पं. राम प्रसाद बिस्मिल के बलिदान दिवस 19 दिसंबर पर रामप्रसाद बिस्मिल और उनकी मां मूलमती देवी के मध्य हुए संवाद को पढ़े बिना, बिस्मिल के बलिदान का इतिहास अधूरा ही रह जाएगा। इसलिए उसे प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
फांसी की तिथि और अंतिम भेंट
क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को सुबह 6:30 बजे गोरखपुर जेल में फांसी देने की तिथि निश्चित की गई थी। 18 दिसंबर को उनके माता-पिता और छोटे भाई सुशील अंतिम दर्शन के लिए गोरखपुर जेल में गए थे। मां से भेंट होने पर राम प्रसाद बिस्मिल के आंसू निकल पड़े। उस समय, उस जननी ने हृदय को पत्थर से दबाकर जो उत्तर दिया था, वह भारतीय माता के वीरोचित चरित्र को उजागर करता है।
मां मूलमती देवी के शब्द
रामप्रसाद बिस्मिल और मां मूलमती देवी के मध्य हुए संवाद को पढ़े बिना बिस्मिल के बलिदान का इतिहास अधूरा ही रह जाएगा। इसलिए उसे प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
माता मूलमती देवी ने कहा –
“मैं तो समझती थी कि तुमने अपने पर विजय पाई है, किंतु यहां तो तुम्हारी कुछ और ही दशा है। जीवनपर्यंत देश के लिए आंसू बहाकर अब अंतिम समय तुम मेरे लिए रोने बैठे हो इस कायरता से अब क्या होगा? तुम्हें वीर की भांति हंसते हुए प्राण देते हुए देखकर,मैं अपने आप को धन्य समझूंगी। मुझे गर्व है कि इस गए – बीते जमाने में मेरा पुत्र देश की वेदी पर प्राण दे रहा है। मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा करना था, इसके बाद तुम देश की चीज हो और उसी के काम आ गए। मुझे इसमें तनिक भी दुख नहीं है।”
रामप्रसाद बिस्मिल का उत्तर
उत्तर में बिस्मिल ने कहा –
“माँ! तुम तो मेरे हृदय को भली-भांति जानती हो। क्या तुम समझती होकि मैं तुम्हारे लिए रो रहा हूँ, अथवा इसलिए रो रहा हूँ कि मुझे कल फांसी हो जाएगी यदि ऐसा है, तो मैं कहूँगा कि तुमने जननी होकर भी मुझे समझ ना पाया मुझे,अपनी मृत्यु का तनिक भी दुख नहीं है। हां यदि घी को आग के पास लाया जाएगा तो उसका पिघलना स्वाभाविक है। बस, उसी प्राकृतिक संबंध से दो-चार आंसू आ गए। आपको मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु से बहुत संतुष्ट हूँ।”
फांसी से पूर्व अंतिम क्षण
19 दिसंबर को प्रातः गीता पाठ के उपरांत बिस्मिल वंदे मातरम् और भारत माता की जय कहते हुए फांसी के तख्ते की ओर रवाना हुए। अपना एक गीत गाते हुए,अंत में यह कहते हुए फांसी का आलिंगन किया।
“अब न अगले वलवले हैं,और न अरमानों की भीड़,
एक मिट जाने की हसरत दिल-ए-‘बिस्मिल’ में है।”
स्वतंत्रता संग्राम का विकृत इतिहास
परन्तु स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास और भविष्य की सच्चाई यही रही है कि जिन हुतात्माओं ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जंग लड़ी उनको देशद्रोही, आतंकवादी लुटेरा और डकैत कहा गया तथा उन्हें ही फांसी और कालापानी की सजाएं दी गईं। इसके विपरीत ब्रिटिश सरकार का समर्थन कर, सरकार में सम्मिलित होकर छक्के – पंजे उड़ाने वाले, डोमिनियन स्टेट्स की मांग करने वाले कांग्रेसी और अन्य तथाकथित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बन कर इतिहास में छा गए और सत्ता भी प्राप्त कर ली।
इतिहास लेखन और वैचारिक षड्यंत्र
सत्ता प्राप्त करने के उपरांत इन तथाकथित नेताओं ने ब्रिटिश सरकार के मत प्रवाह का ही समर्थन किया और भारतीय इतिहास को बर्बाद करने की जिम्मेदारी वामपंथी और सेक्युलर इतिहासकारों को दे दी, जिसका दुष्परिणाम सबके सामने है।
बिस्मिल बनाम ब्रिटिश समर्थक तंत्र
आज रामप्रसाद बिस्मिल के बलिदान दिवस पर ये तय हो कि राम प्रसाद बिस्मिल सही थे या मोतीलाल नेहरू के समधी (वस्तुतः मोतीलाल नेहरू के बड़े भाई नन्दलाल नेहरू के बेटे किशन लाल के साथ जगत नारायण मुल्ला की बेटी स्वराजवती का विवाह हुआ था। इस दृष्टि से जगत नारायण मुल्ला, मोतीलाल नेहरू के भी समधी हुए।
ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की घोषणा
ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सर्वप्रथम महा महारथी रामप्रसाद बिस्मिल ने फाँसी पर चढ़ते समय सिंह गर्जन किया था “I wish the downfall of British Empire.”
काकोरी कांड और न्यायिक षड्यंत्र
विडंबना तो देखिए की काकोरी अनुष्ठान को लूट बताया गया और बिस्मिल सहित समस्त क्रांतिकारियों के विरुद्ध अंग्रेजों की ओर से पं. मोतीलाल नेहरू लोक अभियोजक (पब्लिक प्रोसीक्यूटर)बने, मोतीलाल नेहरु ने चतुराई दिखाते हुए अपने रिश्तेदार और जूनियर पं.जगत नारायण मुल्ला को मैदान में उतार दिया।
फांसी दिलाने की भूमिका
फिर क्या था जगत नारायण मुल्ला ने मोतीलाल नेहरू के आशीर्वाद से रामप्रसाद बिस्मिल सहित अन्य महारथियों को फाँसी की सजा दिलवा कर ही दम लिया। अति तो तब हो गई, जब पैरवी के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल भारी पड़ने लगे, तब जगत नारायण मुल्ला ने उनका विरोध करते हुए पैरवी नहीं करने दी। एक चादर को पर्याप्त सबूत मानकर राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी की सजा दिलवाने वाले जगत नारायण मुल्ला ही थे।
जलियांवाला बाग और अंग्रेज़ों का साथ
उल्लेखनीय है कि जलियांवाला बाग हत्याकांड के उपरांत जांच के लिए गठित 7 सदस्यीय हंटर कमेटी जिसमें 4 अंग्रेज और 3 भारतीय सदस्य रखे गए थे। उसमें जगत नारायण मुल्ला भी एक सदस्य थे और अंग्रेजों का साथ देते हुए, जांच में लीपा -पोती कर क्लीन चिट देकर अपना सहयोग दिया था।
इनाम किसे मिला और बलिदान किसका?
अंग्रेज़ों और कांग्रेस ने जगत नारायण मुल्ला को खूब उपकृत किया, इतना ही नहीं वरन् उनके पुत्र पं आनंद नारायण मुल्ला को कांग्रेस ने 10 वर्ष सांसद बनने का सुख दिया, फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट न्यायधीश भी बनाया गया और पुन: राज्य सभा भेजा गया।
परंतु महान् स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों क्या मिला? लुटेरा और आतंकवादी का तमगा-आखिर क्यों? पूछता है भारत?
अब रामप्रसाद बिस्मिल की सुनिए
अब रामप्रसाद बिस्मिल की सुनिए। महान स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून सन 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। उनके पिता रामभक्त थे, जिसके कारण उनका नाम राम से रामप्रसाद रखा गया। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने पिता से हिंदी और पास में रहने वाले एक मौलवी से उर्दू सीखी। बिस्मिल शाहजहांपुर के एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल में भी गए। इसलिए विभिन्न भाषाओं पर उनकी पकड़ ने उन्हें एक उत्कृष्ट लेखक और कवि के रूप में प्रतिष्ठित किया।
आर्य समाज और साहित्यिक पहचान
राम प्रसाद बिस्मिल के बचपन में आर्य समाज उत्तर भारत में प्रभावशाली आंदोलन के रूप में उभर रहा था। बिस्मिल भी आर्य समाज में सम्मिलित हो गए। वह एक लेखक और कवि के रूप में पहचान बनाने लगे। उन्होंने हिंदी और उर्दू में ‘अज्ञात’, ‘राम’ जैसे उपनामों से देशभक्ति के छंद लिखे। उनका सबसे प्रसिद्ध उपनाम ‘बिस्मिल’ था।
राजनीति में प्रवेश और क्रांतिकारी विचार
स्कूल तक की पढ़ाई समाप्त करने के बाद बिस्मिल राजनीति में शामिल हो गए। हालांकि, शीघ्र ही उनका कांग्रेस पार्टी के तथाकथित उदारवादी धड़े से मोहभंग हो गया। बिस्मिल अपने देश की स्वाधीनता हेतु भिक्षावृति के लिए तैयार नहीं थे। वह स्वाधीनता को शौर्यपूर्वक प्राप्त करना चाहते थे। जैसा कि उनकी सबसे प्रसिद्ध कविताओं में से एक ‘गुलामी मिटा दो’ में दृष्टिगोचर होता है-अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने ‘मातृवेदी’ नाम से एक क्रांतिकारी संगठन बनाया। इसके बाद बिस्मिल ने अपने साथी क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित के साथ मिलकर सेना बनाई। तदुपरांत मैनपुरी अनुष्ठान किया गया।
मैनपुरी अनुष्ठान और भूमिगत जीवन
सन 1918 में बिस्मिल अपनी सबसे प्रसिद्ध कविता मैनपुरी की प्रतिज्ञा लिखी, जिसे पैम्फलेट में संयुक्त प्रांत में वितरित किया गया। उनकी कविता की राष्ट्रवादी लोगों ने प्रशंसा की। बिस्मिल के नए बने संगठन को धन की आवश्यकता थी। इसके लिए उन्होंने वर्ष 1918 में मैनपुरी जिले के सरकारी कार्यालयों से तीन बार धन हस्तगत किया। बरतानिया सरकार में सनसनी फैल गई।
बड़े पैमाने पर तलाशी शुरू की गई और बिस्मिल का पता लगा लिया गया। इसके बाद जो हुआ वह एक नाटकीय गोलीबारी थी जिसके अंत में बिस्मिल यमुना नदी में कूद गए और बचने के लिए पानी के नीचे तैरते हुए पलायन कर गये ।इसके बाद बिस्मिल अगले 2 वर्षों तक भूमिगत रहे।
असहयोग आंदोलन से मोहभंग
फरवरी 1920 में जब मैनपुरी अनुष्ठान मामले के सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया, तो बिस्मिल अपने घर शाहजहांपुर लौट आए। वहां उन्होंने शुरू में कांग्रेस के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने का काम किया। लेकिन गांधी द्वारा 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेने फैसले से क्षुब्ध होकर बिस्मिल ने अपनी खुद का दल बनाने का निर्णय लिया।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन
अंततोगत्वा रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां, शचीन्द्रनाथ सान्याल और योगेश चंद्र चटर्जी जैसे संस्थापक सदस्यों ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया। इसके बाद चंद्रशेखर आजाद और बाद में भगत सिंह भी एच.आर.ए.में सम्मिलित हुए। उनका घोषणा पत्र मुख्य रूप से बिस्मिल ने लिखा था। आधिकारिक तौर पर घोषणा पत्र 1 जनवरी, 1925 को जारी किया गया, जिसका शीर्षक था- क्रांतिकारी।
काकोरी अनुष्ठान
9 अगस्त सन 1925 रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क़ो एच.आर.ए.ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम लड़ने हेतु धन एकत्रित करने के लिए काकोरी अनुष्ठान किया।
9 अगस्त, सन 1925 को जब आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन,लखनऊ से लगभग 15 किमी दूर काकोरी स्टेशन से गुजर रही थी, एच.आर.ए.के एक महारथी राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, जो पहले से ही अंदर बैठे थे, उन्होंने ट्रेन की चेन खींच दी और ट्रेन को रोक दिया। तदुपरांत राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्लाह खां सहित लगभग दस क्रांतिकारी ट्रेन में घुसे और मुठभेड़ के बाद गार्ड को काबू किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 4,679 रुपये, एक आना और 6 पैसे क़ी धनराशि क्रांतिकारियों ने हस्तगत कर ली और पलायन कर गए। काकोरी अनुष्ठान ने,न केवल भारत वरन इंग्लैंड की ब्रिटिश सरकार को हिला कर रख दिया।
गिरफ्तारी और बलिदान
काकोरी अनुष्ठान से बरतानिया सरकार थर्रा उठी थी इसलिए येन- केन- प्रकारेण क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया। इस अभियान में बरतानिया सरकार के आठ लाख रुपए खर्च हुए। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, रोशन सिंह और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को मौत की सजा सुनाई गई। 19 दिसंबर, सन 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया।
बिस्मिल के विचार और काव्य
क्या गलत कहते थे राम प्रसाद बिस्मिल जी? क़ि- “हम अमन चाहते हैं, जुल्म के खिलाफ, ग़र फैसला जंग से होगा, तो जंग ही सही”।
उन्होंने- “मेरा रंग दे बसंती चोला” गीत कारावास में ही लिखा और सरदार भगत सिंह ने इसमें यहां से पंक्तियां जोड़ीं “इसी रंग में बिस्मिल जी ने वंदेमातरम् बोला”।
न्यायालय में बिस्मिल का स्वर
विश्व के महान् क्रांतिकारी शायर बिस्मिल ने न्यायालय में कहा था क़ि-
“मुलाजिम मत कहिए हमको, बड़ा अफसोस होता है..
अदालत के अदब से, हम यहाँ तशरीफ लाये हैं..
पलट देते हैं हम, मौजे – हवादिस अपनी जुर्रत से..
कि हमने आँधियों में भी, चिराग अक्सर जलाये हैं”।
कालजयी शेर और अंतिम ग़ज़ल
इसलिए रामप्रसाद बिस्मिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानतम क्रांतिकारी कवि थे। विश्व के महान् क्रांतिकारी शायर रामप्रसाद बिस्मिल ने कालजयी शेर कहा कि
“सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।”
औऱ ये भी पढ़िए क़ि
“आखिरी शब दीद के काबिल थी, बिस्मिल की तड़प
सुब्ह दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या?
काकोरी अनुष्ठान का सत्य
स्वतंत्रता के महारथी बिस्मिल ने लिखी अपने फाँसी के पूर्व ये अंतिम गज़ल जिसकी अंतिम पंक्तियाँ थीं।
काकोरी की घटना लूट या षड्यंत्र या काण्ड नहीं वरन् स्वतंत्रता के लिए दिव्य अनुष्ठान था। काकोरी महायज्ञ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे हैरतअंगेज और अंग्रेजी सरकार भयाक्रांत करने वाली घटना थी। स्वतंत्रता के अमृत काल में क्या अब भी काकोरी अनुष्ठान को षड्यंत्र और लूट कहेंगे? गूगल में भी यही सब डाल रखा है! क्या अब भी नहीं सुधारेंगे?
अंग्रेजों ने हिन्दुस्तानियों के खून-पसीने की कमाई को लूटा तो वह लूट नहीं है, इन महावीरों ने अंग्रेज लुटेरों से अपना रुपया देश की स्वाधीनता की लड़ाई के लिए हस्तगत किया, तो वह लूट हो गयी। वाह रे! अंग्रेजी इतिहासकारों और उन पर आश्रित परजीवी इतिहासकारों,मार्क्सवादी इतिहासकारों..अब तो शरम करो, धिक्कार है!! परंतु अब हम और आप मिलकर इतिहास का पुनर्लेखन कर इस दाग को जड़ से मिटाएंगे।

















