अमेरिका का वेनेज़ुएला पर आक्रमण: क्या इतिहास स्वयं को दोहराता है?
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अमेरिका का वेनेज़ुएला पर आक्रमण: क्या इतिहास स्वयं को दोहराता है?

वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमला संभवतः वैश्विक युद्ध की चिंगारी नहीं है, लेकिन यह एक गंभीर चेतावनी अवश्य है ,जब महाशक्ति नियम तोड़ती है, तो बाकी शक्तियों को भी नैतिक रोक कम महसूस होती है।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Jan 12, 2026, 10:05 am IST
inविश्लेषण
5 जनवरी, 2026 को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पत्नी के साथ न्यूयॉर्क सिटी में मैनहैटन के एक हेलीपैड पर उतरने के बाद हथकड़ियों में देखा गया। उनके साथ भारी हथियारों से लैस फेडरल एजेंट थे।

5 जनवरी, 2026 को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पत्नी के साथ न्यूयॉर्क सिटी में मैनहैटन के एक हेलीपैड पर उतरने के बाद हथकड़ियों में देखा गया। उनके साथ भारी हथियारों से लैस फेडरल एजेंट थे।

यह प्रश्न कि “क्या इतिहास स्वयं को दोहराता है?” केवल अकादमिक जिज्ञासा नहीं है; यह आज की वैश्विक राजनीति को समझने की कुंजी है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जिन परिस्थितियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध को जन्म दिया था आक्रामक राष्ट्र, तुष्टीकरण की नीति, और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की अक्षमता , आज की दुनिया में उनसे मिलती-जुलती कई छायाएं दिखाई देती हैं। परंतु क्या इसका अर्थ यह है कि तीसरा विश्वयुद्ध अवश्यंभावी है? या इतिहास हमें चेतावनी देकर दोहराव से बचने का अवसर भी देता है?

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की दुनिया

1919 के बाद की विश्व-व्यवस्था तीन बड़ी विशेषताओं से ग्रस्त थी। अपमानित और असंतुष्ट शक्तियां जर्मनी (वर्साय संधि), इटली (अधूरी विजय), जापान (एशिया में अस्वीकृति)। तुष्टीकरण की नीति ब्रिटेन और फ्रांस ने शांति बनाए रखने के नाम पर हिटलर और मुसोलिनी की आक्रामकता को नज़रअंदाज़ किया। कमज़ोर अंतरराष्ट्रीय संस्था राष्ट्र संघ न तो सैन्य शक्ति रखती थी, न ही राजनीतिक इच्छाशक्ति। परिणाम स्पष्ट था, आक्रामकता बढ़ती गई, नियम टूटते गए और अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध अपरिहार्य हो गया।

आज की दुनिया: क्या वही संकेत फिर उभर रहे हैं?

आज की वैश्विक स्थिति को देखें तो कुछ चिंताजनक समानताएं दिखती हैं:

उभरती और असंतुष्ट शक्तियाँ – चीन: ताइवान और दक्षिण चीन सागर , रूस: यूक्रेन और यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था , अमेरिका: एकतरफ़ा सैन्य कार्रवाइयां और संस्थाओं से दूरी, हर शक्ति अपने हितों को नियमों से ऊपर रखने लगी है।

तुष्टीकरण या रणनीतिक मौन – आज भी कई देश यथास्थिति बिगड़ न जाए या व्यापार और सुरक्षा संबंध प्रभावित न हों आदि डर से स्पष्ट नैतिक पक्ष लेने से बचते हैं। यह वही मनोवृत्ति है जो 1930 के दशक में दिखी थी जिसने खतरे को पहचानने में देर कर दी ।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सीमाएँ – आज संयुक्त राष्ट्र मौजूद है, पर वीटो राजनीति, महाशक्तियों की अनदेखी , निर्णय और क्रियान्वयन में अंतर आदि के कारण लोग इसे राष्ट्र संघ की आधुनिक छाया कहने लगे हैं।

फिर भी आज और कल में एक बड़ा अंतर है। इतिहास हूबहू नहीं दोहराता , वह तुकबंदी करता है। आज परमाणु हथियार कारण युद्ध संभव नहीं है ,आज प्रत्यक्ष विश्वयुद्ध की सबसे बड़ी रोक न्यूक्लियर डिटरेंस है क्योंकि युद्ध का अर्थ अब परस्पर विनाश है, यह बात सभी जानते हैं।

आर्थिक परस्पर निर्भरता –आज की दुनिया केवल सैन्य नहीं, आर्थिक रूप से जुड़ी है। युद्ध अब टैंकों से पहले प्रतिबंध , सप्लाई-चेन , मुद्रा और तकनीक के ज़रिए लड़ा जाता है। इसलिए तीसरा विश्वयुद्ध संभव है, पर परंपरागत नहीं यह हाइब्रिड हो सकता है ।

ये भी पढ़ें – वेनेजुएला संकट : तेल का खेल

क्या तीसरा विश्वयुद्ध निकट है?

वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमला संभवतः वैश्विक युद्ध की चिंगारी नहीं है, लेकिन यह एक गंभीर चेतावनी अवश्य है ,जब महाशक्ति नियम तोड़ती है, तो बाकी शक्तियों को भी नैतिक रोक कम महसूस होती है। यही सबसे बड़ा खतरा है नियमों का क्षरण और वैश्विक व्यवस्था का टूटना । आज तृतीय विश्व युद्ध की सैन्य रूप में संभावना कम है , पर जोखिम मौजूद है । आज युद्ध का स्वरूप बदल चुका है प्रतिबंध , साइबर हमले , मुद्रा युद्ध , तकनीकी आपूर्ति पर नियंत्रण और नैरेटिव और सूचना युद्ध है । दुनिया स्पष्ट रूप से गुटों (Blocs) में बँट रही है एक ओर G7/पश्चिमी गठबंधन वही दूसरी ओर BRICS/ग्लोबल साउथ का उभार यदि यह विभाजन कठोर होता गया और संवाद के पुल टूटे, तो टकराव की आशंका बढ़ेगी।

इतिहास यह नहीं कहता कि युद्ध अनिवार्य है। इतिहास यह कहता है कि जब नियम टूटते हैं, जब संस्थाएँ निष्क्रिय होती हैं, और जब शक्तिशाली को रोका नहीं जाता तब युद्ध रास्ता बना लेता है।

भारत और दुनिया के लिए निष्कर्ष

आज की स्थिति हमें 1930 के दशक की चेतावनी देती है, न कि उसकी नियति। तुष्टीकरण भी समाधान नहीं और अंधी आक्रामकता भी समाधान नहीं है। इसका समाधान है संतुलित शक्ति , प्रभावी बहुपक्षवाद और नियमों का समान अनुप्रयोग है। यदि दुनिया ने यह संतुलन साध लिया, तो इतिहास स्वयं को नहीं दोहराएगा। लेकिन यदि नहीं साधा तो तीसरा विश्वयुद्ध किसी घोषणा के साथ नहीं, धीरे-धीरे, अलग-अलग मोर्चों पर सामने आएगा। यही आज के युग की सबसे गंभीर चेतावनी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है ।

भारत की भूमिका

क्या भारत को भी अवसर देखकर आक्रामक होना चाहिए? सीधा उत्तर: नहीं। भारत की ऐतिहासिक शक्ति यह रही है कि उसने तात्कालिक उन्माद में निर्णय नहीं लिए, शक्ति के साथ संयम दिखाया ,और नैतिक वैधता बनाए रखी और भारत यदि आज केवल दूसरों की नकल करेगा, तो वह वैकल्पिक वैश्विक नेतृत्व नहीं दे पाएगा। भारत को आंतरिक सशक्तीकरण पर जोर देना चाहिए वह भी बिना भ्रम के, क्योंकि नैतिकता तब तक प्रभावी नहीं होती, जब तक उसके पीछे शक्ति न हो। भारत को सैन्य आत्मनिर्भरता , आर्थिक तेज़ी , तकनीकी संप्रभुता , सामाजिक-राजनीतिक स्थिरता इन चारों स्तंभों पर निरंतर काम करना होगा। भारत को नियमों का रक्षक, संवाद का सेतु, संतुलन का केंद्र, के रूप में कार्य करना होगा। यदि आज संयुक्त राष्ट्र अप्रभावी दिखता है, तो उसका उसे निष्क्रिय छोड़ना नहीं, बल्कि उसे प्रासंगिक बनाना है। भारत सुरक्षा परिषद सुधार , ग्लोबल साउथ की आवाज़ , शांति स्थापना और मानवीय कूटनीति में नेतृत्व दे सकता है।

चेताने आता है इतिहास

इतिहास हमें डराने नहीं, चेताने आता है , इतिहास तभी दोहराता है, जब मनुष्य उसके सबक भूल जाता है। आज दुनिया एक मोड़ पर खड़ी है या तो शक्ति-उन्माद की राह या संतुलित बहुध्रुवीय व्यवस्था। यदि जिसकी लाठी उसकी भैंस का सिद्धांत हावी हुआ, तो युद्ध केवल समय की बात होगी, लेकिन यदि भारत जैसे देश शक्ति को संयम से जोड़ें , नियमों को जीवित रखें और संवाद को अंतिम विकल्प नहीं, पहला विकल्प बनाएं तो तीसरा विश्वयुद्ध अनिवार्य नहीं है।

आज दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता किसी नए महाशक्ति-साम्राज्य की नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति की है जो शक्ति को सीमित करना भी जानती हो और यही भूमिका भारत निभा सकता है।

यह भी पढ़ें – भू-राजनीति का नया दौर

 

 

Topics: डोनाल्ड ट्रंपपाञ्चजन्य विशेषविश्व युद्धवेनेजुएला संकटअमेरिका का वेनेजुएला पर हमला
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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