‘संघ प्रथम दिन से भेदभाव रहित है’
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RSS के 100 साल : ‘संघ प्रथम दिन से भेदभाव रहित है’

सागर मंथन सुशासन संवाद-4 के एक सत्र को रा.स्व.संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख श्री प्रदीप जोशी ने संबोधित किया और संघ शताब्दी वर्ष पर अपने विचार साझा किए

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 29, 2025, 03:43 pm IST
in विश्लेषण, संघ @100, गोवा, पाञ्चजन्य इवेंट
ा.स्व.संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख श्री प्रदीप जोशी

ा.स्व.संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख श्री प्रदीप जोशी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। संघ से अधिक इसके विरोधियों ने इसकी छवि बनाई है, जिन्होंने संघ को न देखा, न समझा, न पढ़ा, न अनुभव किया। एक विदेशी लेखक ने तर्क देते हुए लिखा है, ‘‘आरएसएस को समझना कठिन है, लेकिन गलत समझना आसान।’’

हमारा देश पुरातन संस्कृति के लिए जाना जाता है। मानव विकास और समाजोत्थान में हमारा महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये विशेषताएं लंबे समय से हमारे स्वभाव में रची-बसी हैं। संक्षेप में, भारत का मूल विचार अध्यात्म का विचार है। हमारे इतिहास, पुराणों और आधुनिक काल में सबमें यही केंद्र बिंदु दिखता है। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षिक, युद्धनीति या राजनीति-इन सबके बीच अध्यात्म ही मूल आधार रहा।

अध्यात्म हमारी विशेषता रही है। यहां ऐसा समाज रहा, जिसे हिंदू नाम से जाना गया। इसलिए सुख-दुख, जय-पराजय, उत्थान-पतन में भारत का व्यक्तित्व हिंदू से जुड़ गया। यहां के समाज ने अपनी संस्कृति, जमीन और समाज से प्रेम किया। इससे संस्कृति-सभ्यता राष्ट्रीयता बनी, और भारत की राष्ट्रीयता हिंदुत्व बन गई। यह प्राचीन काल से चला आ रहा है। संघ केवल इसका उल्लेख कर रहा है। साधु-संत, ऋषि-मुनि, परिव्राजक-सन्यासियों ने इसे आगे बढ़ाया। उपनिषद्, पुराण और उनकी कथाओं में यही प्रवाह दिखता है-भारत और अध्यात्म के विचार को जीवंत रखने का प्रयास।

संघ का ध्येय

भारत का व्यक्तित्व हिंदू है। इसकी राष्ट्रीयता हिंदुत्व पर आधारित है। यह प्राचीन प्रवाह है, जिसे स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद, स्वामी दयानंद, महात्मा गांधी, वीर सावरकर, लोकमान्य तिलक, धर्मपाल और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जैसे महानुभावों ने आगे बढ़ाया। संघ उसी कड़ी का संगठन है। यह किसी प्रतिक्रिया, विरोध या रिएक्शन में नहीं खड़ा हुआ, बल्कि देश के लंबे ध्येय को आगे ले जाने वाला संगठन है। संघ के संस्थापक ने तो इस विषय में शायद अधिक कहा होगा, लेकिन हमारे पास कुछ नहीं है। बस थोड़े-बहुत पत्र व्यवहार हैं। लेकिन संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी ने इसे परिभाषित किया। उन्होंने कहा, ‘‘प्रत्येक देश का कोई न कोई ध्येय होता है। भारत का ध्येय है-मानव एकता और विश्व कल्याण।’’ यही संघ का ध्येय है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम्’ हमारा उद्घोष है। उदाहरण के लिए, इतिहास में भगवान बुद्ध ने लंबे कालखंड में भारतीय संस्कृति को विश्व तक पहुंचाया। कई देशों में बौद्ध विचारों का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। एक लेखक ने बुद्ध के यश के चार कारण बताए हैं-

1. धर्म तत्व को व्यवहारिक रूप देना। तत्व को समझाना कठिन है, बुद्ध ने उसे व्यावहारिक बनाया।
2. स्वयं आदर्श बनना अर्थात् दूसरों को न कहकर खुद उदाहरण प्रस्तुत किया।
3. अखंड परिश्रम-सतत प्रयास की पराकाष्ठा।
4. लोकलाइजेशन, यानी स्थानीय भावनाओं को समझकर संगठन चलाना।

ये चार ‘कुंजियां’ संघ की यात्रा में भी दिखती हैं। संघ ने तत्व को व्यवहार से जोड़ा और उदाहरण बनाया। संघ ने लोकलाइजेशन का प्रयास किया और अथक परिश्रम को अपनी इकाई बनाया। परिणामस्वरूप, देश में 47,000-48,000 मंडल, 70-80 प्रतिशत बस्तियों में पहुंच और 70,000 स्थानों पर 1,14,000 शाखाएं-मिलन चल रहे हैं। संघ की 100 वर्ष की यात्रा विचार की यात्रा है-हिंदुत्व की। भारत का मूल विचार हिंदुत्व है। पहले इसे मानव, मानवधर्मी, सनातन या आर्य कहा गया। आज हिंदू कहते हैं। सर्वसमावेशक, सर्वव्यापी, सार्वकालिक, सार्वभौमिक हिंदुत्व की विशेषताएं हैं। संघ भी सर्वस्पर्शी,सार्वकालिक, सार्वभाैमिक, सबका हितैषी और सर्वव्यापी है। इसीलिए इसकी विकास यात्रा हिंदुत्व के साथ चलती है।

विश्वास की यात्रा

आज संघ हिंदुओं का बड़ा प्रतिनिधि और समाज की आवाज बन गया है। 100 वर्ष की यात्रा में इसका चतुष्कोणीय विकास हुआ-
1. शाखा द्वारा स्वयंसेवक निर्माण- शाखा से अनुभव मिलते हैं, विचार मजबूत होते हैं।
2. विविध संगठन- विद्यार्थी, मजदूर, किसान, प्रज्ञा, भाषा, विज्ञान आदि क्षेत्रों में विचार-आधारित संगठन।
3. सेवा कार्य- समाज के दुख दूर करने और समस्या का समाधान देने के लए सेवा उपक्रम शुरू हुए।
4. सज्जन शक्ति- अनेक अभियानों के जरिये हम लोगों के पास गए, जिससे बाहरी लोग जुड़े, जिन्हें लगा ‘यह हमारा विचार है।’

परिणामत: संघ की यात्रा केवल संघ की नहीं, लोक यात्रा बन गई। संगठन होने के नाते यह शक्ति बन गया और संगठन में ही शक्ति है। इस शक्ति के कारण समाधान के मार्ग स्वयं खुल जाते हैं। नित्य शक्ति (रोज काम करने वाले लाखों स्वयंसेवक) से नैसर्गिक आपदाओं, मानव-निर्मित संकटों, देश में परकीय आक्रमणों, अस्थिरता और वैचारिक आघातों में स्वयंसेवक खड़े दिखते हैं। वे समाज को साथ लेकर शक्ति यात्रा बनाते हैं। जहां संघ है, वहां अराष्ट्रीय शक्तियां पैर नहीं जमा सकतीं, देश-समाज विरोधी विमर्श नहीं चल सकता। सबसे बड़ी बात, संघ की 100 वर्ष की यात्रा विश्वास की यात्रा है। संघ राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर समाज की जड़ों तक पहुंचकर समस्याओं का समाधान करता है।

संघ ने अपने प्रयत्नों से यश प्राप्त किया है। पूर्वोत्तर में 60-70 साल पहले माहौल बेहद चुनौतीपूर्ण था, प्रधानमंत्री और सरकार के बारे में अपशब्द कहते जाते थे। अंतरराष्ट्रीय ताकतें वहां राजनीतिक समीकरण तय कर रही थीं। आईएसआई, चीन, अमेरिका आदि क्षेत्रीय-राष्ट्रीय विषयों पर सक्रिय रहते थे, पर स्वयंसेवकों ने समाज को एक साथ लेकर राष्ट्रीयता का स्वर मुखर किया। संघ है, मतलब देश सुरक्षित है। जहां संघ है, वहां समरसता है और अंतिम व्यक्ति की कुछ न कुछ सहभागिता के प्रयास हो रहे हैं। 100 साल की यात्रा में संघ ने ऐसे अनेक प्रयत्न किए हैं, जो हमारे सामने स्पष्ट दिखते हैं। यह यात्रा चार प्रकार के मार्ग पर केंद्रित है- विचार-यात्रा, लोक-यात्रा, शक्ति-यात्रा और विश्वास-यात्रा।

भेदभाव मुक्त संगठन

हमारे समाज में ऊंच-नीच का चक्र चला, अपने भाइयों को अछूत मानने लग गए। संघ ने प्रथम दिन से ऐसे भेदभाव को अपनी रचना में आने ही नहीं दिया। इसकी कार्यपद्धति और कार्यक्रम भेदभाव-रहित हैं। धीरे-धीरे स्वयंसेवकों का निर्माण करते हुए संघ ने समाज की समस्याओं के समाधान के लिए हाथ बढ़ाया। संघ अन्याय के शिकार व्यक्ति के पीछे खड़ा होता है। आज पूज्य सरसंघचालक जी का ‘एक मंदिर, एक तालाब, एक श्मशान’ इसी हिंदू चिंतन का विस्तार है। हमारे जनजातीय क्षेत्र चुनौतीपूर्ण रहे, विशेषकर ब्रिटिश काल में इन्हें समाज के विरुद्ध खड़ा करने के बड़े षड्यंत्र हुए, सिद्धांत, थ्योरीज, न्याय व्यवस्था और नियम-कानून बनाकर। इसके कारण उनमें अलग प्रकार का स्वभाव विकसित हो गया। स्वयंसेवकों ने जनजातीय क्षेत्रों में बड़े काम किए।

आज लगभग 80,000 गांवों में राष्ट्रीय विषयों का स्पर्श हो रहा है। सेवा कार्य के माध्यम से स्वयंसेवक समाज को जोड़ रहे हैं। लड़ाई अब स्वावलंबन, स्वधर्म-अभिमान, अस्मिता जागरण और स्वधर्म को बचाने की है। पूर्वोत्तर में 90 प्रतिशत से अधिक पूर्णकालिक स्वयंसेवक स्थानीय हैं, जिसमें लगभग 70 प्रतिशत मातृशक्ति हैं जो कहती हैं, ‘यह समाज का काम है, हम करेंगे।’ इस प्रकार जनजातीय क्षेत्रों में संघ ने मानस परिवर्तन का बड़ा प्रयास किया है। कुल मिलाकर संघ के प्रयासों से स्वावलंबन, स्वाभिमान, स्वधर्म-अस्मिता जागरण के साथ राष्ट्रीय पहचान और सहभागिता बढ़ी है। संघ ने सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षिक तथा समाज जीवन के हर क्षेत्र में स्वयंसेवकों की मदद से मुगल-ब्रिटिश काल के अवरोध हटाकर मूल संस्कृति को पुनर्स्थापित किया। परिणाम: स्वयंसेवकों के प्रयासों से समाज के हर क्षेत्र-न्याय व्यवस्था, संस्कृति, कला, सिनेमा, विमर्श, इतिहास में अपनी परिभाषाएं बनीं। पूर्व काल से जोड़ने के बड़े प्रयास हुए। अनेक क्षेत्रों में स्वयंसेवक अनूठे उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं और समाज को ऊंचाई पर ले जा रहे हैं।

संघ कार्य और लक्ष्य

संघ समाज के लिए क्या सोचता है? इस संबंध में दो मुख्य बातें हैं-विस्तार और गुणवत्ता। यह संघ की लंबी यात्रा का मूल आधार रहा है। क्वांटिटी और क्वालिटी दोनों बढ़ानी है। संघ यह नहीं कहता कि हम बहुत जगह पहुंच गए हैं। यह कहता है कि अभी बहुत जगह पहुंचना बाकी है। इसलिए शताब्दी वर्ष में संघ ने दो बड़े लक्ष्य रखे हैं-विस्तार और विकास। राष्ट्र निमार्ण के लिए व्यक्ति निर्माण, शाखा, मिलन, वर्ग बैठक के जरिये स्वयंसेवक निर्माण जारी रहेगा।

शताब्दी वर्ष में संघ तीन प्रमुख काम कर रहा है- सामाजिक परिवर्तन, गृह संपर्क अभियान और शताब्दी कार्यक्रम। इसमें सामाजिक परिवर्तन महत्वपूर्ण है। इसमें पांच चीजों (पंच परिवर्तन) का आग्रह है-परिवार प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वबोध और नागरिक कर्तव्य। ये सरल लगते हैं, पर समाज की मूल शक्ति के स्रोत हैं। इनसे जुड़ने पर देश समर्थ बनेगा, ताकत बढ़ेगी। परिवार सशक्त रहेगा तो आने वाले आक्रमणों का सामना कर सकेंगे। हमारी एकता, अखंडता बनी रहेगी और समरसता से भेदभाव करने वाले समाज को तोड़ नहीं पाएंगे। इसी तरह स्व की शक्ति से देश आगे बढ़ेगा और नागरिक कर्तव्य समाज में कर्तव्य का भाव जाग्रत करेगा। संविधान में भी कर्तव्य पहले और अधिकार बाद में आता है। पंच परिवर्तन से समाज में बदलाव की अपेक्षा है। इसमें स्वयंसेवकों का सहयोग रहेगा।

भारत 75 वर्षों में तेजी से विकसित हो रहा है, विशेषकर गत 15-20 वर्षों में। शत्रु (परदेशी/घरेलू) ने वैचारिक स्तर पर लड़ाई छेड़ दी है। इसलिए संघ का दूसरा प्रमुख काम है विमर्श की लड़ाई, जिसे समाज के साथ मिलकर लड़ना है। केवल हथियार संपन्न होने से काम नहीं चलेगा, वैचारिक अस्त्र भी जरूरी है। शत्रुओं के इकोसिस्टम या टूलकिट विश्वव्यापी स्तर पर मानसिकता बदलने का दबाव डालते हैं। जैसे-पहलगाम आतंकी हमले के बाद जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चला तो देश-विदेश में आवाज उठी- ‘युद्ध क्यों? हमारा देश शांति का पक्षधर है।’ तीसरा प्रमुख काम है सज्जन शक्ति को जोड़ना। समाज में सकारात्मक, रचनात्मक शक्ति प्रचुर है। संघ-सामाजिक प्रयास से सबको जोड़कर देश को आगे बढ़ाना होगा। यही देशभक्ति है।

वैश्विक चुनौती और भारत

हमारा समाज अपनत्व पर आधारित रहा है। यही हिंदुत्व को सदैव वैश्विक बनाता है। दुनिया इसके लिए लालायित है, हमसे बड़ी अपेक्षा रखती है। विश्व आर्थिक इतिहास में भारत का उल्लेख प्रमुख है। आज हम दूसरे देशों के उपग्रह प्रक्षेपित कर रहे हैं, वैक्सीन बना रहे हैं। जीडीपी में बड़ा योगदान देकर वैश्विक हलचल पैदा की है। यह प्रेरणा और विचार-व्यवहार का प्रमाण है कि हम सदैव वैश्विक रहे। आज दुनिया के सामने दो बड़ी समस्याएं हैं। पहली, सभ्यतागत संघर्ष जिसमें समाजों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने वाली लंबी लड़ाइयां हैं। वर्तमान में 5-6 युद्ध चल रहे हैं, कुछ 10 साल पहले समाप्त हुए। इसमें लाखों लोग मारे गए, करोड़ों का नुकसान हुआ और वहां की सभ्यताएं बाधित हुईं। दूसरी समस्या है-उपभोक्तावाद। बाजारू शक्ति ने दुनिया को बाजार बना दिया। शस्त्र से कॉस्मेटिक्स तक हर क्षेत्र में यह वृत्ति फैला रही है। इन संकटों का हल भारत के पास है। हमारे पास अनुभव, शक्ति और व्यवहार करने वाला बड़ा वर्ग है, दुनिया भी राक्षसी शक्तियों से बचाव के लिए इसी पर विचार कर रही है।

संघ के संस्थापक ने 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता के साथ पूंजीवाद की गुलामी से विश्व को मुक्त करने का प्रस्ताव दिया था। संघ चाहता है कि भारत विश्व का नेतृत्व करे। स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद जैसे मनीषियों की भी यही इच्छा थी। आज भारत फिर से पुनरुत्थान की दिशा में जा रहा है तो इस गति-शक्ति को कायम रखना समाज का दायित्व है। बदलाव की घड़ी में थोड़ा हटकर विचार करना होगा, तभी हम देश को तीसरी आर्थिक महाशक्ति बना सकेंगे। इसके लिए नई सोच, व्यवहार, उद्यम-प्रेरणा, टेक्नोलॉजी बदलनी होगी। नई तकनीक (एआई, रोबोटिक्स, क्वांटम, ड्रोन) अपनानी होगी। संघ शताब्दी वर्ष में वैश्विक भावना के नाते यही अपेक्षा करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो वर्ष पूर्व पंच प्रण का संकल्प दिलाया था, जिसमें विकसित भारत का निर्माण, गुलामी मानसिकता से मुक्ति, विरासत पर गर्व करना, एकता-एकजुटता को सशक्त करना और नागरिक कर्तव्य को सर्वोपरि रखना शामिल है। ये संकल्प 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का रोडमैप हैं। संघ वैश्विक भावना बढ़ाकर भारत निर्माण करना चाहता है।

 

Topics: सर्वसमावेशक संस्कृतिहिंदुत्वभारत का व्यक्तित्वसमरसतामानव विकास का आधारविश्व कल्याण'एक मंदिरपाञ्चजन्य विशेषएक तालाबसंघ शताब्दी वर्षएक श्मशान'भारत की राष्ट्रीयताअस्मिता जागरणस्वधर्म-अभिमानसंगठन और विचारधारासर्वे भवन्तु सुखिनः'100 वर्ष की यात्रामूल विचार
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