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‘राष्ट्र, धर्म, संस्कृति के स्तर पर हम सब एक’

भोपाल में सामाजिक सद्भाव बैठक हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के निमित्त हुई इस बैठक का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलित कर सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने किया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jan 9, 2026, 12:33 pm IST
inमध्य प्रदेश
भारत माता के चित्र को नमन करते श्री मोहनराव भागवत, पंडित प्रदीप मिश्रा और श्री अशोक पांडेय

भारत माता के चित्र को नमन करते श्री मोहनराव भागवत, पंडित प्रदीप मिश्रा और श्री अशोक पांडेय

गत 3 जनवरी को भोपाल में सामाजिक सद्भाव बैठक हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के निमित्त हुई इस बैठक का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलित कर सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने किया। उनके साथ प्रख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा तथा मध्य भारत प्रांत संघचालक श्री अशोक पांडेय उपस्थित रहे। बैठक में मध्य भारत प्रांत के 16 शासकीय जिलों के विभिन्न वर्गों और संगठनों के प्रतिनिधियों की सहभागिता रही।

अपने उद्बोधन में श्री भागवत ने कहा कि समाज शब्द का अर्थ ही समान गंतव्य की ओर बढ़ने वाला समूह है। भारतीय समाज की कल्पना सदैव ऐसी रही है, जिसमें जीवन भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार से सुखी हो। हमारे ऋ षि-मुनियों ने यह समझा कि अस्तित्व एक है, केवल देखने की दृष्टि अलग-अलग है। उनकी तपस्या और साधना से ही राष्ट्र का निर्माण हुआ और वही हमारी सांस्कृतिक नींव है। उन्होंने कहा कि कानून समाज को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन समाज को चलाने और जोड़कर रखने का कार्य सद्भावना ही करती है। विविधता के बावजूद एकता ही हमारी पहचान है। बाहरी रूप से हम अलग दिख सकते हैं, लेकिन राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के स्तर पर हम सभी एक हैं। इसी विविधता में एकता को स्वीकार करने वाला समाज हिंदू समाज है।

हिंदू कोई संज्ञा नहीं, बल्कि एक स्वभाव है, जो मत, पूजा-पद्धति या जीवनशैली के आधार पर झगड़ा नहीं करता। उन्होंने कहा कि समाज में भ्रम फैलाकर जनजातीय और अन्य वर्गों को यह कहकर तोड़ने का प्रयास किया गया कि वे अलग हैं, जबकि सचाई यह है कि हजारों वर्ष से अखंड भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक है। संकट के समय ही नहीं, बल्कि हर समय सद्भावना बनाए रखना आवश्यक है। पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपने आशीर्वचन में कहा कि सभी समाज अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं, लेकिन यह प्रश्न भी आवश्यक है कि हमने राष्ट्र के लिए क्या किया और राष्ट्र को क्या दिया। संघ और शिव के भाव में अद्भुत समानता है। जैसे शिव ने समस्त सृष्टि के लिए विष पिया, वैसे ही संघ प्रतिदिन आरोपों का विष पीकर भी संयम और राष्ट्रहित में कार्य करता है। बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि समाज अपने क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए स्वयं आगे आएगा और सरकार की प्रतीक्षा किए बिना सामूहिक प्रयास करेगा।

स्वधर्म में लाैटे 151 जनजातीय बंधु

गत 4 जनवरी को ओडिशा में मयूरभंज जिले के ठाकुरमुंडा प्रखंड के बागदफा, जामनांडा और डंगाडिहा गांवों में घर-वापसी कार्यक्रम आयोजित हुए। इनमें 30 जनजाति परिवारों के 151 पुरुष व महिलाओं ने सनातन धर्म में वापसी की। धर्मगुरु मानाय पूर्ति ने इन सभी के लिए प्रभु से प्रार्थना की और उनका मार्गदर्शन किया। घर-वापसी करने वाले लोगों में संथाल, हो व गोंड जनजाति के लोग शामिल थे। घर-वापसी करने वाले लोगों ने बताया कि वे कुछ वर्ष पूर्व पादरियों के बहकावे में आकर अपनी मूल संस्कृति और परंपराओं से दूर हो गए थे।

उस समय पादरियों द्वारा स्वास्थ्य को लेकर किए गए भ्रामक दावों के कारण उन्होंने ईसाई बनने का निर्णय लिया था। परिवार के कुछ सदस्य जब गंभीर रूप से अस्वस्थ थे, तब पादरियों ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि ईसाइयत अपनाने से उनकी बीमारियां ठीक हो जाएंगी। इसी झांसे में आकर उन्होंने कन्वर्जन कर लिया। हालांकि, कन्वर्जन के बाद उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक अलगाव का सामना करना पड़ा। वे अपने समाज से कट गए और अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों, त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में भाग नहीं ले पाए।

धीरे-धीरे उन्हें यह अनुभव होने लगा कि वे अपनी ही जड़ों और अपने ही लोगों से दूर होते जा रहे हैं, जिससे मानसिक असंतोष और पीड़ा बढ़ती चली गई। घर-वापसी करने वाले प्रमुख व्यक्ति बंशीधर कालुंडिया ने बताया कि इस दौरान वनवासी कल्याण आश्रम और जनजाति सुरक्षा मंच के कार्यकर्ताओं ने उनसे लगातार संवाद बनाए रखा। कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान कन्वर्जन में नहीं, बल्कि उचित उपचार और जागरूकता में है। कन्वर्जन के नाम पर लोगों को उनके पूर्वजों की संस्कृति से काटना एक साजिश है। इसके बाद उन्हें वास्तविकता का बोध हुआ और उन्होंने घर-वापसी का निर्णय लिया। अपने मूल धर्म और संस्कृति में लौटकर संतोष महसूस कर रहे हैं।

Topics: विविधता में एकताराष्ट्र का निर्माणसांस्कृतिक राष्ट्रवादराष्ट्र को संस्कृतिभौगोलिक और सांस्कृतिक एकताभारत की बहुआयामीसभ्यतागत पहचानमोहनराव भागवतऐतिहासिक और सांस्कृतिकभारत माताएकात्म मानववादअखंड भारत
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