सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ठेका मजदूरों को नियमित कर्मचारियों जैसा वेतन-सुविधाएं नहीं मिलेंगी
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ठेका मजदूरों को नियमित कर्मचारियों जैसा वेतन-सुविधाएं नहीं मिलेंगी

सुप्रीम कोर्ट ने ठेका कर्मचारियों को सरकारी नियमित कर्मचारियों के बराबर अधिकार देने से इनकार कर दिया। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के 2018 के आदेश को पलटते हुए कोर्ट ने कहा- ठेके की नौकरियां अलग हैं, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होती।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Jan 13, 2026, 09:32 am IST
in भारत
Supreme Court

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने ठेका कर्मचारियों को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। इसमें शीर्ष अदालत ने कहा है कि ठेके पर काम करने वाले मजदूरों को सरकारी नियमित कर्मचारियों के बराबर अधिकार नहीं मिल सकते। इसी के साथ अदालत ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के 2018 के एक पुराने आदेश को पलट दिया है। कोर्ट ने कहा कि कानून में इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती है।

क्या है पूरा मामला

यह पूरा केस आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में नंदयाल नगरपालिका से जुड़ा है। साल 1994 में सफाई का काम ठेकेदारों के जरिए कुछ लोगों को दिया गया था। ये लोग सालों तक काम करते रहे, लेकिन ठेकेदार बदलते रहते थे। बाद में इन मजदूरों ने मांग की कि उन्हें नियमित सरकारी कर्मचारियों जैसा वेतन, भत्ता और अन्य लाभ मिलने चाहिए। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 2018 में उनके पक्ष में फैसला दिया और नगरपालिका को आदेश दिया कि इन कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स को भी वही सैलरी और सुविधाएं दी जाएं, जो नियमित कर्मचारियों को मिलती हैं। बाद में नगरपालिका ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। मामले की सुनवाई जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने की।

दोनों तरफ के तर्क क्या थे?

मजदूरों की तरफ से कहा गया कि वे सालों से वही काम कर रहे हैं, जो नियमित सफाई कर्मचारी करते हैं, तो उन्हें भी बराबर का हक मिलना चाहिए। उनका दावा था कि काम एक जैसा है, तो सुविधाएं भी एक जैसी होनी चाहिए।दूसरी तरफ नगरपालिका और सरकार ने तर्क दिया कि कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरियां ठेकेदार की मर्जी पर चलती हैं। ये सीधे सरकार से नहीं जुड़ी होतीं। जबकि नियमित नौकरियां पूरी पारदर्शी प्रक्रिया से होती हैं – परीक्षा, इंटरव्यू, आरक्षण सब कुछ लागू होता है। अगर कॉन्ट्रैक्ट वालों को भी वही हक दे दिया जाए, तो नियमित भर्ती की पूरी व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

कोर्ट ने साफ कहा कि नियमित सरकारी नौकरियां एक तरह की सार्वजनिक संपत्ति हैं। देश का हर नागरिक इनमें आवेदन करने का हकदार है। इसलिए भर्ती में सख्त नियम होते हैं ताकि कोई पक्षपात न हो और सिर्फ योग्यता के आधार पर चयन हो। कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि ठेके की नौकरी अलग कैटेगरी की हैं। इनमें ठेकेदार बीच में होता है, इसलिए सीधा कंपनी और कर्मचारी संबंध नहीं बनता। अगर दोनों को एक जैसा मान लिया जाए, तो अलग-अलग नियुक्ति के तरीकों की अहमियत खत्म हो जाएगी। कोर्ट ने टिप्पणी की, “कानून में इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि किसी राज्य प्राधिकरण के तहत नौकरी एक सार्वजनिक संपत्ति है और देश के हर नागरिक को इसके लिए आवेदन करने का हक है।”

हाई कोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 2018 के पूरे आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि ठेके पर काम करने वाले कर्मचारी सरकारी विभागों के नियमित कर्मचारियों के बराबर समानता का दावा नहीं कर सकते। नियमित नौकरियां पारदर्शी और संवैधानिक प्रक्रिया से होती हैं, जबकि कॉन्ट्रैक्ट वाली अलग होती हैं। इस फैसले से लाखों कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स के ऐसे दावों पर असर पड़ सकता है, जहां वे समान वेतन या लाभ की मांग करते हैं।

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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