इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। उनके दिल्ली वाले सरकारी बंगले में मार्च 2025 में आग लगी थी, और आग बुझाते समय स्टोर रूम से जले हुए नोटों की गड्डियां मिली थीं। इस मामले की जांच चल रही है, और अब जांच कर रही समिति ने उन्हें आरोपों का जवाब देने के लिए सिर्फ छह हफ्ते का समय दिया है।
क्या है पूरा मामला
यह वाकया 14-15 मार्च 2025 की रात का है, जब जस्टिस वर्मा के लुटियंस दिल्ली जोन वाले बंगले (30 तुगलक क्रिसेंट) में एक कमरे में आग लग गई। जज साहब की पत्नी ने आनन-फानन में दिल्ली फायर सर्विस और पुलिस को फोन मिला दिया। उस दौरान जज साहब बंगले पर नहीं थे। जब फायर डिपार्टमेंट आग बुझाने लगा तो उन्होंने स्टोर रूम में जले हुए कैश के बंडल देखे। कुछ वीडियो भी बने, जिनमें जलता हुआ पैसा दिख रहा था। पुलिस और फायर कर्मियों के बयान लिए गए। बाद में पता चला कि यह पैसा अनएकाउंटेड था, यानी इसका कोई हिसाब नहीं था।
जस्टिस वर्मा उस समय दिल्ली हाई कोर्ट में थे। मामले की जानकारी मिलते ही सुप्रीम कोर्ट ने इन-हाउस जांच शुरू की। पहले एक तीन सदस्यीय पैनल बनाया गया, जिसमें पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जज अनु सिवारमन शामिल थे। इस पैनल ने 55 गवाहों से पूछताछ की, जगह का दौरा किया और मई 2025 में रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में कहा गया कि आरोपों में दम है और स्टोर रूम पर जस्टिस वर्मा या उनके परिवार का कंट्रोल था।
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महाभियोग प्रस्ताव और नई जांच समिति
इसके बाद लोकसभा में 146 सांसदों ने जस्टिस वर्मा को हटाने का प्रस्ताव दिया। स्पीकर ओम बिरला ने इसे मंजूर किया और जजेस इंक्वायरी एक्ट के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज अरविंद कुमार (अध्यक्ष), मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएम श्रीवास्तव और सीनियर एडवोकेट बीवी आचार्य शामिल हैं। समिति ने जस्टिस वर्मा को आरोपों का मेमो दिया, जिसमें पुरानी इन-हाउस जांच के सबूत, वीडियो, गवाहों के बयान और फॉरेंसिक डिटेल्स शामिल हैं।
छह हफ्ते की मोहलत क्यों
5 दिसंबर 2025 को हुई मीटिंग में जस्टिस वर्मा ने जवाब देने के लिए आठ हफ्ते का समय मांगा। लेकिन समिति ने सिर्फ छह हफ्ते दिए और साफ कहा कि अब इससे ज्यादा समय नहीं मिलेगा। कार्यवाही जनवरी के आखिरी हफ्ते में फिर शुरू होगी। जस्टिस वर्मा को मौका मिलेगा कि वे अपनी सफाई में सबूत पेश करें, गवाह बुलाएं और आरोप लगाने वाले गवाहों से क्रॉस-एग्जामिन करें। इस बीच, कैश मिलने के एक हफ्ते बाद ही जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था। वहां उन्हें कोई ज्यूडिशियल काम नहीं सौंपा जा रहा है।















