अरबों वर्षों से विद्यमान अरावली पर्वतमाला भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन भू-वैज्ञानिक संरचनाओं में से एक है। यह पर्वतमाला केवल चट्टानों और पहाड़ियों का समूह नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की जलवायु, भू-जल पुनर्भरण, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन की आधारशिला है। अरावली को बचाने हेतु समय-समय पर अनेक योजनाएँ और नीतिगत प्रयास किए गए हैं, जो मुख्यतः बेहतर शासन व्यवस्था और प्रभावी क्रियान्वयन पर आधारित रहे हैं। हाल के वर्षों में अरावली को लेकर फैलाई गई भ्रांतियों के बीच यह आवश्यक हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट के वास्तविक निर्णयों को तथ्यों और वैज्ञानिक संदर्भों के साथ समझा जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दी अरावली की नई परिभाषा
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की कोई नई परिभाषा नहीं दी है। वास्तव में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रेणियों में अवैध खनन का मुद्दा लगभग तीन दशकों से विचाराधीन रहा है। यह विवाद केवल खनन गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रश्न लगातार उभरता रहा कि अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रेणियों की वैज्ञानिक, एकरूप और कार्यान्वयन योग्य परिभाषा क्या होनी चाहिए, जिससे पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानूनों का समान और प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।
इस संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने W.P. (Civil) No. 4677 of 1985, M.C. Mehta बनाम भारत संघ तथा W.P. (C) No. 202 of 1995, T.N. Godavarman Thirumulpad बनाम भारत संघ में अरावली क्षेत्र में अवैध खनन से संबंधित मामलों की सुनवाई की। इन मामलों का मूल विषय “अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रेणियों की परिभाषा से संबंधित मुद्दे” रहा। न्यायालय ने पाया कि विभिन्न राज्यों द्वारा अपनाए गए असंगत मानदंडों के कारण न केवल कानून के समान अनुपालन में बाधा उत्पन्न हो रही है, बल्कि अरावली जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र को भी गंभीर क्षति पहुँच रही है।
वर्ष 2024 में दिया गया निर्देश
इसी पृष्ठभूमि में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 9 मई 2024 को यह स्पष्ट निर्देश दिया कि अरावली पहाड़ियों और अरावली पर्वत श्रेणियों की एक समान, वैज्ञानिक और कार्यात्मक परिभाषा तैयार की जानी चाहिए, ताकि खनन गतिविधियों को विनियमित किया जा सके और पर्यावरणीय संरक्षण के उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। इस उद्देश्य से न्यायालय ने एक उच्चस्तरीय समिति के गठन का आदेश दिया।
इस समिति के अध्यक्ष के रूप में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव को नामित किया गया। समिति में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा हरियाणा, राजस्थान और गुजरात राज्यों के वन विभागों के सचिवों को सदस्य के रूप में शामिल किया गया। साथ ही Central Empowered Committee (CEC) और Geological Survey of India (GSI) के प्रतिनिधियों को भी समिति में सम्मिलित किया गया, ताकि परिभाषा का निर्धारण केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि ठोस भू-वैज्ञानिक और पारिस्थितिक वैज्ञानिक आधार पर किया जा सके।
सुप्रीम के आदेशों का क्रमबद्ध अध्ययन
यह लेख सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का क्रमबद्ध अध्ययन प्रस्तुत करता है और इसका उद्देश्य “100 मीटर” से जुड़े मिथक को दूर करते हुए न्यायालय के वास्तविक, व्यापक और संरक्षण-उन्मुख दृष्टिकोण को सामने लाना है। यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केवल खनन या ऊँचाई से संबंधित तकनीकी पहलुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अरावली की सम्पूर्ण पारिस्थितिक सुरक्षा, जलवायु संरक्षण, भू-जल पुनर्भरण, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को केंद्र में रखता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की शुरुआत में ही यह स्पष्ट किया कि मामला केवल पहाड़ियों या खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रेणियों की परिभाषा तथा उनके संरक्षण से संबंधित है। न्यायालय ने माना कि अरावली एक प्राचीन भू-वैज्ञानिक संरचना है, जिसे भारत की सबसे पुरानी फोल्ड माउंटेन रेंज में गिना जाता है। यह क्षेत्र जैव विविधता, स्थानीय जलवायु विनियमन, वर्षा पैटर्न, जल स्रोतों और पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को केवल पेड़ों से ढकी पहाड़ियों के रूप में नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय पारिस्थितिक धरोहर के रूप में देखा है।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पर्यावरणीय दायित्वों के संदर्भ में भी न्यायालय ने महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। भारत संयुक्त राष्ट्र के मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन (UNCCD) का पक्षकार है, जिसके अंतर्गत भूमि क्षरण को रोकना, मरुस्थलीकरण को नियंत्रित करना और क्षतिग्रस्त पारिस्थितिक क्षेत्रों का पुनर्स्थापन करना भारत का दायित्व है। इसी क्रम में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा National Action Plan to Combat Desertification and Land Degradation लागू किया गया है, जिसमें पारिस्थितिक पुनर्स्थापन, वैज्ञानिक भूमि प्रबंधन और समन्वित क्रियान्वयन पर विशेष बल दिया गया है।
अरावली ग्रीन वॉल की सराहना
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली ग्रीन वॉल परियोजना का विशेष उल्लेख करते हुए इसकी सराहना की। भारत सरकार ने मार्च 2023 में अरावली ग्रीन वॉल पहल की शुरुआत की थी। इस परियोजना का उद्देश्य अरावली पर्वत श्रृंखला के चारों ओर लगभग 5 किलोमीटर चौड़ी एक निरंतर हरित पट्टी (ग्रीन बफर ज़ोन) विकसित करना है, जो लगभग 64.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक विस्तारित है। इस हरित बफर ज़ोन का उद्देश्य अरावली क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र का पुनर्जीवन करना तथा मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को रोकना है। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून के सिद्धांत, विशेष रूप से सावधानी सिद्धांत, यह अपेक्षा करते हैं कि अरावली जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए एक समान, सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाए।
पृष्ठ 4 और 5 में न्यायालय ने अरावली से जुड़े विवादों और कानूनी प्रक्रिया का विस्तार से उल्लेख किया। M.C. Mehta और T.N. Godavarman मामलों के अंतर्गत यह प्रश्न उठाया गया कि क्या अरावली पहाड़ियों के भीतर कुछ खनन गतिविधियाँ जारी हैं। राजस्थान सरकार ने यह तर्क दिया कि “अरावली पहाड़ियों” और “अरावली पर्वत श्रेणियों” की स्पष्ट परिभाषा के अभाव में खनन नियमों का प्रभावी अनुपालन संभव नहीं हो पा रहा है। न्यायालय ने यह भी देखा कि अलग-अलग राज्यों द्वारा अलग-अलग परिभाषाएँ अपनाने से अवैध खनन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
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सुप्रीम कोर्ट का सुझाव
इस स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि भू-विज्ञान और पर्यावरण विशेषज्ञों से युक्त एक समिति अरावली की एक समान परिभाषा विकसित करे, ताकि नियमों का प्रभावी और समान अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।
पृष्ठ 6 से 9 में Central Empowered Committee की भूमिका और खनन पर लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लेख है। न्यायालय ने CEC को निर्देश दिया कि वे मैपिंग, मैक्रो-लेवल पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और भू-स्थानिक टैगिंग का कार्य करें। जब तक यह वैज्ञानिक प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक न तो नई खनन लीज़ दी जाएगी और न ही पुरानी लीज़ का नवीनीकरण किया जाएगा। यह एक प्रकार का व्यवहारिक प्रतिबंध था, जिसका उद्देश्य पर्यावरणीय क्षति को रोकना था।न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि संरक्षित क्षेत्रों, टाइगर रिज़र्व, इको-सेंसिटिव ज़ोन, टाइगर कॉरिडोर, वेटलैंड्स, एक्विफर रिचार्ज ज़ोन, भू-जल स्रोतों के आसपास, एनसीआर क्षेत्र और केंद्रीय भू-जल बोर्ड द्वारा चिन्हित डार्क ज़ोन में खनन गतिविधियाँ पूर्णतः प्रतिबंधित रहेंगी।
खनन अनुमतियों से जुड़े गंभीर मुद्दे
पृष्ठ 10 से 14 में विशेष पीठ ने यह रेखांकित किया कि अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और राज्य सरकारों द्वारा दी गई खनन अनुमतियों से जुड़े कई गंभीर मुद्दे हैं। CEC की रिपोर्ट संख्या 3/2024 में राजस्थान में ज़िला-वार अवैध खनन की विस्तृत जानकारी दी गई। Forest Survey of India की रिपोर्ट को भी संलग्न किया गया, जिसमें अरावली पहाड़ियों और उनके आसपास के बफर क्षेत्रों की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की गई थी। न्यायालय ने कहा कि यह मुद्दा पर्यावरण मंत्रालय और दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा तथा गुजरात की संयुक्त जिम्मेदारी है।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट
पृष्ठ 15 पर 100 मीटर से जुड़े भ्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की गई। Forest Survey of India ने 19 अगस्त 2010 की रिपोर्ट में ढाल, 100 मीटर का फुटहिल बफर और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी जैसे मानदंडों का उल्लेख किया था। यह एक वैज्ञानिक अवलोकन था, न कि संरक्षण को सीमित करने का आदेश।
समिति ने 3 अक्टूबर 2025 को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रेणियों की कार्यात्मक परिभाषा दी। इसके अनुसार, अरावली पहाड़ी वह भूमि-आकृति है जिसकी ऊँचाई स्थानीय रिलीफ से 100 मीटर या अधिक हो और जिसमें सहायक ढलान तथा संबंधित भू-आकृतियाँ शामिल हों। अरावली पर्वत श्रेणी दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों से मिलकर बनती है, जो 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित हों, और उनके बीच का पूरा भूभाग वैज्ञानिक मैपिंग के आधार पर संरक्षित माना जाएगा।इस प्रकार यह स्पष्ट है कि 100 मीटर कोई संरक्षण-सीमा नहीं, बल्कि केवल वैज्ञानिक संदर्भ बिंदु है। सुप्रीम कोर्ट ने पूरे अरावली भू-आकृतिक तंत्र को एक पारिस्थितिक इकाई के रूप में देखा है।
पैरा 27 में “माननीय एमिकस क्यूरी ने प्रस्तुत किया कि भारतीय वन सर्वेक्षण ने, अपनी स्थिति रिपोर्ट दिनांक 19 अगस्त 2010 के माध्यम से, जो कि वर्तमान कार्यवाही में इस माननीय न्यायालय के दिनांक 19 फरवरी 2010 के आदेश के अनुपालन में प्रस्तुत की गई है, अरावली पर्वतमाला को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है:”
(i) ढलान > 3°
(ii) तलहटी बफर = 100 m,
(iii) पहाड़ियों के बीच की दूरी या घाटी की चौड़ाई = 500 m
(iv) ऊपर बताई गई पहाड़ियों से चारों तरफ से घिरा हुआ क्षेत्र।
न्यायालय ने यह सिफारिश दी
7. सिफारिशें एवं आगे की कार्ययोजना
7.1 खनन के संदर्भ में अरावली पहाड़ियों एवं पर्वतमालाओं की परिभाषा
7.1.1 समिति खनन के संदर्भ में अरावली पहाड़ियों एवं पर्वतमालाओं की निम्नलिखित क्रियात्मक (ऑपरेशनल) परिभाषा की सिफारिश करती है
अरावली पहाड़ी: अरावली इलाकों में कोई भी जमीन का उभार या टीला, जो अपने आस-पास की जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊँचा हो, उसे अरावली पहाड़ी कहा जाएगा। इस ऊँचाई को मापने के लिए, उस सबसे निचली कंटूर लाइन (नक्शे पर ऊँचाई दिखाने वाली लाइन) को देखा जाएगा जो पूरे उभार को चारों तरफ से घेरती हो। उस निचली कंटूर लाइन के अंदर आने वाली पूरी जमीन – चाहे वह पहाड़ी का ऊपरी हिस्सा हो, ढलान हो, या उसके आस-पास की सहायक जमीनें – सब कुछ अरावली पहाड़ी का हिस्सा माना जाएगा, भले ही उन हिस्सों की ढलान कितनी भी कम या ज्यादा हो।
अरावली रेंज (पर्वत श्रृंखला): अगर दो या ज्यादा अरावली पहाड़ियाँ (जैसा ऊपर बताया गया है) एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हों – यानी दोनों की सबसे निचली कंटूर लाइन के सबसे बाहरी बिंदु से मापी गई दूरी 500 मीटर या कम हो – तो वे मिलकर अरावली रेंज बनाती हैं। इन दोनों पहाड़ियों के बीच का पूरा इलाका, जिसमें दोनों की निचली कंटूर लाइनों के बीच की जमीन, साथ ही छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ, टीले, ढलानें और अन्य सहायक हिस्से शामिल होंगे, सब अरावली रेंज का हिस्सा माने जाएंगे। बीच का इलाका तय करने के लिए पहले दोनों पहाड़ियों के आस-पास बफर बनाए जाते हैं, फिर उनकी क्रॉसिंग लाइन निकाली जाती है, और उससे लंबवत लाइनें खींचकर पूरा क्षेत्र जोड़ा जाता है।
सीधे शब्दों में कहें तो, अरावली की सुरक्षा के लिए अब सिर्फ वो ऊँची पहाड़ियाँ और उनके आस-पास का पूरा आधार क्षेत्र संरक्षित माना जाएगा जो स्थानीय जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊपर उठी हों, और पास-पास वाली ऐसी पहाड़ियाँ मिलकर एक बड़ी श्रृंखला बनाती हैं।
इस रिपोर्ट में बताया गया :
(1) Forest Survey of India की 2010 की परिभाषा
Forest Survey of India ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 19 फरवरी 2010 के आदेश के अनुपालन में अपनी 19 अगस्त 2010 की Status Report में यह स्पष्ट किया था कि अरावली क्षेत्र की पहचान केवल किसी एक बिंदु या शिखर (peak) के आधार पर नहीं की जा सकती, बल्कि यह एक समग्र भू-आकृतिक प्रणाली (geomorphological system) है। इस रिपोर्ट में अरावली की पहचान के लिए चार वैज्ञानिक मानदंड अपनाए गए—(i) ढलान (slope) 3 डिग्री से अधिक होना, (ii) पहाड़ी के पाद क्षेत्र (foothill) के चारों ओर 100 मीटर का buffer, (iii) दो पहाड़ियों के बीच की दूरी अथवा घाटी की चौड़ाई 500 मीटर तक होना, तथा (iv) इन मानकों के आधार पर चारों ओर से घिरे हुए सम्पूर्ण क्षेत्र को अरावली प्रणाली का भाग मानना। इसका स्पष्ट आशय यह था कि अरावली केवल ऊँचाई नहीं, बल्कि ढलान, पाद क्षेत्र, घाटियाँ और उनके बीच का निरंतर भू-भाग मिलकर बनती है।
(2) समिति की सिफारिशों का वैज्ञानिक आधार
समिति ने खनन के संदर्भ में अरावली पर्वत और श्रृंखलाओं को परिभाषित करते समय किसी नई अवधारणा को नहीं गढ़ा, बल्कि उसी वैज्ञानिक सोच को व्यवहारिक और स्पष्ट रूप दिया, जिसे फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया और सर्वोच्च न्यायालय पहले से स्वीकार कर चुके थे। समिति ने यह कहा कि अरावली जिलों में स्थित कोई भी स्थालाकृति यदि स्थानीय राहत (local relief) के सापेक्ष 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचा है, तो उसे अरावली पर्वत माना जाएगा। यहाँ स्थानीय राहत का निर्धारण उस सबसे नीची समोच्च रेखा के आधार पर किया जाएगा, जो उस स्थलाकृति को चारों ओर से घेरे हुए हो। यह समोच्च रेखा उस पहाड़ी प्रणाली का प्राकृतिक आधार (baseline) मानी जाएगी।
(3) स्थानीय राहत और आधार:
स्थानीय राहत का अर्थ समुद्र तल से ऊँचाई नहीं है, बल्कि उस स्थलाकृति की ऊँचाई को उसके आसपास की सबसे नीची प्राकृतिक भूमि के सापेक्ष मापना है। समिति ने स्पष्ट किया कि आधार वह निम्नतम समोच्च रेखा होगी जो पहाड़ी को चारों ओर से घेरती है—चाहे वह वास्तविक रूप से स्पष्ट हो या वैज्ञानिक रूप से अनुमानित (notionally extended) की गई हो। इस आधार से यदि स्थलाकृति की ऊँचाई 100 मीटर या अधिक निकलती है, तो वह पूरा स्थलाकृति अरावली पर्वत की श्रेणी में आएगा।
4. संरक्षित क्षेत्र की सीमा कैसे तय होगी:
समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि संरक्षण केवल पहाड़ी के शीर्ष (peak) तक सीमित नहीं होगा। निम्नतम समोच्च रेखा के भीतर आने वाला सम्पूर्ण स्थलाकृति —जिसमें पहाड़ी, उसकी सहायक ढलानें (supporting slopes), पाद क्षेत्र (foothills) और उससे जुड़े अन्य स्थलाकृति, चाहे उनका ढाल कुछ भी हो—सब अरावली पर्वत का हिस्सा माने जाएंगे। इसका अर्थ यह है कि protection plot-wise या khasra-wise नहीं, बल्कि landform-wise होगी।
अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा और संरक्षण:
यदि दो या अधिक अरावली पर्वत, जिन्हें ऊपर बताए गए मानदंडों के अनुसार पहचाना गया है, आपस में 500 मीटर या उससे कम दूरी पर स्थित हैं (यह दूरी निम्नतम समोच्च रेखा की बाहरी सीमाओं से मापी जाएगी), तो वे मिलकर अरावली पर्वत बनाती हैं। ऐसे मामलों में इन पहाड़ियों के बीच स्थित घाटियाँ, ढलानें, पहाड़ियों और अन्य सहायक भू-आकृतिक संरचनाएँ भी अरावली पर्वत का हिस्सा मानी जाएँगी और वही स्तर का संरक्षण प्राप्त करेंगी।
इस प्रकार समिति की सिफारिश कोई नई या मनमानी परिभाषा नहीं है। यह सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्देशों, Forest Survey of India की 2010 की वैज्ञानिक परिभाषा और स्थापित भू-आकृतिक सिद्धांतों का चकबंदी और परिचालन स्पष्टीकरण है। स्थानीय राहत को निम्नतम समोच्च रेखा के सापेक्ष मापना, तलहटी और ढाल को संरक्षण में शामिल करना, तथा 500 मीटर के भीतर स्थित पहाड़ियों के बीच के क्षेत्र को अरावली श्रंखला मानना—ये सभी सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहले से स्वीकार्य रहे हैं और समिति ने केवल इन्हें स्पष्ट, लागू करने योग्य और भ्रम-मुक्त रूप में प्रस्तुत किया है। अरावली पर्वतों में स्थानीय राहत निम्नतम समोच्च रेखा के सापेक्ष मापा जाता है; 100 मीटर या अधिक ऊँचाई वाले स्थालाकृति के भीतर आने वाला सम्पूर्ण क्षेत्र अरावली पर्वत माना जाता है, और 500 मीटर के भीतर स्थित ऐसे दो या अधिक पर्वत के बीच का पूरा भू-आकृतिक तंत्र अरावली पर्वत के रूप में संरक्षित होता है—यह दृष्टिकोण Forest Survey of India द्वारा 2010 से ही अपनाया जा रहा है और Committee ने उसी का consolidation किया है।
न्यायालय/Committee ने यह स्पष्ट किया कि अरावली Hills और Ranges के भीतर कुछ क्षेत्रों को Core या Inviolate Area के रूप में चिन्हित किया जा सकता है, जहाँ खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
1. सभी संरक्षित क्षेत्र जिनमें Wildlife Sanctuaries, Tiger Reserves तथा सभी अधिसूचित Tiger Corridors शामिल हैं, को स्वतः Core/Inviolate Area माना जाएगा और इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की खनन की अनुमति नहीं होगी।
2. वे सभी क्षेत्र जो ड्राफ्ट या फाइनल इको सेंसिटिव जोन (ESZ) अथवा इको सेंसिटिव क्षेत्र (ESA) के अंतर्गत अधिसूचित हैं, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986 के प्रावधानों के अनुसार खनन के लिए निषिद्ध होंगे।
3. जिन संरक्षित क्षेत्र के चारों ओर ESZ का प्रस्ताव राज्य सरकार द्वारा भेजा जा चुका है लेकिन अभी MoEFCC द्वारा अधिसूचित नहीं किया गया है, या जिन क्षेत्रों के लिए अभी प्रस्ताव भी नहीं भेजे गए हैं, वहाँ Default ESZ लागू होगी और उस क्षेत्र का विनियमन माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Godavarman मामले में समय-समय पर दिए गए आदेशों के अनुसार कड़ाई से किया जाएगा।
4. यदि किसी संरक्षित क्षेत्र के चारों ओर अधिसूचित ESZ की चौड़ाई 1 किलोमीटर से कम है, तब भी संरक्षित क्षेत्र की वास्तविक सीमा से न्यूनतम 1 किलोमीटर की दूरी तक खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी।
5. वे सभी क्षेत्र जहाँ CAMPA निधि, केंद्र या राज्य सरकार की योजनाओं अथवा अंतरराष्ट्रीय सहयोग से वृक्षारोपण किया गया है, उन्हें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील माना जाएगा और वहाँ खनन गतिविधियाँ प्रतिबंधित रहेंगी।
6. Ramsar Sites तथा Wetland (Conservation and Management) Rules के अंतर्गत अधिसूचित सभी Wetlands की सीमा से 500 मीटर की दूरी तक खनन की अनुमति नहीं होगी, ताकि आर्द्रभूमि की पारिस्थितिकी और जल संतुलन सुरक्षित रह सके।
8. न्यायालय/Committee ने यह भी संज्ञान लिया कि अरावली Hills और Ranges में बड़ी संख्या में जैव-विविधता से भरपूर क्षेत्र स्थित हैं, जिनमें अनेक Wildlife Sanctuaries, Tiger Reserves, राष्ट्रीय उद्यान तथा महत्त्वपूर्ण wetlands शामिल हैं।
9. यह भी स्पष्ट किया गया कि अरावली क्षेत्र के aquifers कई प्रमुख नदी प्रणालियों जैसे चंबल, साबरमती, लूनी, माही और बनास के recharge में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे यह क्षेत्र जल-सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील है।
10. इन सभी पारिस्थितिक और जल-संबंधी महत्त्व को ध्यान में रखते हुए यह निर्देश दिया गया कि किसी भी नई या तथाकथित “सतत” खनन गतिविधि की अनुमति देने से पूर्व Mining Plan for Sustainable Mining (MPSM) का तैयार किया जाना अनिवार्य होगा।
11. समग्र रूप से यह स्पष्ट किया गया कि अरावली पर्वत और श्रृंखलाओं में खनन का प्रश्न केवल आर्थिक गतिविधि का नहीं है, बल्कि यह जैव-विविधता संरक्षण, जल-स्रोतों की सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन से सीधे जुड़ा हुआ विषय है, इसलिए Core/Inviolate Areas में खनन पर कठोर प्रतिबंध आवश्यक है।
निष्कर्षतः सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अरावली को कमजोर करने वाला नहीं, बल्कि उसे मजबूत संरक्षण प्रदान करने वाला है। न्यायालय ने अरावली को पारिस्थितिक धरोहर माना, वैज्ञानिक मैपिंग के आधार पर संरक्षण सुनिश्चित किया, खनन को कठोर कानूनी प्रक्रिया से जोड़ा और सुशासन व बेहतर क्रियान्वयन के माध्यम से अरावली के दीर्घकालिक संरक्षण की दिशा तय की। अरावली आज भी सुरक्षित है और उसके संरक्षण की संवैधानिक तथा न्यायिक प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से स्थापित है।















