समय, ब्रह्मांड की सबसे गहन और जटिल अवधारणाओं में से एक है। आधुनिक विज्ञान ने इसे स्पेस के साथ जोड़कर समझा, वहीं भारत ने हजारों वर्ष पहले दार्शनिक, खगोलीय और गणितीय आधार पर समय को परिभाषित कर दिया था। मध्य प्रदेश की पावन नगरी उज्जैन में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ इसी प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा के पुनर्स्मरण और पुनर्स्थापन का प्रयास है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस तरह के आयोजन का निर्णय कर भारत की वैज्ञानिक चेतना को वैश्विक मंच पर पुनः स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक पहल की है।
विज्ञान, खगोल और चिंतन की भूमि उज्जैन
उज्जैन को धर्म और आस्था की नगरी के रूप में देखा जाता है, किंतु काल की दृष्टि से देखें तो इसका वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक नजर आता है। यह वह भूमि है जहां विज्ञान, गणित, खगोल और ब्रह्मांडीय चिंतन का अद्भुत संगम सदियों से होता रहा है। इसी कारण प्राचीन भारतीय परंपरा में उज्जैन को कालगणना का केंद्र माना गया। उज्जैन ही वह धरा है जहां सूर्य की छाया के माध्यम से समय मापने की सटीक पद्धति विकसित की गई थी। देखा जाए तो यह तथ्य इस बात को भी स्थापित करता है कि भारत में ‘समय’ को वैज्ञानिक रूप से मापा और व्यवस्थित किया गया।
शून्य देशांतर रेखा का केंद्र उज्जैन
इससे जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ भी यही बताते हैं कि जब पश्चिमी दुनिया खगोल विज्ञान की प्रारंभिक अवस्थाओं में थी, तब भारत के विद्वान नक्षत्रों की गति, ग्रहों की स्थिति और कालगणना की जटिलताओं को सटीकता के साथ समझ चुके थे। उस समय उज्जैन को शून्य देशांतर रेखा का केंद्र माना जाता रहा, जोकि आज के ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी) की अवधारणा से कहीं पहले अस्तित्व में था। निश्चित ही यह भारतीय वैज्ञानिक परंपरा की श्रेष्ठता का स्पष्ट प्रमाण है कि हमने समय को वैश्विक मानक के रूप में स्थापित करने का प्रयास सदियों पहले ही कर लिया था।
डोंगला क्षेत्र में 21 जून को छाया नहीं पड़ती
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस सम्मेलन में जिस प्रकार समय और ब्रह्मांड के संबंध को शिव के ‘महाकाल’ स्वरूप से जोड़ा, वह भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराई को दर्शाता है। विज्ञान कहता है कि समय और अंतरिक्ष एक-दूसरे से अविभाज्य हैं और हमारे शास्त्रों में शिव को ‘महाकाल’ के रूप में दर्शन कराकर इसी सत्य को हजारों वर्ष पहले स्थापित भी किया गया। यह शिव के प्रति आस्था के साथ एक गहन वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, जिसमें कि ‘समय’ को एक व्यापक ब्रह्मांडीय संदर्भ में देखा गया है। उज्जैन के समीप स्थित डोंगला क्षेत्र इस वैज्ञानिक विरासत का आज जीवंत उदाहरण है। यहां पर 21 जून को सूर्य की छाया का शून्य हो जाना यह दर्शाता है कि यह स्थान खगोलीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जीएमटी की जगह एमएसटी
अब बात ग्रीनविच मीन टाइम की करते हैं, वस्तुत: इसे आज वैश्विक समय मानक माना जाता है, वास्तव में यह एक भौगोलिक और औपनिवेशिक संदर्भ का परिणाम है। इसके विपरीत, भारतीय कालगणना प्रणाली भौगोलिकता के साथ ही खगोलीय और दार्शनिक आधार पर निर्मित हुई है। यही कारण है कि ‘महाकाल स्टैंडर्ड टाइम’ (एमएसटी) की अवधारणा एक तार्किक और वैज्ञानिक प्रस्ताव के रूप में सामने आती है। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा एमएसटी को जीएमटी के स्थान पर स्थापित करने का प्रस्ताव इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
उनका यह कहना कि आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी उज्जैन को कालगणना का मूल केंद्र मानती है, इस बात का संकेत है कि भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिकता आज भी प्रासंगिक है। यह वर्तमान और भविष्य की आवश्यकता है। इस मत पर संत समाज का समर्थन भी मिला है जो यह बताता है कि भारतीय सनातन परंपरा में समय भौतिक इकाई के साथ ही आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय तत्व के रूप में मौजूद है।
कालगणना के वैज्ञानिक पक्ष से अवगत कराएं
यह दृष्टिकोण आधुनिक विज्ञान के उस सिद्धांत के अनुरूप है, जिसमें समय को एक आयाम के रूप में समझा जाता है, इसलिए उज्जैन को ‘साइंस सिटी’ के रूप में विकसित करने की मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की योजना इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यदि यहां खगोल विज्ञान, गणित और अंतरिक्ष अनुसंधान के आधुनिक केंद्र स्थापित होते हैं, तो यह क्षेत्र भारत के वैज्ञानिक विकास को गति देने के साथ ही विश्व को भी भारतीय ज्ञान परंपरा से परिचित कराएगा। आनेवाले “सिंहस्थ” के अवसर पर श्रद्धालुओं को यदि महाकाल दर्शन के साथ-साथ कालगणना के इस वैज्ञानिक पक्ष से भी अवगत कराया जाए, तो निश्चित ही सभी आगन्तुकों के लिए यह एक अद्वितीय अनुभव होगा।
कालगणना भारत की महान वैज्ञानिक विरासत
अब इस संदर्भ में यही कहना है कि भारत की कालगणना प्रणाली हमारी महान वैज्ञानिक विरासत है, जिसे पुनः स्थापित करने की वैश्विक आवश्यकता है। उज्जैन की भूमि से उठी यह पहल निश्चित ही आनेवाले समय में भारत के वैज्ञानिक स्वाभिमान को पुनर्जीवित करेगी और विश्व को बताएगी कि ‘समय’ (काल) को समझने का भारतीय दृष्टिकोण कितना व्यापक और गहन है! मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का धन्यवाद इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने एक ऐसे विषय को केंद्र में लिया, जोकि हमारी पहचान, हमारी वैज्ञानिक विरासत और हमारे भविष्य तीनों से जुड़ा हुआ है। ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ वास्तव में एक ऐसा विचार है जो हमें अपने अतीत पर गर्व करने का अवसर प्रदान करता है।

















