दिल्ली दंगे 2020: राजनीतिक दलों का रुख किसके साथ?
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दिल्ली दंगे 2020: राजनीतिक दलों का रुख किसके साथ?

CAA-NRC विरोध के दौरान उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुई हिंसा में 53 लोग मारे गए और 581 घायल हुए। दिल्ली पुलिस के अनुसार, 758 FIR दर्ज हुईं, 2,619 गिरफ्तारियां हुईं।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Feb 27, 2026, 05:23 pm IST
inदिल्ली
दिल्ली दंगा 2020

दिल्ली दंगा 2020

फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों को छह साल पूरे हो गए हैं। CAA-NRC विरोध के दौरान उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुई हिंसा में 53 लोग मारे गए और 581 घायल हुए। दिल्ली पुलिस के अनुसार, 758 FIR दर्ज हुईं, 2,619 गिरफ्तारियां हुईं। कुल 414 मुख्य चार्जशीट और 460 से अधिक सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गईं, जिसमें 2,400 से ज्यादा लोगों को नामित किया गया।

ज्यादातर मामले कड़कड़डूमा कोर्ट में लंबित हैं, जहां ट्रायल चल रहे हैं। अब तक केवल 112 मामलों में सजा हुई है, जबकि 20 मामलों में आरोपी बरी हो चुके हैं। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि जांच और सुनवाई की रफ्तार बेहद धीमी है। छह साल बाद भी अधिकांश पीड़ितों को पूर्ण न्याय नहीं मिला है, जिससे उनका दर्द और निराशा बढ़ती जा रही है।

दंगों के बाद कांग्रेस, एसपी, एएपी और अन्य विपक्षी दलों पर आरोप लगा कि वे आरोपियों के साथ खड़े हैं। बीजेपी ने दावा किया कि कांग्रेस ने उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे आरोपियों को समर्थन दिया। सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल, सिंघवी  और खुर्शीद जैसे कांग्रेस से जुड़े वकीलों की पैरवी से यह धारणा मजबूत हुई। एसपी ने सिब्बल को राज्यसभा में समर्थन दिया, जबकि एएपी के पूर्व काउंसलर ताहिर हुसैन आरोपी हैं। एएपी ने दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए, लेकिन समुदाय विशेष पर कंपेंसेशन देने में विशेष कृपा दिखाई।

ये दल दंगाइयों के साथ क्यों खड़े दिखते हैं? एक कारण वोट बैंक पॉलिटिक्स है। कांग्रेस और इंडि अलायंस मुस्लिम समुदाय को समर्थन देकर अपना आधार मजबूत करना चाहते हैं। सीएए विरोधी प्रदर्शन लेफ्ट-लिबरल विचारधारा से जुड़े थे, जो इन दलों के एजेंडे से मेल खाते हैं। हालांकि, ये दल दावा करते हैं कि वे निर्दोषों की रक्षा कर रहे हैं, न कि दंगाइयों की। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में कुछ आरोपियों को जमानत दी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं, जो साजिश के आरोपों की गंभीरता दर्शाता है। विपक्षी दलों का ‘इकोसिस्टम’ इन वकीलों के माध्यम से मामलों को लड़ता रहा, जो राजनीतिक समर्थन का संकेत है।

न्याय की तलाश और राजनीतिक समीकरण

दंगों से जुड़े कई मामलों में मुस्लिम और लेफ्ट-लिबरल विचारधारा वाले आरोपियों की पैरवी बड़े वकीलों ने की है। इनमें कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, अभिषेक मनु सिंघवी, हुजेफा अहमदी और प्रशांत भूषण प्रमुख हैं। इनके प्रोफाइल से उनके राजनीतिक संबंध स्पष्ट होते हैं, जो इंडियन नेशनल कांग्रेस (कांग्रेस) और इंडि अलायंस (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस) से जुड़े हैं।

कपिल सिब्बल एक प्रमुख वकील और पूर्व राजनेता हैं। वे 2003 से 2022 तक कांग्रेस के सदस्य रहे और यूपीए सरकार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, मानव संसाधन विकास जैसे मंत्रालय संभाल चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में वे अक्सर कांग्रेस की ओर से पैरवी करते थे। 2022 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और समजवादी पार्टी (एसपी) के समर्थन से निर्दलीय राज्यसभा सदस्य बने। एसपी इंडि अलायंस का हिस्सा है। सिब्बल ने दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद की जमानत याचिका में बहस की।

सलमान खुर्शीद भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। वे पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री रह चुके हैं और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष भी। 2009 में फर्रुखाबाद से लोकसभा सदस्य चुने गए। खुर्शीद ने दंगों के मामलों में शिफा-उर-रहमान और अन्य आरोपियों की पैरवी की। उनका कांग्रेस से गहरा नाता इंडि अलायंस के साथ उनके संबंध को मजबूत करता है, जहां कांग्रेस प्रमुख भूमिका निभाती है।

हुजेफा अहमदी सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट हैं, जिन्होंने कई हाई-प्रोफाइल मामलों में पैरवी की है। उनके राजनीतिक संबंध सीधे तौर पर कांग्रेस या इंडि अलायंस से जुड़े नहीं दिखते, लेकिन वे अहमदी समुदाय से हैं और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं। दंगों के केस में उन्होंने कुछ आरोपियों का प्रतिनिधित्व किया, जैसे महिला अधिकारों से जुड़े मामलों में।

प्रशांत भूषण पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन के विशेषज्ञ हैं। वे इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन से जुड़े थे और आम आदमी पार्टी (एएपी) के संस्थापकों में से एक। 2015 में उन्होंने एएपी छोड़ दी। भूषण यूपीए सरकार के आलोचक रहे हैं, लेकिन दंगों के मामलों में उन्होंने लेफ्ट-लिबरल आरोपियों की पैरवी की। उनका एएपी से पुराना संबंध इंडि अलायंस से जोड़ता है, क्योंकि एएपी दिल्ली में कांग्रेस के साथ गठबंधन में है।

इन वकीलों के प्रोफाइल से पता चलता है कि उनके राजनीतिक संबंध मुख्य रूप से कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों से हैं, जो इंडि अलायंस का आधार हैं। हालांकि, वे पेशेवर रूप से पैरवी करते हैं, लेकिन उनके राजनीतिक बैकग्राउंड पर सवाल उठते हैं।

उत्तर पूर्वी दिल्ली के हिंदू पीड़ित: न्याय की आस में

उत्तर पूर्वी दिल्ली, जिसे यमुनापार कहा जाता है, दंगों का केंद्र था। यहां के हिंदू पीड़ित आज भी न्याय की प्रतीक्षा में हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, एक दर्जन से अधिक हिंदू मारे गए, कई परिवार बेघर हुए। पीड़ितों को पूरा कंपेंसेशन नहीं मिला। दिल्ली सरकार ने एक्स-ग्रेशिया राहत दी, लेकिन कोर्ट द्वारा निर्धारित राशि का एक अंश ही। हिंदू पीड़ितों का कहना है कि वे ‘खाली हाथ’ लड़ रहे हैं, जबकि आरोपियों के पास ‘करोड़ों की फंडिंग’ है। बीजेपी नेताओं जैसे तजिंदर बग्गा और कपिल मिश्रा ने हिंदू पीड़ितों के लिए 71 लाख रुपये का फंड जुटाया।

पीड़ितों की लड़ाई छह साल से चल रही है। कई परिवार विस्थापित हैं, आर्थिक तंगी में। वे कहते हैं कि उनके पास सिर्फ ‘सच की ताकत’ है। न्यायिक प्रक्रिया धीमी होने से निराशा है।

न्याय की चुनौतियां और आगे का रास्ता

दंगों के पांच साल बाद, न्याय दूर लगता है। पुलिस ने 751 एफआईआर दर्ज कीं, लेकिन कई केस कमजोर साबित हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में पांच आरोपियों को जमानत दी, लेकिन साजिश के मुख्य आरोपियों को नहीं। यूएपीए जैसे सख्त कानूनों से ट्रायल लंबे खिंच रहे हैं। पीड़ितों को कंपेंसेशन की मांग 153 करोड़ रुपये की थी, लेकिन सिर्फ 21 करोड़ मंजूर हुए।

जहां बीजेपी आरोपियों को ‘दंगाई’ कहती है, वहीं विपक्ष उन्हें ‘निर्दोष कार्यकर्ता’। सच्चाई बीच में है: दंगे सांप्रदायिक थे, लेकिन साजिश के आरोपों की जांच जरूरी। हिंदू पीड़ितों की आवाज मजबूत करने के लिए स्वतंत्र जांच और फास्ट-ट्रैक कोर्ट की मांग हो रही है। फंडिंग के असमान वितरण से असंतोष है, जो सामाजिक विभाजन बढ़ाता है।

 

Topics: राजनीतिक दलदिल्ली दंगे 2020दिल्ली में दंगेदिल्ली दंगा कोर्टदिल्ली दंगा वकील
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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