प्राचीन भारत की सभ्यता को केवल अध्यात्म, योग और दर्शन तक ही सीमित नहीं है। भारत की ज्ञान-परंपरा में चिकित्सा विज्ञान, विशेषकर शल्य-चिकित्सा अत्यंत उन्नत, व्यवस्थित विद्या के रूप में विकसित हुई थी। आज जिन शल्य-प्रक्रियाओं को आधुनिक विज्ञान की उपलब्धि माना जाता है, उनकी वैचारिक और व्यावहारिक नींव हजारों वर्ष पूर्व भारत में रखी जा चुकी थी। इस परंपरा के केंद्र में खड़े हैं आचार्य सुश्रुत, जिन्हें विश्व सर्वसम्मति से शल्य-चिकित्सा का जनक तथा नेत्र-शल्य का अग्रदूत माना जाता है।
आयुर्वेद और शल्य-तंत्र
आयुर्वेद को जीवन का विज्ञान कहा गया है, परंपरा के अनुसार यह ज्ञान ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति, अश्विनीकुमारों और फिर धन्वंतरि परंपरा में प्रवाहित हुआ। आयुर्वेद के आठ अंग (अष्टांग आयुर्वेद) बताए गए हैं- काय चिकित्सा, शल्य-तंत्र, शालाक्य-तंत्र (नेत्र-कर्ण-नासिका), कौमारभृत्य, अगद-तंत्र, भूत-विद्या, रसायन और वाजीकरण। इनमें शल्य-तंत्र वह शाखा है जो शस्त्रों, यंत्रों और शल्य-क्रियाओं द्वारा उपचार का विस्तृत विवेचन करती है।
शल्य-तंत्र की परिभाषा (सुश्रुतानुसार)
शरीर में फंसे विदेशी पदार्थ (काष्ठ, अस्थि, लोहे के कण, कील, बाल), मवाद, रक्त, मृत भ्रूण आदि को निकालना; घावों का उपचार; शस्त्र-यंत्रों का प्रयोग; अग्नि-कर्म और क्षार-कर्म, इन सभी का सम्यक ज्ञान शल्य-तंत्र कहलाता है।

सुश्रुत संहिता : संरचना, अध्याय और वैज्ञानिक विस्तार
सुश्रुत संहिता आयुर्वेद का सर्वाधिक वैज्ञानिक शल्य-ग्रंथ है। यह 6 प्रमुख खंडों (स्थानों) में विभक्त है – सूत्र स्थान – शल्य के मूल सिद्धांत, शल्य-नैतिकता, यंत्र-शस्त्र , निदान स्थान – रोग-निदान , शरीर स्थान – शरीर-रचना, भ्रूण-विज्ञान , चिकित्सा स्थान – शल्य एवं अशल्य उपचार , कल्प स्थान – विष-चिकित्सा , उत्तर तंत्र – नेत्र, कर्ण, नासिका, स्त्री-रोग, बाल-रोग। इसमें लगभग 184 अध्याय, लगभग 1120 रोग , 700 औषधीय वनस्पतियां और 125 शल्य-उपकरणों का उल्लेख है।
मानव शरीर रचना की समझ और प्रशिक्षण
सुश्रुत पहले आचार्य थे जिन्होंने मानव शरीर की आंतरिक रचना को शल्य-चिकित्सा का आधार माना। उन्होंने शव-संरक्षण और शव-विच्छेदन की विधि बताई। विद्यार्थियों को पहले फल-सब्ज़ियों, मोम और मिट्टी के पुतलों पर अभ्यास कराया जाता था। इसके बाद शव पर अभ्यास कराकर वास्तविक शल्य-कौशल सिखाया जाता था। यह पद्धति आज की डिसेक्शन और सिमुलेशन ट्रेनिंग की प्राचीन भारतीय रूपरेखा है।
ट्रेपनैशन : खोपड़ी-शल्य की प्राचीन परंपरा
प्राचीन भारत में ट्रेपनैशन—अर्थात् खोपड़ी में छेद कर मस्तिष्कीय दाब या आघात का उपचार—का ज्ञान भी था। हड़प्पा सभ्यता (लोथल, हड़प्पा) से प्राप्त कुछ खोपड़ियों में वर्गाकार या गोल छिद्र पाए गए हैं, जो शल्य-क्रिया के प्रमाण माने जाते हैं। यह दर्शाता है कि सिर की शल्य-चिकित्सा भारत में अत्यंत प्राचीन काल से ज्ञात थी।
अष्टविध शस्त्रकर्म : आठ प्रकार की शल्य-क्रियाएँ
सुश्रुत ने सभी शल्य-क्रियाओं को आठ वर्गों में विभाजित किया, छेदन – काटना , भेदन – चीरा लगाना , लेखन – खुरचना , वेधन – छेद करना , एषण – प्रोब डालना , आहरण – विदेशी पदार्थ निकालना , विस्रावण – द्रव निकालना , सीवन – सिलाई; आधुनिक सर्जरी की लगभग सभी प्रक्रियाएँ इन्हीं श्रेणियों में आती हैं। एक सफल शल्य-क्रिया के लिए सुश्रुत ने कुछ अनिवार्य गुण बताए—स्थिर और दृढ़ हाथ , तीक्ष्ण एवं स्वच्छ शस्त्र , साहस और आत्मसंयम , रोगी के प्रति करुणा , पूर्ण सैद्धांतिक व व्यावहारिक ज्ञान प्रमुख है।
- शल्य-पूर्व, शल्य-काल और शल्य-पश्चात् कर्म
- शल्य-पूर्व कर्म -रोगी को हल्का भोजन / उपवास , शरीर, मुख और मलद्वार की शुद्धि , शस्त्र-यंत्रों की तैयारी , धूपन (नीम, गुग्गुलु, कपूर) द्वारा कीटाणु-नाश और रोगी और परिजनों को रोग-पूर्वानुमान बताना
- शल्य-काल कर्म – उपयुक्त शस्त्र का चयन, आवश्यकता अनुसार निश्चेतना (बेहोशी) ,स्थिर और शीघ्र शल्य-क्रिया
- शल्य-पश्चात् कर्म – घाव की सफाई, औषधीय लेप और पट्टी, ऋतु के अनुसार ड्रेसिंग बदलना, आहार-विहार का नियमन
ऑपरेशन में बेहोशी की प्राचीन विधियां
सुश्रुत और चरक ने शल्य-क्रिया के समय पीड़ा कम करने हेतु मद्यपान, सम्मोहिनी औषधियाँ और भांग या अन्य वनौषधियों का प्रयोग को बताया। राजा भोज की शल्य-क्रिया में मोह-चूर्ण का उल्लेख मिलता है। यह आधुनिक एनेस्थीसिया का आदिम रूप था।
शल्य-सिद्धांतों के व्यावहारिक उदाहरण
अस्थि-भंग मे सुश्रुत के सिद्धांत जैसे आकर्षण (Traction) , संक्षेपण (Reduction) और बंधन (Immobilization) , यही आधुनिक ऑर्थोपेडिक्स में भी यही मूल सिद्धांत हैं। भगंदर, अर्श, उदर रोग में चरणबद्ध शल्य-उपचार और अंतिम विकल्प के रूप में सर्जरी एवं पूर्वानुमान (Prognosis) की स्पष्ट जानकारी होना आवश्यक है। सुश्रुत ने 101–125 यंत्रों का वर्णन किया जिसमे यंत्र (Blunt) – 101 , शस्त्र (Sharp) – 20 , उनका कथन है कि सभी यंत्रों में श्रेष्ठ यंत्र चिकित्सक का हाथ है। यह कथन शल्य-कौशल के महत्व को रेखांकित करता है। सुश्रुत ने ऑपरेशन थिएटर , प्रसूति गृह पोस्ट-ऑप वार्ड के लिए धूपन (Fumigation) का विधान किया। नीम, गुग्गुलु, वचा आदि के प्रयोग से संक्रमण-नियंत्रण का यह सिद्धांत आधुनिक एसेप्सिस का पूर्वरूप है। सुश्रुत ने कठिन रोगों में उपचार से पूर्व परिणाम स्पष्ट करने , कुछ स्थितियों में शल्य-निषेध एवं रोगी की सहमति पर बल देते हैं। यह आधुनिक सूचित सहमति की प्रारंभिक अवधारणा है।
सुश्रुत : अतीत नहीं, आधुनिक चिकित्सा की जीवित चेतना
आज के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो सब कुछ नया है, पर वास्तविकता यह है कि सुश्रुत आज भी जीवित हैं , अपने विचारों, सिद्धांतों और दृष्टि के माध्यम से। आज की सर्जरी में जो प्री-ऑपरेटिव तैयारी, एसेप्सिस, एनाटॉमी का गहन ज्ञान, सूचित सहमति, पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल और नैतिक जिम्मेदारी दिखाई देती है, उसकी जड़ें सुश्रुत संहिता में स्पष्ट रूप से मिलती हैं। आधुनिक एनेस्थीसिया, प्लास्टिक सर्जरी, नेत्र-चिकित्सा, हड्डी जोड़ने की विधियाँ और उपकरणों का वर्गीकरण ये सब सुश्रुत की उसी वैज्ञानिक चेतना के विकसित रूप हैं।
आज भले ही सर्जन के हाथ में रोबोट, लेज़र और माइक्रोस्कोप हों, पर उसकी सोच वही है रोगी की पीड़ा को न्यूनतम करना, जीवन की रक्षा करना और शरीर के साथ-साथ मन का भी उपचार करना। यही सुश्रुत का दर्शन था। आधुनिक चिकित्सा अब फिर से समग्र दृष्टिकोण, पुनर्वास और रोगी-केंद्रित देखभालकी ओर लौट रही है, यह भी सुश्रुत की ही देन है। इस अर्थ में सुश्रुत कोई अतीत का नाम नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना हैं। जब भी कोई सर्जन ऑपरेशन थियेटर में प्रवेश करता है, तो समझिए कि सुश्रुत आज भी जीवित हैं।
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