मातृभूमि के महाकवि और क्रांति के महारथी : रामप्रसाद बिस्मिल
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मातृभूमि के महाकवि और क्रांति के महारथी : रामप्रसाद बिस्मिल

राम प्रसाद बिस्मिल की बात हो और कविता से शुरुआत ना हो तो यह अनुचित ही होगा, क्योंकि उन्होंने कलम को भी तलवार बना लिया था। उनकी रचनाओं में जो धार और भाव हैं,वह संपूर्ण विश्व में दुर्लभ है।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
Jun 11, 2026, 03:48 pm IST
in भारत
महारथी रामप्रसाद बिस्मिल

महारथी रामप्रसाद बिस्मिल

महारथी राम प्रसाद बिस्मिल की बात हो और कविता से शुरुआत ना हो तो यह अनुचित ही होगा, क्योंकि उन्होंने कलम को भी तलवार बना लिया था। उनकी रचनाओं में जो धार और भाव हैं, वह संपूर्ण विश्व में दुर्लभ है। लखनऊ जेल में काकोरी यज्ञ के कई क्रांतिकारियों को कैद किया जा चुका था। केस चल रहा था इसी दौरान बसंत पंचमी का त्यौहार भी आ गया। सभी क्रान्तिकारियों ने मिलकर तय किया कि कल बसंत पंचमी के सभी सर पर पीली टोपी और हाथ में पीला रुमाल लेकर कोर्ट जाएंगे। उन्होंने अपने नेता राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ से कहा- “पण्डित जी! कल के लिये कोई फड़कती हुई कविता लिखिये, उसे हम सब मिलकर गायेंगे।”  राम प्रसाद बिस्मिल ने तैयार कर दी यह कविता-

मेरा रंग दे बसन्ती चोला….
हो मेरा रंग दे बसन्ती चोला….
इसी रंग में रंग के शिवा ने मां का बन्धन खोला,
यही रंग हल्दीघाटी में था प्रताप ने घोला;
नव बसन्त में भारत के हित वीरों का यह टोला,
किस मस्ती से पहन के निकला यह बासन्ती चोला।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला….
हो मेरा रंग दे बसन्ती चोला…

अनेक दिनों तक यह गीत सभी क्रांतिकारियों की जुबां की शान बना रहा। क्रांतिकारी जब भी किसी सदस्य से मुलाकात करते तो मेरा रंग दे बसंती चोला का उल्लेख अवश्य करते।यह गीत शहीद भगत सिंह ने भी सुना और उन्हें भी यह खासा पसंद आया। शहीद भगत सिंह उन दिनों लाहौर जेल में बन्द थे तो उन्होंने इस गीत में कुछ और पंक्तियाँ और जोड़ी-

“इसी रंग में बिस्मिल जी ने ‘वन्दे-मातरम्’ बोला,
यही रंग अशफाक को भाया उनका दिल भी डोला;
इसी रंग को हम मस्तों ने, हम मस्तों ने;
दूर फिरंगी को करने को, को करने को;
लहू में अपने घोला।
मेरा रँग दे बसन्ती चोला….
हो मेरा रँग दे बसन्ती चोला….
माय! रँग दे बसन्ती चोला….
हो माय! रँग दे बसन्ती चोला….
मेरा रँग दे बसन्ती चोला….

मातृभूमि को समर्पित भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महाकवि – महारथी रामप्रसाद बिस्मिल की एक और कविता भाव विभोर कर देती है।

“ऐ मातृभूमि तेरी जय हो, सदा विजय हो
प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कान्तिमय हो
अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में
संसार के हृदय में तेरी प्रभा उदय हो
तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो
तेरी प्रसन्नता ही आनन्द का विषय हो
वह भक्ति दे कि ‘बिस्मिल’ सुख में तुझे न भूले
वह शक्ति दे कि दुःख में कायर न यह हृदय हो।

स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों के योगदान

परन्तु स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और भविष्य की सच्चाई यही रही है,कि जिन हुतात्माओं ने स्वतंत्रता संग्राम में बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता की जंग लड़ी उनको देशद्रोही, आतंकवादी लुटेरा और डकैत कहा गया तथा उन्हें ही फाँसी और कालापानी की सजाएँ दी गईं, इसके विपरीत बरतानिया सरकार का समर्थन कर, सरकार में सम्मिलित होकर लाभ उठाने वाले, डोमिनियन स्टेट्स की मांग करने वाले कांग्रेसी और अन्य तथाकथित  स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बन कर इतिहास में छा गए और सत्ता भी प्राप्त कर ली। सत्ता प्राप्त करने के उपरांत इन तथाकथित नेताओं ने बरतानिया सरकार के मत प्रवाह का ही समर्थन किया और भारतीय इतिहास को बर्बाद करने का ठेका वामपंथी और सेक्युलर इतिहासकारों को दे दिया। फिर क्या था? इन दरबारी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को क्षत – विक्षत करके रख दिया। परंतु यह लिखने में बिल्कुल संकोच नहीं है,कि सन् 2014 में सत्ता परिवर्तन के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व में आजादी के अमृत महोत्सव से विरुपित और विषाक्त इतिहास का पटाक्षेप हुआ और स्वाधीनता के अमृत काल में वास्तविक इतिहास सबके सामने स्थापित हो रहा है। यह विशुद्ध भारतीय इतिहास के स्थापना का काल है।इसलिए क्रांतिकारियों के इतिहास का पुनर्लेखन कर उनके साथ हुए अन्याय को भी उजागर करना है। यह अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है,कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में केवल गाँधी जी के निर्देशन में कांग्रेस और उनके समर्थकों के अहिंसक आंदोलन को ही स्वाधीनता संग्राम माना गया और पूरा श्रेय भी उन्हीं को मिला परन्तु क्रन्तिकारियों के सशस्त्र संग्राम को विद्रोह,लूट,डकैती और आतंकवाद की संज्ञा दी गई।

परन्तु क्रान्तिकारियों के साथ अन्याय की पराकाष्ठा तब हुई जब उनके विचारों को भी कुचल दिया गया और इतिहास में उल्लेख तक नहीं किया।यदि किया होता तो इतिहास में यह दर्ज होता कि भारत की गणतंत्रीय व्यवस्था के सूत्रधार और प्रथम विचारक महारथी रामप्रसाद बिस्मिल ही थे। राम प्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों द्वारा निर्मित हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन(एच. आर. ए.)के घोषणा पत्र को इतिहास में समाहित किया जाता तो आज सबको पता होता कि स्वतंत्र भारत के लिए,संघीय गणतंत्र,सभी को मताधिकार का अधिकार,सभी को समान अवसर,धर्मनिरपेक्ष,समाजवाद और शोषण के अन्त संबंधी विचारों का सर्वप्रथम सूत्रपात किया था। संविधान बना,परन्तु राम प्रसाद बिस्मिल और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के घोषणा पत्र की चर्चा तक नहीं हुई।

फांसी से पहले राम प्रसाद बिस्मिल की सिंह गर्जना

आज रामप्रसाद बिस्मिल की जयंती पर ये तय हो कि राम प्रसाद बिस्मिल सही थे, या मोतीलाल नेहरू के समधी (वस्तुतः मोतीलाल के बड़े भाई नन्दलाल के बेटे किशन लाल नेहरू के साथ जगत नारायण मुल्ला की बेटी स्वराजवती से हुआ था, इस दृष्टि से जगत नारायण मुल्ला, मोतीलाल नेहरू के भी समधी हुए) और जूनियर पं. जगत नारायण मुल्ला? बरतानिया सरकार के विरुद्ध सर्वप्रथम महा महारथी रामप्रसाद बिस्मिल ने फाँसी पर चढ़ते समय सिंह गर्जन किया था

“I wish the downfall of British Empire.”

विडंबना तो देखिए की काकोरी अनुष्ठान को लूट बताया गया  और बिस्मिल सहित समस्त क्रांतिकारियों के विरुद्ध अंग्रेजों की ओर से पं. मोतीलाल नेहरू लोक अभियोजक (पब्लिक प्रोसीक्यूटर)बने, मोतीलाल नेहरु ने चतुराई दिखाते हुए अपने रिश्तेदार और जूनियर पं.जगत नारायण मुल्ला को मैदान में उतार दिया। फिर क्या था प. जगत नारायण मुल्ला ने मोतीलाल नेहरू के आशीर्वाद से रामप्रसाद बिस्मिल सहित अन्य महारथियों को फाँसी की सजा दिलवा कर ही दम लिया। अति तो तब हो गई, जब पैरवी के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल भारी पड़ने लगे, तब जगत नारायण मुल्ला ने उनका विरोध करते हुए पैरवी नहीं करने दी। एक चादर को पर्याप्त सबूत मानकर, राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी की सजा दिलवाने वाले जगत नारायण मुल्ला ही थे।

स्वतंत्रता सेनानियों को मिला देशद्रोही का तमगा

उल्लेखनीय है, कि जलियांवाला बाग हत्याकांड के उपरांत जांच के लिए गठित 7 सदस्यीय हंटर कमेटी जिसमें 4 अंग्रेज और 3 भारतीय सदस्य रखे गए थे। उसमें जगत नारायण मुल्ला भी एक सदस्य थे और अंग्रेजों का साथ देते हुए, जाँच में लीपा -पोती कर क्लीन चिट देने अपना सहयोग दिया था। अंग्रेज़ों और काँग्रेस ने पं. जगत नारायण मुल्ला को खूब उपकृत किया, इतना ही नहीं वरन् उनके पुत्र पं. आनंद नारायण मुल्ला को कांग्रेस ने 10 वर्ष सांसद बनने का सुख दिया, फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट न्यायधीश भी बनाया गया और पुन: राज्य सभा भेजा गया। परंतु महान् स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों क्या मिला? लुटेरा और आतंकवादी का तमगा-आखिर क्यों? पूछता है भारत?

आर्य समाज से प्रेरित होकर बिस्मिल बने क्रांति के अग्रदूत

अब रामप्रसाद बिस्मिल की सुनिए। महान स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून सन 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। उनके पिता एक रामभक्त थे, जिसके कारण उनका नाम राम से रामप्रसाद रख दिया गया। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने पिता से हिंदी और पास में रहने वाले एक मौलवी से उर्दू सीखी। बिस्मिल शाहजहांपुर के एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल में भी गए। इसलिए विभिन्न भाषाओं पर उनकी पकड़ ने उन्हें एक उत्कृष्ट लेखक और कवि के रूप में प्रतिष्ठित किया। राम प्रसाद बिस्मिल के बचपन में आर्य समाज उत्तर भारत में प्रभावशाली आंदोलन के रूप में उभर रहा था। बिस्मिल भी आर्य समाज में सम्मिलित हो गए। स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों और सत्यार्थ प्रकाश ने राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन ही बदल दिया। वह एक लेखक और कवि के रूप में पहचान बनाने लगे। उन्होंने हिंदी और उर्दू में ‘अज्ञात’, ‘राम’ जैसे उपनामों से देशभक्ति के छंद लिखे। उनका सबसे प्रसिद्ध उपनाम ‘बिस्मिल’ था।

स्कूल तक की पढ़ाई समाप्त करने के बाद बिस्मिल राजनीति में शामिल हो गए। हालांकि, शीघ्र  ही उनका कांग्रेस पार्टी के तथाकथित उदारवादी धड़े से मोहभंग हो गया। बिस्मिल अपने देश की स्वाधीनता हेतु भिक्षावृति  के लिए तैयार नहीं थे। वह स्वाधीनता को शौर्य पूर्वक प्राप्त करना चाहती थे। जैसा कि उनकी सबसे प्रसिद्ध कविताओं में से एक ‘गुलामी मिटा दो’ में दृष्टिगोचर होता  है-अपने  लक्ष्य  को प्राप्त करने के लिए उन्होंने ‘मातृवेदी’ नाम से एक क्रांतिकारी संगठन बनाया। इसके बाद बिस्मिल ने अपने साथी क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित के साथ मिलकर सेना बनाई। तदुपरांत मैनपुरी अनुष्ठान किया गया।

गांधी के फैसले से नाराज होकर चुना अलग क्रांतिकारी रास्ता

सन 1918 में बिस्मिल अपनी सबसे प्रसिद्ध कविता मैनपुरी की प्रतिज्ञा लिखी, जिसे पैम्फलेट में संयुक्त प्रांत में वितरित किया गया। उनकी कविता की राष्ट्रवादी लोगों ने प्रशंसा की। बिस्मिल के नए बने संगठन को धन की आवश्यकता थी। इसके लिए उन्होंने वर्ष 1918 में मैनपुरी जिले के सरकारी कार्यालयों से तीन बार धन हस्तगत किया। बरतानिया सरकार में सनसनी फैल गई। बड़े पैमाने पर तलाशी शुरू की गई और बिस्मिल का पता लगा लिया गया। इसके बाद जो हुआ वह एक नाटकीय गोलीबारी थी जिसके अंत में बिस्मिल यमुना नदी में कूद गए और बचने के लिए पानी के नीचे तैरते हुए पलायन कर गये ।इसके बाद बिस्मिल अगले 2 वर्षों तक भूमिगत रहे। फरवरी 1920 में जब मैनपुरी अनुष्ठान मामले के सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया, तो बिस्मिल अपने घर शाहजहांपुर लौट आए। वहां उन्होंने शुरू में कांग्रेस के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने का काम किया। लेकिन गांधी द्वारा 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेने फैसले से क्षुब्ध होकर बिस्मिल ने अपनी खुद का दल बनाने का निर्णय लिया।

अंततोगत्वा रामप्रसाद  बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां, शचीन्द्रनाथ सान्याल और योगेश चंद्र चटर्जी जैसे संस्थापक सदस्यों ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया। इसके बाद चंद्रशेखर आजाद और बाद में भगत सिंह भी एच.आर.ए.में सम्मिलित हुए। उनका घोषणा पत्र मुख्य रूप से बिस्मिल ने लिखा था। आधिकारिक तौर पर घोषणा पत्र 1 जनवरी, 1925 को जारी किया गया, जिसका शीर्षक था- क्रांतिकारी। क्रांतिकारी( द रिवोल्यूशनरी ) घोषणा – पत्र, हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) द्वारा इन प्रेरक पंक्तियों से प्रारम्भ हुआ था-

“नए तारे के जन्म के लए अराजकता आवश्यक है।” ‘द रिवोल्यूशनरी’ का प्रकाशन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.आर.ए.) द्वारा किया गया था। ‘द रिवोल्यूशनरी’ को मूल रुप से राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा था, लेकिन इस पर “विजय कुमार” नाम से हस्ताक्षर किए गए थे। इस घोषणा- पत्र में  विदेशी शासन, स्वतंत्रता आंदोलन और भारत के भविष्य से संबंधित मुद्दों पर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की विचारधारा, योजनाओं और दृष्टिकोण को दर्शाया गया था। ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए भारत की जनता को प्रेरित करने के उद्देश्य से इसे देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापक रूप से प्रसारित किया गया था।

‘द रिवोल्यूशनरी’ एक चार पृष्ठों का दस्तावेज था,जो दबंग शैली में लिखा गया था,जिसको दृष्टिकोण बदलते हुए,अलंकारिक शैली में सन् 1929 में पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव में उतारा गया था। इस घोषणा पत्र में कुल 11 अनुच्छेद हैं ,जिसमें सातवाँ अनुच्छेद ,सर्वाधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक संवैधानिक दृष्टिकोण का स्पष्ट वर्णन है। घोषणा -पत्र का उद्देश्य ‘संगठित और सशस्त्र क्रांति’ के माध्यम से ‘संयुक्त राज्य भारत का भारत का संघीय गणराज्य’ स्थापित करना था। इसमें एक संविधान बनाने का प्रस्ताव था, और परिणामस्वरूप बनने वाला संवैधानिक गणराज्य निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित होगा: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समानता का अधिकार, धर्मनिरपेक्ष राज्य, शोषण के विरुद्ध अधिकार,समाजवाद,उत्पादन के साधनों एवं प्रमुख उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार और समूह अधिकार। संगठन का मानना था,कि क्रांति कोई पागलपन नहीं वरन एक उद्देश्यपूर्ण कदम है।

काकोरी कांड से ब्रिटिश हुकूमत को दी सबसे बड़ी चुनौती

रामप्रसाद बिस्मिल को अपने महान उद्देश्य की प्रतिपूर्ति के लिए अब दल को  कार्य हेतु धन की आवश्यकता  और भी अधिक बढ़ गयी थी। इसलिए उन्होंने 7 मार्च 1925 को बिचपुरी तथा 24 मई 1925 को द्वारकापुर में दो राजनीतिक अनुष्ठान किए ,परन्तु कुछ विशेष धन प्राप्त नहीं हुआ था इन राजनीतिक अनुष्ठानों में उनके साथी भी मारे गये थे,जिसके कारण उन्होंने तय किया कि वे अब केवल सरकारी खजाना ही हस्तगत करेंगे। 9 अगस्त सन् 1925 को ‘रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क़ो एच.आर.ए.ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम लड़ने हेतु धन एकत्रित करने के लिए काकोरी अनुष्ठान किया। 9 अगस्त, सन 1925 को जबआठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन,लखनऊ से लगभग 15 किमी दूर काकोरी स्टेशन से गुजर रही थी, एच.आर.ए.के एक महारथी राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, जो पहले से ही अंदर बैठे थे, उन्होंने ट्रेन की चेन खींच दी और ट्रेन को रोक दिया। तदुपरांत राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्लाह खां सहित लगभग दस क्रांतिकारी ट्रेन में घुसे और मुठभेड़ के बाद गार्ड को काबू किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार   4,679 रुपये, एक आना और 6 पैसे क़ी  धनराशि क्रांतिकारियों ने हस्तगत  कर ली और पलायन कर गए। काकोरी अनुष्ठान ने,न केवल भारत वरन इंग्लैंड की बरतानिया सरकार को हिला कर रख दिया।

काकोरी अनुष्ठान से बरतानिया सरकार थर्रा उठी थी इसलिए  येन- केन- प्रकारेण क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया। इस अभियान में बरतानिया सरकार के आठ लाख रुपए खर्च हुए। अंततः अठारह महीने की लंबी नौटंकी के बाद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, रोशन सिंह और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को मौत की सजा सुनाई गई। 19 दिसंबर, सन 1927 को महारथी राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया। स्वतंत्रता के महारथी बिस्मिल ने अपने फाँसी के पूर्व ये अंतिम गज़ल लिखी, जिसकी अंतिम पंक्तियाँ थीं।

“आखिरी शब दीद के काबिल थी,
बिस्मिल की तड़प,

सुब्ह दम कोई अगर, बाला-ए-बाम आया तो क्या?

राम प्रसाद बिस्मिल एक सच्चे गणतंत्रवादी विचारक थे। उनकी दूरदर्शिता विलक्षण थी कि उस समय के दौर में, जब देश पराधीन था, तब उन्होंने संविधान और शासन प्रणाली (गणतंत्र) का जो खाका खींचा था, वह स्वतंत्र भारत के मूल्यों में स्पष्ट परिलक्षित होता है। तो क्या पं. राम प्रसाद बिस्मिल को भारतीय गणतंत्र के प्रथम विचारक और सूत्रधार के रूप में इतिहास में स्थान नहीं मिलना चाहिए? इस आशा के साथ कलम और पिस्तौल के अनूठे योद्धा, पं. राम प्रसाद बिस्मिल अनंत कोटि नमन है।

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डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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