ये कांग्रेस की मनमानियों से जुड़ा एक और मामला है, जो कि करीब 50 साल पुराना है। जहां, कांग्रेस की सरकार के दौरान वन विभाग की 134 एकड़ की जंगल की जमीन को खेती के लिए गांधी जीवन कोऑपरेटिव सोसायटी को 10 साल की लीज पर दे दिया था। अब करीब 50 साल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ‘केस स्टेट ऑफ कर्नाटक और अन्य बनाम गांधी जीवन कलेक्टिव फार्मिंग कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड’ फैसला सुनाते हुए कहा है कि जंगल की जमीन का इस्तेमाल व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 19 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता ने इस केस में फैसला सुनाया।
क्या हुआ था शुरुआत में
मामला कुछ यूं है कि 1976 में कर्नाटक सरकार ने धारवाड़ जिले के बेनाची और तुमरिकोप्पा गांवों में करीब 134 एकड़ जंगल की जमीन को गांधी जीवन कोऑपरेटिव सोसाइटी को 10 साल के लिए लीज पर दे दिया। ये लीज खेती करने के लिए थी। लीज के दौरान सोसाइटी के सदस्यों ने पेड़ काटे और जमीन पर खेती शुरू कर दी। 1986 में लीज खत्म होने पर सरकार ने इसे बढ़ाने से मना कर दिया और लीज खत्म कर दी। उसके बाद फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने कर्नाटक फॉरेस्ट एक्ट और मैनुअल के तहत बेदखली की कार्रवाई शुरू की। 2004 में बेदखली का ऑर्डर आया, 2006 में अपील खारिज हुई और 2007 में डिपार्टमेंट ने जमीन पर कब्जा ले लिया। सोसाइटी ने कई मुकदमे लड़े – रिट पिटिशन, सिविल सूट, अपीलें दायर की। आखिर में कर्नाटक हाई कोर्ट ने 2009 में सोसाइटी को कहा कि वो सेंट्रल गवर्नमेंट से लीज जारी रखने के लिए रिप्रेजेंटेशन दे सकती है।
दोनों पक्षों के तर्क
कर्नाटक सरकार की तरफ से कहा गया कि जंगल की जमीन को गैर-जंगली कामों जैसे खेती के लिए इस्तेमाल करना फॉरेस्ट (कंजर्वेशन) एक्ट 1980 की धारा 2 के खिलाफ है। इसके लिए सेंट्रल गवर्नमेंट की पहले से मंजूरी जरूरी है। लीज बढ़ाना गलती को जारी रखने जैसा होगा। सोसाइटी की तरफ से बस लीज जारी रखने की मांग की गई, जैसा हाई कोर्ट ने कहा था।
धारा-2 क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट को देखा। धारा 2 कहती है कि जंगल की जमीन को गैर-जंगली कामों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता बिना सेंट्रल गवर्नमेंट की मंजूरी के। खेती करने के लिए पेड़ काटने पड़ते हैं, जो सीधे प्रतिबंधित है। पुराने गोडावरमन केस का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि बिना मंजूरी के ऐसी गतिविधियां बंद होनी चाहिए। शुरुआती लीज देना ही गलत था क्योंकि इससे बड़ा जंगली इलाका बर्बाद हुआ। सोसाइटी ने 10 साल से ज्यादा खेती की, अब और नहीं। हाई कोर्ट का ऑर्डर गलत था क्योंकि वो गलती को जारी रखने की इजाजत दे रहा था।
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कोर्ट का ऑर्डर क्या था
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील मंजूर कर ली और हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि जंगल की जमीन पर खेती की लीज जारी नहीं की जा सकती। कर्नाटक फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को 134 एकड़ जमीन पर देसी पेड़-पौधे लगाकर जंगल बहाल करने का निर्देश दिया। ये काम एक्सपर्ट्स से सलाह लेकर 12 महीने में पूरा करना है। कंप्लायंस रिपोर्ट के लिए केस एक साल बाद लिस्ट होगा।















