'वैभवशाली राष्ट्र निर्माण के लिए विचार भले ही अलग हों लेकिन मन एक रहे' : डॉ. मोहन भागवत जी.
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‘वैभवशाली राष्ट्र निर्माण के लिए विचार भले ही अलग हों लेकिन मन एक रहे’ : डॉ. मोहन भागवत जी.

RSS शताब्दी व्याख्यान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मोहन भागवत जी बोले— विचारों की स्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए समाज का मन एक रहना चाहिए

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Dec 21, 2025, 03:47 pm IST
in भारत, पश्चिम बंगाल

कोलकाता (हि.स.) । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर कोलकाता में आयोजित व्याख्यान के दूसरे सत्र को संबोधित करते हुए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज में विचारों की स्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन देश और समाज के हित में सबका मन एक रहना चाहिए ताकि वैभवशाली राष्ट्र निर्माण हो। उन्होंने कहा कि संघ का मूल स्वभाव मित्रता, सामूहिकता और निस्वार्थ सेवा पर आधारित है और यही उसकी शक्ति है।

संघ की वैचारिक यात्रा और भविष्य का एजेंडा

‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ शीर्षक व्याख्यान के द्वितीय सत्र में सरसंघचालक जी ने पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया। इसके साथ ही संघ की कार्यपद्धति, उसकी वैचारिक यात्रा और भविष्य के एजेंडे पर विस्तार से बात रखी। उन्होंने कहा कि संघ को समझने के लिए बाहर से राय बनाने के बजाय शाखा में प्रत्यक्ष आकर देखना और अनुभव करना जरूरी है।

पंच प्रण पर दिया विशेष जोर

सरसंघचालक जी ने कहा- आचरण परिवर्तन के लिए पांच बिंदुओं पर जोर दिया। इसमें सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और संविधान शामिल हैं। उन्होंने कहा कि मंदिर, पानी और श्मशान सभी हिंदुओं के लिए समान हैं। परिवार में संवाद बढ़े, सप्ताह में एक दिन सभी सदस्य साथ बैठें, भोजन करें और परंपरा पर चर्चा करें। पर्यावरण संरक्षण केवल चर्चा तक सीमित न रहे, बल्कि छोटे छोटे उपायों से जीवन में उतरे। स्वदेशी के माध्यम से आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन बढ़े और संविधान की प्रस्तावना, नागरिक कर्तव्य और अधिकारों की जानकारी बच्चों को दी जाए।

संघ की कार्यप्रणाली और डॉ. हेडगेवार का योगदान

सरसंघचालक जी ने कहा कि स्वयंसेवक समाज के हर क्षेत्र में काम कर रहे हैं और संघ किसी को नियंत्रित नहीं करता, न बाहर से और न ही अंदर से। संघ को समझने के लिए डॉ. हेडगेवार के चरित्र और जीवन को जानना आवश्यक है। अत्यंत विपरीत परिस्थितियों और आर्थिक अभाव के बावजूद शुद्ध अंतःकरण और निस्वार्थ बुद्धि से उन्होंने संघ का कार्य प्रारंभ किया। समाज के स्नेह और विश्वास के सहारे यह कार्य आगे बढ़ा और यह एक ईश्वरीय कार्य है।

संघ पर हुए विरोध और स्वयंसेवकों का संकल्प

उन्होंने कहा कि दुनिया के किसी भी स्वयंसेवी संगठन का इतना विरोध नहीं हुआ, जितना संघ का हुआ। हमले हुए, हत्याएं भी हुईं, लेकिन स्वयंसेवक रुके नहीं। इसके बावजूद संघ के स्वयंसेवकों के मन में कटुता का भाव नहीं है। संघ गुरु दक्षिणा से चलता है, बाहर से कोई सहायता नहीं लेता। संघ आर्थिक रूप से स्वावलंबी है, पाई पाई का हिसाब रखा जाता है और नियमित ऑडिट होता है।

देशभर में संघ की उपस्थिति

सरसंघचालक जी ने बताया कि देश के पौने सात लाख गांवों में से सवा एक लाख से अधिक स्थानों पर संघ की उपस्थिति है। 45 हजार शहरों और नगरों में से अभी आधे में संघ पहुंच चुका है और शेष आधे में पहुंचना लक्ष्य है।

सज्जन शक्ति और समाज में परिवर्तन का लक्ष्य

डॉ. भागवत जी ने कहा कि समाज में बड़ी संख्या में ऐसे अच्छे लोग हैं जो बिना किसी प्रसिद्धि की इच्छा के अपने संसाधन लगाकर सेवा कर रहे हैं। संघ इसे समाज की सज्जन शक्ति मानता है। इस सज्जन शक्ति का नेटवर्क बनाना, आपसी समन्वय बढ़ाना और पूरकता लाना संघ की भूमिका है। अब समय आ गया है कि देशव्यापी कार्यकर्ताओं के माध्यम से समाज के आचरण में परिवर्तन लाया जाए।

हिंदू समाज की जाग्रति और संघ की भूमिका

सरसंघचालक जी ने कहा कि हिंदुओं की शक्ति जाग्रत हो रही है और निश्चित रूप से होगी। भारत, हिंदुस्थान और हिंदू समानार्थी हैं। उन्होंने कहा कि सबको साथ लेकर चलने वाला संगठन यदि कोई है तो वह संघ है। संघ सम्पूर्ण समाज को अपना मानता है और इसी अपनत्व के आधार पर एकता का निर्माण होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी का शाखा में आना अनिवार्य नहीं है, लेकिन शाखा जैसी निस्वार्थता और प्रामाणिकता का प्रशिक्षण देने वाली दूसरी कोई कार्यप्रणाली नहीं है।

राष्ट्र निर्माण में समाज के साथ संघ

अंत में डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ श्रेय लेने के लिए काम नहीं करता, बल्कि समाज के साथ मिलकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुटा रहता है।

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