भारतीय सेना की गौरवशाली विजय से कांग्रेस ने क्यों कर लिया 'समझौता'
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भारतीय सेना की गौरवशाली विजय से कांग्रेस ने क्यों कर लिया ‘समझौता’

सन् 1971 की बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है कि जहां भारतीय सेना ने सैम के नेतृत्व में पाकिस्तान को हर मोर्चे पर नेस्तनाबूद कर दिया था,आधी दुनिया की शक्तियों ने घुटने टेके थे, वहीं श्रीमती इंदिरा गाँधी और कांग्रेस ने इस महान् विजय को शिमला समझौते में धूल में मिला दिया।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Dec 16, 2025, 09:19 am IST
inभारत
16 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण करते पाकिस्तानी सेना के जनरल

16 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण करते पाकिस्तानी सेना के जनरल

भारतीय सेना ने रणभूमि में पाकिस्तान की सेना को हमेशा धूल चटाई है,परन्तु दुर्भाग्य यह रहा है कि कांग्रेस की सरकारों ने सेना की विजय को धूल में मिला कर रख दिया। सेना के पराक्रम और बलिदान के साथ विश्वासघात किया। सन् 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में तो श्रीमती इंदिरा गांधी और उनकी कांग्रेस सरकार ने अति ही कर दी।

सन् 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है,कि जहाँ भारतीय सेना ने सैम के नेतृत्व में पाकिस्तान को हर मोर्चे पर धूल चटाकर नेस्तनाबूद कर दिया था,आधी दुनिया की शक्तियों ने घुटने टेके थे, वहीं श्रीमती इंदिरा गाँधी और कांग्रेस ने इस महान् विजय को शिमला समझौते में धूल में मिला दिया।

कांग्रेस की तुष्टिकरण नीति

कांग्रेस सरकार ने शिमला समझौते में कश्मीर के संबंध में नियंत्रण सीमा रेखा स्वीकार कर पाकिस्तान का 30 हजार वर्ग मील भूमि पर एक तरह से कब्जा मान लिया। यह पाकिस्तान की कूटनीतिक विजय थी या कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति, जिसने कारगिल और आंतकवाद सहित अन्य समस्याओं को जन्म दिया। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के उपरांत कांग्रेस सरकार की असफलता की ओर जाने के पूर्व, भारतीय सेना के पराक्रम और उसकी विजय गाथा पर प्रकाश डालना अनिवार्य है, ताकि सच्चाई सबके सामने रहे।

पाकिस्तानी सेना के परखच्चे उड़े

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में में हिंद की सेना ने पाकिस्तानी सेना के परखच्चे उड़ा दिए थे। यह युद्ध प्रारंभ तो हुआ था, बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के रूप में परंतु अमेरिका और इंग्लैंड के हस्तक्षेप से विश्वव्यापी बन गया। भारत और रुस एक साथ हो गए और व्यूह रचना के वास्तुकार जनरल सैम मानेकशॉ, ले. ज. जगजीत सिंह अरोड़ा, जे.एफ .आर. जैकब,सुजान सिंह, एडमिरल कुरुविल्ला,रॉ के प्रमुख रामनाथ काव, प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी,रुस के राष्ट्रपति लियोनिद ब्रेझनेव, विरुद्ध दूसरे मोर्चे पर पाकिस्तान, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड की ओर से क्रमशः याहया खान, ले. ज. नियाजी, अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन, इंग्लैंड के प्रधानमंत्री हीथ थे।

भारत-पाकिस्तान युद्ध 13 दिनों तक चला

यह युद्ध 3 दिसंबर से 16 दिसंबर तक कुल 13 दिनों तक चला। आई. एन. एस. राजपूत ने आई. एन. एस. विक्रांत का स्वरूप लेकर पाकिस्तानी की गाजी पनडुब्बी को ध्वस्त कर दिया। पाकिस्तान की आधी नेवी समाप्त हुई। एयरफोर्स ने 7 पाकिस्तानी एयर बेस और कराची एयर बेस को ध्वस्त कर आपरेशन चंगेज खान के धुर्रे उड़ा दिए।

पाकिस्तान ने 30 लाख लोगों की हत्या की

मार्च 1971 के आते-आते पूर्वी पाकिस्तान में पश्चिमी पाकिस्तान की ओर से 30 लाख लोगों को मार दिया गया और 2 करोड़ शरणार्थियों के आगमन की स्थिति बन गई, वे भारत में प्रवेश करने लगे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 अप्रैल 1971 को आपात बैठक बुलाई। तत्काल आक्रमण का निर्णय लिया गया परंतु जनरल सैम मानेकशॉ ने असहमति व्यक्त की। इस बात को लेकर यद्यपि इंदिरा गांधी और सैम में मतभेद हुए परंतु जब सैम ने वस्तुस्थिति स्पष्ट की तो श्रीमती गांधी सहमत हुईं।

जनरल सैम का ऐतिहासिक सुझाव

सैम ने कहा कि “मानसून आते ही नदियों में बाढ़ जैसी स्थिति बनेगी, वायुसेना भी ठीक तरह से सहायता नहीं कर सकेगी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन, ऐसे मौके पर पाकिस्तान का सहयोग निश्चित करेगा और हम हार जायेंगे।” इसलिए दिसंबर में हमला किया जाये उत्तर – पूर्व में बर्फ जम जायेगी और चीन का सहयोग नहीं मिलेगा।

पाकिस्तान की गुप्तचर व्यवस्था हुई फेल

पाकिस्तान की गुप्तचर व्यवस्था ये जानने में असफल रही कि भारत ने पश्चिमी और पूर्वी मोर्चों पर पूरी तैयारी कर ली है। 4 दिसंबर को सैम ने पाकिस्तान पर आक्रमण की तैयारी कर ली। पाकिस्तान ने उतावलेपन में 3 दिसंबर को अमृतसर समेत अन्य एयर बेस को निशाना बनाते हुए आक्रमण कर दिया और 1971 का बांग्लादेश लिबरेशन वॉर प्रारंभ हो गया। पाकिस्तान ने इस एयर अटैक को आपरेशन “चंगेज खान” नाम दिया।

आपरेशन चंगेज खान की कमर टूटी

भारत ने पाकिस्तान के 7 एयर बेस उड़ाये और कराची बेस को ध्वस्त कर आपरेशन चंगेज खान की कमर तोड़ दी। पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 वर्ष के लिए उधार ली पनडुब्बी पी. एन. एस. गाजी को भारत के जहाजी बेड़े आई. एन. एस. विक्रांत को नष्ट करने के लिए लिए भेजा। तब आई. एन. एस. राजपूत को विक्रांत का स्वरूप देकर आगे बढ़ाया गया। आखिरकार राजपूत ने गाजी को खोज लिया और काल की तरह टूटा, पनडुब्बी स्वाहा हो गयी। आपरेशन ट्राइडेंट और आपरेशन पायथन के अंतर्गत एडमिरल कुरुविल्ला और वाइस एडमिरल कोहली के नेतृत्व में नेवी ने कहर बरपाया, 10 पाकिस्तानी युद्धपोत दफन कर कराची बेस के चिथड़े उड़ा दिए। पाकिस्तान की आधी जल सेना तबाह हो गयी।

भारतीय थल सेना ने बरपाया कहर

थल सेना ने पश्चिमी मोर्चे पर भयंकर कहर बरपाया। लोंगोंवाल का प्रसिद्ध युद्ध हुआ। सेना ने पाकिस्तान में 5795 वर्ग मील कब्जा (सिंध और पंजाब समेत अन्य हिस्सों) पर कब्जा कर लिया लेकिन बाद में वापस कर दिया। यह तत्कालीन सरकार ने गलत किया क्योंकि यह सही समय था कश्मीर समस्या को हल करने का।

ले. ज. जगजीत सिंह अरोड़ा की रणनीति

अब चलते हैं पूर्वी पाकिस्तान जहाँ पूर्वी कमान के ले. ज. जगजीत सिंह अरोड़ा ने मोर्चा संभाला था। आपरेशन जैकपाट के साथ ब्लिट्जक्रीग वॉर स्ट्रेटजी (द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी ने इसका प्रयोग किया था) का प्रयोग किया गया। पाकिस्तानी सेना त्राहिमाम करने लगी, और 16 दिसंबर 1971 को द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत विश्व का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण पाकिस्तानी ले.ज. नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ किया।

पाकिस्तान के नियाजी को जबलपुर लाया गया

पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी के साथ 7 बड़े अधिकारी युद्धबंदी के रूप में जबलपुर लाए गए जिनके भाग्य का निर्णय बाद में हुआ। जबलपुर का यह युद्ध बंदी शिविर नंबर 100, तत्समय ए. ओ. सी. स्कूल, विजयंत ब्लाक था, सन् 1971 में पाकिस्तान की शर्मनाक पराजय और हमारी सेना के साहस और शौर्य का अप्रतिम प्रतीक है।

ये थे पाकिस्तान के पराजित अधिकारी

पराजित पाकिस्तानी अधिकारियों में, लेफ्टिनेंट जनरल ए. ए. के. नियाजी, मेजर जनरल मोहम्मद हुसैन अंसारी, मेजर जनरल नजर हुसैन शाह, मेजर जनरल राव फरमान अली, मेजर जनरल मोहम्मद जमशेद, मेजर जनरल काजी अब्दुल मजीद खान, रिअर एडमिरल मोहम्मद शरीफ और एयर कमांडर इनामुल हक खान को जबलपुर में 8 माह तक युद्धबंदी के रुप में रखा गया था। शिमला समझौते के बाद ही इनकी मुक्ति हुई।

“गन बोट डिप्लोमेसी”

अब कूटनीतिक पद “गन बोट डिप्लोमेसी” की चर्चा करना बहुत आवश्यक है। अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में भारत के विरुद्ध प्रश्न उठाया पर रूस ने कामयाब नहीं होने दिया। कुंठित होकर भारत को भयाक्रांत करने के लिए अमेरिका ने अपना 7वाँ जहाजी बेड़ा और इंग्लैंड ने ईगल भेजा परंतु रूसी कमांडर ब्लादिमीर ने 10वीं आपरेटिव नेवल ग्रुप के साथ परमाणु पनडुब्बियों से घेर लिया और धमकाया की वापस लौट जाओ नहीं तो डुबा देंगे। अमेरिका और इंग्लैंड अपनी फजीहत कराकर वापस लौट गये, और इस तरह आधी दुनिया की शक्तियों की पराजय के उपरांत भारत 6वीं विश्व शक्ति के रूप में सामने आया।

एकतरफा जीत के बावजूद शिमला समझौता 

भारत की एकतरफा विजय के बावजूद श्रीमती इंदिरा गांधी और उनकी सरकार ने शिमला में द्विपक्षीय समझौता किया जो अत्यंत शर्मनाक है। शिमला समझौते के समीक्षकों का मानना है कि भारत का पाकिस्तान के समक्ष आत्मसमर्पण था, भारत के सैनिकों ने जिसे युद्ध के मैदान में जीता था उसे भारत की कूटनीति ने शिमला में खो दिया। समीक्षकों का कहना है कि कश्मीर समस्या का स्थाई हल ढूंढे बिना पाकिस्तान के लगभग 5795 वर्ग मील क्षेत्र को लौटाना राजनीतिक चातुर्य नहीं कहा जा सकता। दूसरे शब्दों में समालोचकों का कहना है,कि शिमला समझौते ने कश्मीर पर पाकिस्तान से सौदेबाजी करने का अवसर हाथ से खो दिया।

कश्मीर पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा

शिमला समझौते से पाकिस्तान संतुष्ट हो गया, क्योंकि उसे भारत से युद्ध में खोई हुई भूमि वापस मिल गई और उसका कश्मीर की 30 हजार वर्ग मील भूमि पर अवैध कब्जा बना रहा। इस भूमि को पाकिस्तान ने अक्टूबर 1947 में कश्मीर पर आक्रमण करके अवैध रूप से कब्जाया था। शिमला से लौटने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा कि मैंने पाकिस्तान के लिए वह कार्य कर दिया है,जो अरब देश इजराइल से ना करवा सके अर्थात् मैंने भारतीय सेना द्वारा जीती हुई सारी भूमि पाकिस्तान के लिए प्राप्त कर ली है।

अटल जी ने किया था विरोध

जनसंघ के तत्कालीन प्रमुख नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने 3 जुलाई 1972 को कहा था कि शिमला समझौते से जनसंघ को आघात पहुंचा है। शिखर सम्मेलन से पूर्व प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को आश्वासन दिया था कि एक समन्वित समझौता किया जाएगा,परंतु ऐसा ना करके वह जुल्फिकार अली भुट्टो की चाल में फंस गयीं। समझौते के अनुसार भारत को पाकिस्तान की 5000 वर्ग मील भूमि खाली करनी पड़ेगी,जबकि पाकिस्तान कश्मीर में भारत की 30 हजार वर्ग मील भूमि पर अपना अवैध कब्जा यथापूर्व कायम रखेगा। यह भारत के जवानों द्वारा किए गए बलिदानों के साथ विश्वास घात है।( नवभारत टाइम्स,नई दिल्ली, दिनांक 4 जुलाई 1972 पृष्ठ 1कालम 6।)

 

Topics: बांग्लादेश मुक्ति संग्रामशिमला समझौताजनरल सैम मानेकशॉभारतीय सेनाइंदिरा गांधीभारत-पाकिस्तान युद्धविजय दिवस
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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