गत 4 जनवरी को नई दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) में वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ हिंदू एकेडेमिशियन के तत्वावधान में ‘हिंदुत्व की शाश्वत प्रासंगिकता’ विषय पर एक गोष्ठी आयोजित हुई। इसमें देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से 300 से अधिक अध्यापकों एवं शिक्षाविदों ने भाग लिया। गोष्ठी की प्रस्तावना रखते हुए वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ हिंदू एकेडेमिशियन के राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. नचिकेत तिवारी ने कहा कि हिंदुत्व और भारतीय संस्कृति को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां फैली हुई हैं। हिंदुत्व का मूल अधिष्ठान ज्ञान है, जिसमें वेद, बौद्ध दर्शन, भारतीय ज्ञान परंपरा, संत परंपरा और विविध भाषाओं का समावेश है। हिंदुत्व की मूल पहचान ही ज्ञान है। साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष प्रो. के. के. अग्रवाल ने कहा कि यदि भारत को विश्वगुरु बनना है, तो उसे हिंदुत्व के सिद्धांतों के अनुरूप आगे बढ़ना होगा।
संगोष्ठी का प्रथम सत्र ‘सामाजिक समरसता : हिंदू जीवनशैली का सार’ विषय पर केंद्रित रहा। इस सत्र में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष किशोर मकवाणा ने कहा कि सामाजिक समरसता के लिए बंधुत्व और एकात्मता की भावना आवश्यक है, जिसके लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर ने निरंतर संघर्ष किया। दूसरे सत्र का विषय था- ‘पंजाब : संस्कृति, चुनौतियां और परिवर्तन।’ इसे संबोधित करते हुए डॉ. अशमिंदर सिंह बहल ने कहा कि पंजाब के युवाओं में नशे की समस्या बढ़ रही है, जिसका एक कारण पड़ोसी देश से जुड़ी परिस्थितियां भी हैं।
विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि पंजाब की समस्याओं पर निर्भीकता से विचार करना होगा। तीसरा सत्र ‘हिंदू मूल्य : सामाजिक परिवर्तन की दिशा’ विषय पर केंद्रित रहा। इसमें इग्नू की कुलपति प्रो. उमा कांजीलाल ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में गुरु-शिष्य परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता, भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर विचार प्रस्तुत किए और भारतीय मूल्यों की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।

















