सागर मंथन मात्र एक शब्द नहीं, एक प्रक्रिया है जिसमें विष और अमृत दोनों निकलते हैं। विष को, इसमें निहित आशंकाओं और संकटों को समय रहते समझना, समाज व राष्ट्र जीवन को गति, उत्साह और सकारात्मकता देने वाले ‘अमृत तुल्य’ विचारों को लेकर आगे बढ़ना, ‘पाञ्चजन्य’ के सागर मंथन कार्यक्रम का यही तो उद्देश्य है। गोवा के तट पर 24 दिसंबर को आयोजित सागर मंथन सुशासन संवाद 4.0 ने इसे फिर से सिद्ध किया।
केवल राजस्व केंद्रित मीडिया नहीं, बल्कि समाज हित में बड़े और चुनौती पूर्ण कार्यों को हाथ में लेना, समाज प्रबोधन से भविष्य के विमर्शों की दिशा और गति तैयार करना-यह ‘पाञ्चजन्य’ की परंपरा रही है।
जैसे-स्वतंत्रता के बाद जब पत्रकारिता की मशाल मद्धम हो गई, तब पं. दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे नई ऊर्जा दी। 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार होने के बावजूद ‘पाञ्चजन्य’ ने कभी सरोकारों से समझौता नहीं किया। आज डिजिटल माध्यम से यह लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच रहा है। नई पीढ़ी से संवाद करते ‘नव्या’ या ‘आरम्भ’ जैसे एनिमेटेड किशोर अवतार या संवाद क्रांति के अगले चरण के लिए AI की शक्ति से लैस होता ‘कच्छप अवतार’ जय (J-AI), समय के साथ युगानुकूल विस्तारित होती पाञ्चजन्य की इस यात्रा के ध्वजवाहक हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (जो ‘पाञ्चजन्य’ के प्रथम संपादक भी थे) की जन्मशती और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में यह आयोजन विशेष महत्व रखता है।
विचार मंथन, प्रबोधन से लेकर गोवा की मूल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तक इस कार्यक्रम का विविधतापूर्ण विस्तार था। सुशासन, आर्थिक-सामाजिक विकास, अंत्योदय, भाजपा संगठन, संघ व हिंदू समाज के लिए भविष्य दृष्टि, कट्टरता के कारण-निराकरण और इस्लाम की अन्तर्धाराओं तक बहुआयामी विमर्श इस मंच से हुआ।
भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष ने पार्टी के क्रमबद्ध विकास के सूत्र साझा किए। उन्होंने जिस प्रकार स्पष्टता के साथ पार्टी के नेतृत्व में सत्ता संभाल रहे राजग द्वारा देशहित के कार्यों के प्रतिसाद को सामने रखा, उससे अनेक प्रकार की शंकाओं का सहज निवारण हुआ। उन्होंने संघ और पार्टी के बीच समन्वय के सूत्रों और विचारधारा को लेकर अनेक बिंदुओं पर खुलकर और किसी भी मीडिया मंच पर पहली बार चर्चा की।
वहीं, बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने मजहब के नाम पर देश के संविधान और कानून तक को ताक पर रखने वाली मानसिकता का बारीकी से विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि कुरान तक में लिखा है, ‘जिस देश में रहो, उसके कानून को मानो। उसे तोड़ने का हक कुरान ने नहीं दिया है। ’
रा.स्व. संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी ने संघ शताब्दी वर्ष पर संघ की सौ वर्ष की यात्रा के पड़ावों का विस्तार से वर्णन किया और भविष्य के लक्ष्यों पर अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि डॉ. हेडगेवार ने हिंदू समाज को एकजुट करने का जो मंत्र दिया था, संघ आज भी उसी मार्ग का अनुसरण कर रहा है। संघ ने शुरू से ही जाति भेद रहित समाज की निर्मिति पर बल दिया है, इसलिए संघ में जाति भेद जैसा कुछ भी नहीं है।
चतुर्थ सत्र में पीएचडी चैंबर के महासचिव रंजीत मेहता ने आंकड़ों से भारत की उन्नति दिखाई। यह चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जल्द तीसरी आर्थिक महाशक्ति बनेगी, जर्मनी को पछाड़ते हुए। भारत के तेज कदमों पर विश्व का अचंभित होना आत्मनिर्भर भारत का प्रमाण है।
समापन सत्र में गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने राज्य के विकास, पारदर्शिता और नागरिक सकारात्मक बदलावों पर प्रकाश डाला और बताया कि गोवा अन्य राज्यों से आगे है, जो सुशासन की मिसाल है। यह संवाद ‘पाञ्चजन्य’ की भावना का प्रतीक है, जो कहती है कि सरकारें बदलें, सरोकार अटल रहें। हिंदू समाज की एकजुटता, सुशासन और राष्ट्रीय उत्थान के बीच संतुलन स्थापित करता यह मंथन समाज को दिशा देगा। संघ शताब्दी में यह अमृत तुल्य संकल्प है कि समस्त बाधाओं और विषैले षड्यंत्रों को परास्त करते हुए राष्ट्र निर्माण का यह यज्ञ जारी रहेगा।
…और ‘पाञ्चजन्य’!
उसे तो कठिन संकल्पों की इस यात्रा में सत्य का शंखनाद करते ही रहना है।
















