अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बहुत ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं। वह वेनेजुएला पर हमला करके उसके संसाधनों पर कब्जा करने के बाद अब ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते हैं। अपनी इसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए उन्होंने ग्रीनलैंड के लोगों को एकमुश्त पैसे देने की बात कर रहे हैं। मकसद ये है कि वो डेनमार्क से अलग होकर अमेरिका के साथ जुड़ने पर राजी हो जाएं। ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक ओवरसीज टेरिटरी है, जहां सिर्फ 57,000 लोग रहते हैं। कोपेनहेगन और नूक (ग्रीनलैंड की राजधानी) के अधिकारी बार-बार कह चुके हैं कि ग्रीनलैंड बिकने के लिए नहीं है।
ट्रंप की पुरानी और नई बातें
ट्रंप ने लंबे समय से ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की बात की है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से ये बहुत जरूरी है। एयर फोर्स वन में रविवार को उन्होंने रिपोर्टरों से कहा, “हमें ग्रीनलैंड चाहिए, नेशनल सिक्योरिटी के नजरिए से। डेनमार्क ये नहीं कर पाएगा। ये बहुत स्ट्रैटेजिक है।” ट्रंप का मानना है कि यहां खनिज संसाधन हैं, जो एडवांस्ड मिलिट्री टेक्नोलॉजी के लिए काम आ सकते हैं। साथ ही, वेस्टर्न हेमिस्फियर में अमेरिका का प्रभाव बढ़ाने के लिए भी ये महत्वपूर्ण है।
ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी ये बात आई थी, लेकिन अब उनके दूसरे टर्म में चर्चा और तेज हो गई है। व्हाइट हाउस में उनके आने से पहले से ही उनके सहयोगी इस पर विचार कर रहे थे। हाल में वेनेजुएला के नेता निकोलस मदुरो को अमेरिकी ऑपरेशन में पकड़े जाने के बाद ये चर्चा और जोर पकड़ गई है।
पैसे देने का आइडिया
चार सूत्रों के हवाले से खबर है कि व्हाइट हाउस के अधिकारी ग्रीनलैंड के हर व्यक्ति को 10,000 से 1,00,000 डॉलर तक का एकमुश्त भुगतान देने पर बात कर रहे हैं। अगर 1 लाख डॉलर प्रति व्यक्ति हुआ तो कुल लगभग 6 अरब डॉलर बनते हैं। अभी ये साफ नहीं है कि पैसे कब और कैसे दिए जाएंगे, और बदले में क्या उम्मीद की जाएगी। ये आइडिया नया नहीं है, लेकिन हाल में इस पर ज्यादा गंभीरता से बात हो रही है।
एक दूसरा विकल्प कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन (COFA) है, जैसा अमेरिका ने माइक्रोनेशिया, मार्शल आइलैंड्स और पलाऊ जैसे देशों के साथ किया है। इसमें अमेरिका मिलिट्री प्रोटेक्शन और कुछ सर्विसेज देता है, बदले में मिलिट्री एक्सेस और ट्रेड के फायदे मिलते हैं। लेकिन इसके लिए पहले ग्रीनलैंड को डेनमार्क से पूरी तरह अलग होना पड़ेगा।
ग्रीनलैंड और डेनमार्क की प्रतिक्रिया
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन ने फेसबुक पर लिखा, “बस बहुत हुआ। अब एनेक्सेशन की कल्पनाएं बंद करें।” डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ही साफ कह चुके हैं कि वो बिकाऊ नहीं हैं। वाशिंगटन में डेनमार्क या ग्रीनलैंड के दफ्तरों ने पेमेंट वाली चर्चा पर कोई कमेंट नहीं किया। यूरोपीय लीडर्स ने भी नाराजगी जताई। 6 जनवरी 2026 को फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, ब्रिटेन और डेनमार्क ने एक जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया कि ग्रीनलैंड और डेनमार्क का भविष्य सिर्फ उन्हीं पर निर्भर है।
अमेरिका की तरफ से आधिकारिक बयान
व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि ट्रंप और उनके नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर्स “पोटेंशियल परचेज कैसा दिखेगा” इस पर देख रहे हैं। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने कहा कि वो अगले हफ्ते वाशिंगटन में अपने डेनिश काउंटरपार्ट से मिलेंगे और ग्रीनलैंड पर बात करेंगे।
ग्रीनलैंड के लोगों की सोच
सर्वे दिखाते हैं कि ज्यादातर ग्रीनलैंड वाले डेनमार्क से आजादी चाहते हैं, लेकिन अमेरिका का हिस्सा बनना नहीं चाहते। वो आर्थिक रूप से डेनमार्क पर निर्भर हैं, और इंडिपेंडेंस की बहस में आर्थिक चुनौतियां बड़ी हैं।

















