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होम सम्पादकीय

रोशनी के त्योहार और गोलियों-गालियों की बौछार

आज जब अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया से उग्र और हिंसक इस्लामी विचारधारा के विरुद्ध एकजुट होने का आह्वान करते हैं तो इसे मात्र एक सरकारी बयान कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Dec 22, 2025, 08:22 am IST
inसम्पादकीय

आस्ट्रेलिया के बॉन्डी बीच पर हनुक्का पर्व का उत्सव मना रहे यहूदी समुदाय के लोगों पर हुआ हमला केवल एक आतंकी घटना नहीं था। वह वर्तमान समय की, इस्लामी कट्टरता के प्रश्न से कतराने वाली नैतिक, वैचारिक और सामाजिक उलझनों का एक प्रतीक बन गया है। यह घटना इसलिए भी दुनिया को झकझोरने वाली थी, क्योंकि वहां केवल एक जिहादी हमलावर नहीं था। वहां एक ऐसा व्यक्ति भी था, जिसने हमलावर को रोकने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली। यह व्यक्ति कोई राजनेता, सैनिक या सुरक्षा बल का सदस्य नहीं, बल्कि अरब मूल का एक ‘मुस्लिम’ फल विक्रेता ही था।

यहीं से दो असहज, किंतु अपरिहार्य प्रश्न जन्म लेते हैं। पहला, यदि किसी घटना में ‘बचाने वाले’ व्यक्ति की पहचान और मजहब का संकेत उसके नाम या अन्य विवरणों से मीडिया तुरंत जोड़ देता है, तो उसी मानक पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हमलावरों की वैचारिक या संगठनात्मक पहचान (जहां वह पुलिस तथा जांच एजेंसियों के सत्यापित निष्कर्षों से स्पष्ट हो) बताने में कुछ मीडिया संस्थान इतना सावधान या अनिच्छुक क्यों दिखाई देते हैं?

यह सावधानी पत्रकारिता की वैध चिंताओं (जैसे जांच लंबित होना, कानूनी जोखिम या साम्प्रदायिक तनाव बढ़ने का डर) से आ सकती है किंतु मीडिया पर लगने वाले आरोपों से इतर कई अध्ययनों में यह भी तथ्य उभरा है कि “आतंकवाद/आतंकी” जैसे शब्दों का प्रयोग और ‘आस्था-आधारित लेबलिंग’ मीडिया में अक्सर सुसंगत या कहिये एक-सी नहीं होती। अलग-अलग परिस्थितियों में अलग ढंग से घटनाओं को फ्रेम किया जाता है।

दूसरा प्रश्न भी ऐसा ही जटिल और सामयिक है। प्रश्न है-यदि कट्टरता किसी समुदाय में मौजूद है तो क्या उसे रोकने वाली शक्तियां भी उसी समुदाय से आ सकती हैं!

यह कोई छोटी बहस नहीं है। यह उस वैश्विक विमर्श का केंद्र है, जिसमें बार-बार यह कहा जाता है कि ‘आज इस्लाम कठघरे में खड़ा है’। बहुत से लोगों को यह वाक्य असहज करता है और यह असहजता स्वाभाविक भी है। किंतु समस्या यह है कि यह बेचैनी अक्सर गलत समय पर व्यक्त होती है , उस समय जब आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट और निर्भीक आवाज उठाने की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

आज की वास्तविकता यह है कि मुस्लिम जगत के भीतर कट्टरपंथी तत्वों का विस्तार केवल तेज ही नहीं बल्कि बहुआयामी भी है। इस विस्तार का एक दुष्परिणाम यह है कि उदार, सामान्य और शांतिप्रिय मुसलमान या तो दब जाते हैं या चुप्पी ओढ़ने को मजबूर हो जाते हैं। परिणामस्वरूप गेहूं के साथ घुन पिसता है और जब ऐसा होता है तो कट्टरपंथी तत्व उसी पीड़ा का उपयोग पूरे मुस्लिम समुदाय को सामूहिक पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने के लिए करते हैं। इससे मूल प्रश्न दब जाता है कि इस विनाशकारी चक्र की शुरुआत किसने की?

तकरीबन दो साल पहले 7 अक्तूबर, 2023 को हमास के आतंकियों का इस्राएल में यहूदी त्योहार ‘सिमचट तोराह’ का उत्सव मना रहे लोगों पर किया गया हमला इसी प्रवृत्ति का उदाहरण था। आतंकियों ने उत्सव मना रहे निर्दोष लोगों को निशाना बनाया। बाद में जब इस पर प्रतिक्रिया हुई तो विनाश का व्यापक दृश्य दुनिया के सामने आया और उसी दृश्य में यह तथ्य कहीं खो गया कि हिंसा की पहली चिंगारी किसने सुलगाई थी। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि आतंकियों को प्रेरित करने वाले वैचारिक और संस्थागत केंद्रों पर शायद ही कभी गंभीर प्रश्न उठते हैं।

यह मान लेना आसान है कि सभी लोग एक ही प्रकार की कट्टर वैचारिक खुराक पर पल रहे हैं, किंतु सच्चाई अधिक जटिल है। बॉन्डी बीच की घटना ने यह दिखाया कि इस्लाम के भीतर भी ऐसे लोग हैं जो हिंसा के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हैं। निहत्थे होकर गोलियां बरसाते आतंकी को रोकने का प्रयास करने वाला वह फल विक्रेता कोई अपवाद भर नहीं है। वह एक संकेत है। संकेत इस बात का कि इस्लाम के भीतर सुधार, आत्मालोचना और प्रतिरोध की आवाजें मौजूद हैं, भले ही वे अभी बिखरी हुई हों।

प्रश्न यह है कि क्या ये आवाजें यूं ही अलग-थलग पड़ जाएंगी या फिर इन्हें नागरिक समाज, वैश्विक विमर्श और नीति निर्माण में स्थान मिलेगा! कट्टरता कैसे फैलती है, इसे समझने के लिए हमें बड़े धमाकों से पहले होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को देखना होगा। उदाहरण के लिए, एक साधारण सा भाषाई परिवर्तन ‘खुदा हाफिज’ से ‘अल्लाह हाफिज’ की ओर। देखने में यह केवल शब्दों का अंतर लग सकता है ,किंतु इसके पीछे छिपी वैचारिक प्रेरणा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। ‘खुदा’ फारसी शब्द है जो इस्लाम के आगमन से पहले भी ईश्वर के लिए प्रयुक्त होता था। इसके विपरीत ‘अल्लाह’ विशुद्ध अरबी शब्द है, जिसे कट्टरपंथी विचारधाराओं ने एकमात्र वैध संबोधन के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

यह तर्क दिया गया कि खुदा तो आतिश परस्तों (अग्नि की पूजा करने वालों) का शब्द है और यदि आप अल्लाह को किसी अन्य शब्द से संबोधित करते हैं तो आपकी आस्था अशुद्ध है। वर्षों तक इस विचार को दोहराया गया। इतना कि आज ‘खुदा हाफिज’ लगभग बोलचाल से बाहर हो गया है। यही वह प्रक्रिया है, जिससे कट्टरता जन्म लेती है। पहले शुद्धतावाद, फिर उन्मूलन। केवल वही सही है जो हम कहते हैं और जो सहमत नहीं वह निशाने पर हैं।

आज जब अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया से उग्र और हिंसक इस्लामी विचारधारा के विरुद्ध एकजुट होने का आह्वान करते हैं तो इसे मात्र एक तात्कालिक अथवा सरकारी बयान कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद की पूरी बहस को इस्लामोफोबिया के अकादमिक और राजनीतिक जाल में उलझाकर पटरी से उतारने की कोशिशें हुई हैं। किंतु यदि दुनिया आज भयग्रस्त है तो वह किसी अकारण फोबिया के कारण नहीं, बल्कि उन असंख्य घटनाओं की कड़ियों के कारण है जिनके पीछे एक जैसी प्रेरणा, एक जैसे नारे और एक जैसी वैचारिक पहचान दिखाई देती है।

इसके समानांतर मुस्लिम समाज के भीतर से भी एक दूसरा स्वर उठ रहा है। धीमा, बिखरा हुआ किंतु वास्तविक। ये वे लोग हैं जिन्हें अक्सर ‘इक्का-दुक्का’ (fringe) या ‘न्यू एज इस्लाम’ के नाम पर हाशिए पर डाल दिया जाता है। उनकी चिंताओं को गंभीरता से लेने के बजाय उनका उपहास किया जाता है। बॉन्डी बीच का वह फल विक्रेता इसी स्वर का सजीव प्रतीक है।

प्रश्न है-क्या मुस्लिम समुदाय से ‘सिविल सोसाइटी’ कुछ आशा रख सकती है! और अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्या ‘सिविल सोसाइटी’ स्वयं इस्लामी आतंकवाद को खुलकर ललकारेगी! सोशल मीडिया पर साहसी फल विक्रेता के लिए चला क्राउड फंडिंग अभियान, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री से लेकर उद्यमियों तक का समर्थन, और दूसरी ओर विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति का इस्लामी आतंकवाद को खुलकर ललकारना,ये इस बात के संकेत हैं कि दुनिया इस अंतर को देख रही है, सही दिशा में संकल्पित होने को बढ़ रही है।

अब इस विमर्श को भारत के एक अन्य संदर्भ से जोड़ना आवश्यक है। तमिलनाडु की पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम् की परंपरा को लेकर उपजा विवाद केवल एक प्रशासनिक या कानूनी मसला नहीं है। यह भी उसी बड़े प्रश्न का हिस्सा है। कट्टरता बनाम उदारता। न्यायालय के निर्णय के बावजूद प्रशासनिक अड़चनें और तुष्टीकरण की राजनीति धार्मिक परंपराओं को राजनीति का मोहरा बना देती हैं।

ध्यान देने योग्य है कि हनुक्का भी रोशनी का पर्व है और कार्तिगई दीपम् भी। शिला ज्योति स्तंभ पर सदियों से प्रज्ज्वलित होती ज्योति का उत्सव। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक गहरा प्रतीक है। कट्टरता मूलतः रोशनी से डरती है। वह आग से, आत्मालोचना से, प्रश्नों से डरती है। इसलिए वह हर उस प्रकाश को बुझाना चाहती है जो उसके एकरूप अंधकार को चुनौती देता है।

अंततः प्रश्न यही है- मानवता की राह उत्सवों, आनंद और रोशनियों के बीच से निकलेगी या अंधेरे के बीच से! इसका उत्तर कोई बाहरी शक्ति नहीं देगी। यह निर्णय इसी दुनिया के लोगों को करना होगा। यदि इस्लाम आज कट्टरता की चपेट में है, और सभ्य समाज इस बुराई को खुलकर नहीं ललकारता, इसके अंत के लिए एक साथ नहीं आता तो यह केवल मुसलमानों का संकट नहीं, यह पूरी आस्था, पूरी मानवता और हमारे साझे भविष्य का संकट है। निष्कर्ष यही है, रोशनी को बचाना होगा, क्योंकि अंततः अंधकार को चुनौती देने का साहस केवल प्रकाश ही कर सकता है।

X@hiteshshankar

Topics: सिविल सोसाइटी आस्ट्रेलियाअल्लाहआतंकवादहितेश शंकरपाञ्चजन्य विशेषकट्टरपंथी तत्वयहूदी समुदायहनुक्का पर्वआस्था-आधारित लेबलिंगमुस्लिम जगत
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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