हरियाणा के किसान अब फसल अवशेष जलाने की बजाय उससे कमाई करने लगे हैं। किसान पराली का उपयोग बायोफ्यूल संयंत्रों, पशु चारे, कम्पोस्ट और पेपर निर्माण में कर रहे हैं, जिससे कभी प्रदूषण का कारण मानी जाने वाली पराली अब किसानों के लिए आय का स्थायी स्रोत बनती जा रही है। राज्य सरकार ने पहले चरण में 75,000 एकड़ भूमि के लिए एक एकड़ पर एक पैकेट मुफ्त डिकंपोजर वेटेबल पाउडर वितरित किया है।
यह डिकंपोजर फसल अवशेष को पोषक तत्वों से भरपूर खाद में बदल देता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ जाती है। फफूंदीजनित रोग घटते हैं और रासायनिक खादों के उपयोग में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी आती है।
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राज्य सरकार की ओर से किसानों को सब्सिडी पर 1,882 हैप्पी सीडर और सुपर सीडर मशीनें दी गई हैं, जिनकी मदद से किसान बिना पराली हटाए सीधे गेहूं की बुवाई कर रहे हैं। कई प्रगतिशील किसानों ने प्रति एकड़ तीन से पांच क्विंटल तक गेहूं की पैदावार में वृद्धि दर्ज की है जिससे यूरिया में काफी बचत हुई है।
पराली न जलाने वाले किसानों को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य सरकार प्रति एकड़ 1,200 रुपये की सहायता राशि 1.87 लाख किसानों को दे रही है, जिसमें 16.31 लाख एकड़ भूमि कवर होती है। राज्य सरकार भविष्य में इस राशि को और बढ़ाने की योजना बना रही है।
बनती है गुणवत्ता वाली खाद
डीकम्पोजर वेटेबल पाउडर पराली, सब्जियों के अवशेष और अन्य कृषि कचरे को कुछ ही दिनों में विघटित करके उच्च गुणवत्ता वाली खाद में बदल देता है। यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और उसमें जैविक कार्बन की मात्रा में वृद्धि करता है। यह पाउडर एक पौधा संरक्षण एजेंट के रूप में भी काम करता है, जो मिट्टी में मौजूद कवक-जनित रोगों और कीटों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।
पराली बन गई नई इंडस्ट्री
मंत्रा ने राज्य में पराली प्रबंधन में हुई उल्लेखनीय प्रगति की सराहना करते हुए इसे ‘नई इंडस्ट्री’ करार दिया, जिसने किसानों की जिंदगी बदल दी है और टिकाऊ कृषि को नई दिशा दी है। उन्होंने कहा कि हरियाणा ने पराली जलाने की समस्या को मुनाफे के अवसर में बदलकर पूरे देश के सामने मिसाल पेश की है।
उल्लेखनीय है कि नायब सरकार की एमएसपी नीति अब देश के लिए मॉडल बन चुकी है, जिससे धान, गेहूं, बाजरा से लेकर तिलहन तक सभी फसलों के किसानों को उचित मूल्य मिल रहा है। इस खरीफ सीजन में अब तक करीब 60 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद एमएसपी पर की जा चुकी है।
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समय पर खरीद, मंडियों में बेहतर प्रबंधन और कुशल लॉजिस्टिक्स के कारण छोटे और मौसम से प्रभावित किसानों को भी किसी तरह की दिक्कत नहीं हो रही है। उर्वरक की कालाबाजारी पर अंकुश लगाने के लिए एक बड़े डिजिटल सुधार की घोषणा हुई है। अब राज्य में उर्वरक वितरण को ‘मेरी फसल मेरा ब्यौरा’ पोर्टल से जोड़ा गया है।
अब उर्वरक का बैग सीधे किसान को उसकी फसल के अनुसार मिलेगा। इस पारदर्शिता से न तो उर्वरक की हेरा-फेरी होगी और न जमाखोरी। किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि रासायनिक निर्भरता घटाई जा सके।














