पाश्चात्य नव वर्ष कैलेंडर का बदलाव है, हिंदू नव वर्ष का आरम्भ नहीं
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पाश्चात्य नव वर्ष कैलेंडर का बदलाव है, हिंदू नव वर्ष का आरम्भ नहीं

हिंदू ज्योतिष में नववर्ष की प्रतिपदा तिथि के वार के आधार पर वर्षेश (राजा) का निर्धारण होता है। इस बार नव वर्ष गुरुवार से आरम्भ हो रहा है, इसलिए इस वर्ष के राजा गुरु (बृहस्पति) होंगे।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Dec 31, 2025, 06:02 am IST
inभारत

पाश्चात्य नव वर्ष केवल दिन-दर्शिका (कैलेंडर) बदलने का संकेत मात्र है। इसका हिंदू नव वर्ष से कोई सम्बन्ध नहीं है। हिन्दू संवत्सर विक्रम संवत् 2082 और शक संवत 1947,चैत्र शुक्ल प्रतिपदा दिनांक 30 मार्च सन् 2025 से प्रारम्भ हुआ था,जो मार्च 2026 तक चलेगा। इसलिए हिंदू नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रम संवत् 2083 तदनुसार 19 मार्च, गुरुवार, सन् 2026 से प्रारंभ होगा। इस वर्ष हिंदू नव वर्ष गुरुवार के दिन आरंभ हो रहा है, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है।

हिंदू ज्योतिष में नववर्ष की प्रतिपदा तिथि के वार के आधार पर वर्षेश (राजा) का निर्धारण होता है। इस बार नव वर्ष गुरुवार से आरम्भ हो रहा है, इसलिए इस वर्ष के राजा गुरु (बृहस्पति) होंगे। वहीं मंत्री पद ग्रहों की विशेष चालों और वार–तिथि संयोग से तय होता है। 2026 में मंगल वर्ष के मंत्री होंगे। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन राजा ग्रह बृहस्पति और मंत्री ग्रह मंगल का संयोग रहेगा, जो समाज, व्यापार, शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों के लिए सकारात्मक उन्नति के संकेत देता है। अतः 1 जनवरी 2026 को कैलेंडर बदलने के अतिरिक्त पाश्चात्य नव वर्ष मनाने का कोई औचित्य नहीं है।

पाश्चात्य नव वर्ष 1 जनवरी 2025 से प्रारंभ हो रहा है। 31 दिसंबर की मध्य रात्रि से ही पार्टी शुरू हो जाती है। मौज-मस्ती, मांस-मदिरा का सेवन, आतिशबाजी भी होती है। हिंदू त्योहारों पर पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वालों की इस पर जुबान बंद हो जाती है।

हिंदू नव वर्ष में शक्ति की उपासना

दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाश्चात्य नव वर्ष का शुभारंभ अवांछनीय कृत्यों से होता है। हिन्दू संस्कृति में चैत्र नवरात्र के पावन और पुनीत अवसर पर हिन्दू नव वर्ष, गुड़ी पड़वा सहित विभिन्न भारतीय पर्वों की महान् श्रृंखला आरंभ होती है। आध्यात्मिक वातावरण में शुचिता के साथ नव संवत्सर प्रारंभ होता है, जिसमें विश्व कल्याण की भावना को लेकर सभी दुर्व्यसनों से मुक्त होकर शक्ति की उपासना की जाती है। भारतीय पंचांग, विश्व के सभी पंचांगों का मूलाधार है।

विक्रम संवत कब से शुरू हुआ

राजा विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांता शकों पर विजय के उपलक्ष्य में ईसा पूर्व सन् 57 में विक्रम संवत् (भारतीय नव संवत्सर) आरंभ किया था, जिसे भारतीय खगोलविदों और वैज्ञानिकों ने विकसित किया था। यह तिथि पत्रक (कैलेंडर) हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होता है।

संवत्सर के प्रकार

12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत् से ही आरंभ हुआ। महीने का लेखा सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम पंचांग (कैलेंडर) की इस अवधारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। संवत्सर के पाँच प्रकार हैं सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास। विक्रम संवत् में सभी का समावेश है। विक्रम संवत के बाद सन् 78 में शक संवत् प्रारंभ हुआ।

सौरवर्ष के माह

वर्ष के पाँच प्रकार होते हैं। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क आदि सौरवर्ष के माह हैं। यह 365 दिनों का है। इसमें वर्ष का प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से माना जाता है। फिर जब मेष राशि का पृथ्वी के आकाश में भ्रमण चक्र चलता है तब चंद्रमास के चैत्र माह का शुभारंभ हो जाता है।

चंद्र वर्ष के माह

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि चंद्रवर्ष के माह हैं। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो चैत्र माह से शुरू होता है। चंद्र वर्ष में चंद्र की कलाओं में वृद्धि हो तो यह 13 माह का होता है। जब चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में होकर शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बढ़ना प्रारंभ करता है तभी से हिंदू नववर्ष का शुभारंभ माना जाता है।

सौरमास, चंद्रमास और नक्षत्रमास

सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं। लगभग 27 दिनों का एक नक्षत्रमास होता है। इन्हें चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा आदि कहा जाता है।वैंसे 88 नक्षत्र हैं परंतु चंद्र पथ पर 27 नक्षत्र ही आते हैं। सावन वर्ष 360 दिनों का होता है। इसमें एक माह की अवधि पूरे तीस दिन की होती है।

संवत्सर का संबंध

ज्योतिष में बृहस्पति और शुक्र ग्रह को मंगल कार्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। संवत्सर का संबंध बृहस्पति ग्रह की गति, राशि परिवर्तन, उसके उदय और अस्त से है। जैसे धरती के 12 मास होते हैं उसी तरह बृहस्पति ग्रह के 60 संवत्सर होते हैं। प्रतिपदा वाले दिन से 60 संवत्सरों में से एक नया संवत्सर प्रारंभ होता है। इसीलिए इसे नव संवत्सर भी कहते हैं।

60 संवत्सर कौन से हैं

संवत्सर अर्थात् बारह महीने की कालविशेष अवधि। बृहस्पति के राशि बदलने से इसका आरंभ माना जाता है। 60 संवत्सरों के नाम इस प्रकार हैं – प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृषप्रजा, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, अव्यय, सर्वजीत, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नंदन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्बी, विलम्बी, विकारी, शार्वरी, प्लव, शुभकृत, शोभकृत, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्ल्वंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत, परिधावी, प्रमादी, आनंद, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्रि, दुर्मति, दुन्दुभी, रूधिरोद्गारी, रक्ताक्षी, क्रोधन और अक्षय।

बृहस्पति ग्रह का प्रभाव

बृहस्पति ग्रह के वर्षों के आधार पर युगों के नाम सूर्य सिद्धान्त के अनुसार संवत्सर बृहस्पति ग्रह के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं। 60 संवत्सरों में 20 -20-20 के तीन हिस्से हैं जिनको ब्रह्माविंशति (1-20), विष्णुविंशति (21-40) और शिवविंशति (41-60) कहते हैं। बृहस्पति की गति के अनुसार प्रभव आदि साठ वर्षों में बारह युग होते हैं तथा प्रत्येक युग में पांच-पांच वत्सर होते हैं। बारह युगों के नाम हैं– प्रजापति, धाता, वृष, व्यय, खर, दुर्मुख, प्लव, पराभव, रोधकृत, अनल, दुर्मति और क्षय। प्रत्येक युग के जो पांच वत्सर हैं, उनमें से प्रथम का नाम संवत्सर है। दूसरा परिवत्सर, तीसरा इद्वत्सर, चौथा अनुवत्सर और पांचवा युगवत्सर है। 12 वर्ष बृहस्पति वर्ष माना गया है। बृहस्पति के उदय और अस्त के क्रम से इस वर्ष की गणना की जाती है। इसमें 60 विभिन्न नामों के 361 दिन के वर्ष माने गए हैं। बृहस्पति के राशि बदलने से इसका आरंभ माना जाता है।

हिंदू नव वर्ष की भावना

विक्रम संवत में नववर्ष की शुभारंभ चंद्रमास के चैत्र माह के उस दिन से होता है जिस दिन ब्रह्म पुराण अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। इस दिन को ही सतयुग का प्रारंभ, भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार, नवरात्र का आरंभ, भगवान् राम का राज्याभिषेक के, दिन के रुप में शिरोधार्य किया गया है। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है। ज्योतिषियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ माना जाता है, क्योंकि चैत्र मास की पूर्णिमा का अंत चित्रा नक्षत्र में होने से इस चैत्र मास को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है।रात्रि के अंधकार में नव संवत्सर का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूर्य की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। नववर्ष के ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण कर दिया जाता है। घर को ध्वज, पताका और तोरण से सजाया जाता है। शुभ कार्यों और नवीन योजनाओं का क्रियान्वयन होता है। प्रत्येक हिन्दू,विश्व कल्याण की भावना के आलोक में नव संवत्सर की बधाईयाँ प्रेषित करता है। हिन्दू नव संवत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रम संवत 2083 तदनुसार 19 मार्च सन् 2026 से प्रारंभ होगा।

 

Topics: हिंदू नव वर्षविक्रम संवतपाश्चात्य नव वर्ष1 जनवरी 2026क्या है नया सालसंवत्सर क्या है
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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