्रा कर लोग यहां जुटते और स्वजन से मिलने की खुशी में हुड़की की थाप के साथ मेले में लोकगीतों व नृत्यों की महफिलें जमती थीं।
पुराने समय में सर्द रातों में अलाव जलाकर झोड़े, चांचरी, भगनौले, छपेली जैसे लोकनृत्यों का लंबा दौर भोर में चिड़ियों के चहकने तक चलता था। धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की समृद्ध विरासत संजोए इन मेलों की व्यापारिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र के रूप में पुख्ता पहचान है। नेपाल और तिब्बत के व्यापारी साल भर इस अवसर का इंतजार करते हैं। तिब्बती व्यापारी यहां ऊनी वस्त्र, चंवर, नमक व जानवरों की खालों से निर्मित वस्तुएं लेकर आते हैं। भोटिया-जौहारी लोग गलीचे, कालीन, ऊनी कंबल और जड़ी-बूटियां लेकर आते हैं। पर्वतीय अंचल की बात करें तो इन मेलों में गुड़-भेली से लेकर टिकली-बिन्दी तक दैनिक जीवन से जुड़ी हर वस्तु की खरीद-फरोख्त होती है। इस दृष्टि से ये मेले पर्वतीय जनजीवन की जीवनधारा कहे जा सकते हैं।
दूसरी ओर उत्तरकाशी के माघ मेले का शुभारंभ प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन पाटा-संग्राली गांवों से कंडार देवता और अन्य देवी-देवताओं की डोलियों के उत्तरकाशी पहुंचने के साथ होता है। इस मौके पर लोग भागीरथी में स्नान को जुटते हैं। उत्तरकाशी की मान्यता बाबा भोलेनाथ की नगरी की भी है। इसलिए दूर-दूर से शिव भक्त इस मेले में हिस्सा लेने आते हैं। वर्तमान समय में यह मेला धार्मिक एवं सांस्कृतिक कारणों के साथ पर्यटक मेले के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है। इसके अलावा मकर संक्रांति के दिन पौड़ी गढ़वाल में एकेश्वर, डाडामंडी, थलनाड़ी आदि जगहों पर ‘गिंदी मेलों’ का भी आयोजन होता है। इन मेलों में शामिल होने के लिए दूर-दूर से युवा खिलाड़ी आते हैं। इस खेल को एक तरह की पर्वतीय हॉकी कहा जा सकता है।
राजिम तीर्थ का माघ स्नान पर्व
छत्तीसगढ़ की धार्मिक राजधानी राजिम में हर वर्ष माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक 15 दिन के माघ मेले की मान्यता देश के लोकप्रिय आध्यात्मिक समागम की है। इसमें देश भर के प्रमुख धार्मिक संप्रदायों के अखाड़ों के महंत, साधु-संत, महात्मा और धर्माचार्यों का संगम होता है। राजिम अपने शानदार मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 45 किलोमीटर दूर ‘सोंढूर’, ‘पैरी’ और ‘महानदी’ के त्रिवेणी संगम-तट पर बसे छत्तीसगढ़ की इस नगरी को श्रृद्धालु श्राद्ध-तर्पण, पर्व स्नान और दान आदि धार्मिक कार्यों के लिए उतना ही पवित्र मानते हैं, जितना कि अयोध्या और बनारस को।
















