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दिल्ली दंगों के आरोपियों की जमानत का स्वागत: ये कैसी मानसिकता?

दिल्ली दंगों के आरोपियों के स्वागत और मीडिया कवरेज ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या जमानत को निर्दोषता बताया जा रहा है? क्या हिंसा पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़का जा रहा है?

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jan 9, 2026, 08:19 pm IST
inभारत, दिल्ली

दिल्ली में वर्ष 2020 में दंगे से पूरा देश दहल गया था। नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध करते-करते दंगाइयों ने हिंदुओं का विरोध करना शुरू कर दिया। भारत को टुकड़ों-टुकड़ों में काटने का षड्यन्त्र रचने लगे। चिकेन नेक वाला बयान आज तक सिहरन पैदा करने के लिए पर्याप्त है।

कैसे गैर सरकारी संगठनों के मुखौटे के पीछे रहकर हिंदुओं के प्रति हिंसा का खूनी खेल खेला गया, यह सभी ने देखा था। मगर इनमें जो सबसे हैरान करने वाला मामला है, वह यह है कि हिंसा के जो सूत्रधार रहे हैं उन्हें बौद्धिक जामा पहनाने का प्रयास किया गया। उन्हें विद्यार्थी और एक्टिविस्ट कहा गया। उनकी गिरफ्तारी को ऐसा दिखाया गया कि जैसे निर्दोषों के खिलाफ कदम उठाए जा रहे हैं और सरकार साज़िशन गलत कर रही है।

ये तमाम तथ्य दबा दिए गए कि कैसे एक्टिविस्ट चेहरों के पीछे काली सच्चाई है? जो कविताएं बोली गईं, उनके पीछे के भाव क्या थे? जब से उनकी गिरफ्तारी हुई, तब से लेकर अभी तक उनका इमेज मेकओवर किया जा रहा है। हालांकि यह इमेज मेकओवर अभी बहुत प्रभावी इसलिए नहीं होगा, क्योंकि उनके पास तथ्य नहीं है।

फिर यह बात भी सामने आती है कि जो लॉबी कानून को मुस्लिम विरोधी बताकर इतनी बड़ी हिंसा को सक्षम बना सकती है, तो वह लॉबी इनका सफल इमेज मेकओवर भी कर सकती है और वह सब इन आरोपियों को जमानत मिलने के साथ ही आरंभ हो गया है।

दिल्ली दंगे के कुछ आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी। हालांकि शरजील इमाम और उमर खालिद को जमानत देने से इनकार कर दिया गया, परंतु न्यायपालिका के इस निर्णय को भाजपा का निर्णय बताकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो हुआ, वह आज भी डराने के लिए पर्याप्त है कि आखिर किस सीमा तक विष घुला हुआ है।

आरोपियों का महिमामंडन भयावह है

जो लोग जमानत पर बाहर हैं, वे दोषमुक्त नहीं हुए हैं, यह याद रखना चाहिए। उन्हें तमाम कड़ी शर्तों पर जमानत मिली है। और एक भी शर्त का उल्लंघन किया तो उन्हें वापस जेल जाना होगा, मगर गुलफिशा फातिमा का जिस प्रकार से स्वागत किया गया, वह अपने आप में तमाम प्रश्न उठाने वाला है। आखिर इस स्वागत का औचित्य क्या है? आखिर परिवार की भी यह मानसिकता क्या है, जिसमें एक हिंसा की आरोपी का स्वागत ऐसे किया जा रहा है, जैसे कि वह किसी परीक्षा में टॉप करके आई हो? यह प्रश्न सोशल मीडिया पर आए भी कि आखिर क्यों इसका स्वागत किया जा रहा है?

मगर जैसे कि मीडिया के एक बड़े धडे की आदत है कि वह नायकों को गढ़ने में विश्वास करता है। कौन भूल सकता है कन्हैया कुमार के जेल से छूट कर जेएनयू जाकर आजादी के नारे लगाने वाला वीडियो? सरकार को अत्याचारी दिखाया जाता है, परंतु आरोपियों से यह प्रश्न नहीं पूछे जाते कि आखिर आपको इतनी कड़ी शर्तों पर जमानत क्यों मिली है?

फूल मालाओं से स्वागत.?

मिठाई खिलाकर किस बात की खुशी मनाई जा रही है? और मीडिया का कवरेज कि “कैमरे में कैद हुए भावुक लम्हे?” क्या ये स्वागत के वीडियो हिंसा पीड़ितों के जख्मों पर नमक नहीं हैं? दिल्ली में हिन्दू विरोधी हिंसा में अंकित शर्मा और दिलावर नेगी की नृशंस हत्या को कौन भूल सकता है? अंकित शर्मा को किस नृशंसता से मारा गया था, वह सभी को याद होगा और इसके साथ ही दिलावर नेगी की हत्या को कैसे कोई भूल सकता है? कौन भूल सकेगा कि कैसे अगल-बगल के दो स्कूल केवल मालिकों की धार्मिक और मजहबी पहचान के कारण इतने अलग हो जाते हैं कि धार्मिक पहचान वाला जल जाता है और मजहबी पहचान वाला बच जाता है।

अब ऐसे में जब गुलफिशा फातिमा के स्वागत का वीडियो मीडिया केवल दिखा ही नहीं रहा है, बल्कि इसे भावुक लम्हा भी लिख रहा है तो क्या अंकित शर्मा और दिलावर नेगी जैसे लोगों के साथ न्याय कर रहा है? क्या दिल्ली दंगों में मारे गए लोगों के परिजन इस स्वागत को देखकर खुद को स्तब्ध अनुभव नहीं कर रहे होंगे? क्या जिनके घर इस हिंसा में जल गए, वे एक बार फिर से उस तपिश को अनुभव नहीं कर रहे होंगे? मगर मीडिया के एक वर्ग की निर्लज्जता है कि जाती नहीं और आरोपितों की जमानत पर बाहर आने पर स्वागत की कवरेज के कारण देश के घाव पर जो नमक वह छिड़क रहा है, उससे एक बार फिर से यह साबित हो गया है कि भारत का मीडिया का एक वर्ग भीतर से भारत विरोधी है और भारत से प्रेम करने वालों की हत्याओं पर मौन ही वह रहता है!

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