बदजुबानी पर राष्ट्राध्यक्ष की चिंता: पीएम मोदी का संदेश और सांस्कृतिक संकट
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बदजुबानी पर राष्ट्राध्यक्ष की चिंता: पीएम मोदी का संदेश और सांस्कृतिक संकट

सत्य बोलो और प्रिय बोले पर ऐसा सत्य न बोलो जो दूसरे को पीड़ा दे। कहने का भाव अपनी संस्कृति में मधुरवाणी  को सत्य से भी ऊंचा स्थान मिला है

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Aug 1, 2026, 02:06 pm IST
inभारत
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

जंतर-मंतर के कुछएक प्रदर्शनकारियों की हरकत ने हर नागरिक को झकझोरा है और सोचने पर विवश किया है कि आखिर हमारी पीढ़ी किस ओर जा रही है? असल में समाज में यह वैचारिक पतन अचानक नहीं आया। राजनीति में तू-तड़ाक की भाषा सामान्य हो गई है और समाज में गाली-गलौच। सोशल मीडिया ने बकवास को भाषणकला के रूप में पेश करना शुरू कर दिया तो ओटीटी प्लेटफार्मों पर आने वाली फिल्मों में माँ-बहन की गालियां सामान्य हो गईं।

जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध-प्रदर्शन के दौरान अपशब्दों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वीडियो संदेश जारी करना पड़ा। पीएम मोदी ने इन गालियों पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने गुमराह बच्चों को सही राह दिखाने, समझाने और माफ करने की अपील की है।

हमारे महापुरुषों ने कहा है कि ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय…देववाणी संस्कृत में ‘भाषण’ और ‘भषण’ के अंतर को स्पष्ट रूप से समझाया है। ‘भाषण’ का अर्थ है बोलने या संवाद की कला और ‘भषण’ का अर्थ है ‘भौंकना’। अपने यहां कहा गया है कि –

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्म: सनातन:॥

अर्थात सत्य बोलो और प्रिय बोले पर ऐसा सत्य न बोलो जो दूसरे को पीड़ा दे। कहने का भाव अपनी संस्कृति में मधुरवाणी  को सत्य से भी ऊंचा स्थान मिला है। स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि ‘बिना संस्कारों से बच्चों को शिक्षित करना अत्यंत खतरनाक हो सकता है। क्योंकि संस्कारों के बिना मिला ज्ञान उस तलवार की भांति होगा जो सामने वाले के साथ-साथ खुद उसके हाथों को भी जख्मी कर देगा।’ शायद कहीं न कहीं हम सुख-सुविधा को ही बच्चों की परवरिश मानने लगे और उन्हें संस्कार देने में लापरवाही बरती।

हैरानी उन बुद्धिजीवियों की सोच पर भी होती है जो इन वाचाल युवाओं की बदजुबानी को सामान्य लोकजीवन का हिस्सा बता कर इसे न्यायसंगत ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। रोचक बात है कि इन बुद्धिजीवियों की नजरों में युवाओं की गालीगलौज तो सामान्य बात है परंतु जब सांसद कंगना रनौत ने इस तरह की जनेरेशन-जी को जनरेशन गटर बताया तो सभी उस सांसद पर वैचारिक हमला करने लगे।

कैसे दोहरे मापदण्ड है इन बुद्धिजीवियों की नैतिकता के?

एक राष्ट्राध्यक्ष होते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश का ध्यान इस ओर खींच कर अपने सामाजिक व नैतिक दायित्व का निर्वहन किया है। अब जिम्मेवारी बनती है हर अभिभावक, अध्यापक और हर उस व्यक्ति की जो किसी न किसी रूप में समाज प्रबोधन का हिस्सा बनते हैं। वाचाल युवाओं को दण्ड देने से नहीं बल्कि उन्हें भषण और भाषण का अंतर समझाने से ही इस समस्या का स्थायी हल निकल पाएगा।

Topics: गाली गलौजजंतर मंतर प्रदर्शनबदजुबानीपीएम मोदी संदेशसांस्कृतिक आघात
राकेश सैन
राकेश सैन
वरिष्ठ पत्रकार। पंजाब के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। [Read more]
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